
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में पहले पन्ने पर विमान हादसे की ही खबर होनी थी वही है। लेकिन विमान आबादी वाले क्षेत्र में गिरा था, इसलिये किसी की भी जिज्ञासा होगी कि गैर यात्रियों में कितने लोग हादसे से शिकार हुए। कितने लोग घायल हुए, कितने मरे। ऐसे हादसों की तस्वीरें भी देखने की इच्छा होती है। आज के समय में तस्वीरें ही नहीं, वीडियो भी सोशल मीडिया से लेकर भिन्न पोर्टलों पर आसानी से तुरंत मिल जाते हैं। हादसे के तुरंत बाद पता चल गया था कि एक यात्री बच गया है, मरने वालों में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री भी हैं और एक परिवार जो बेहतर भविष्य की उम्मीद में लंदन जा रहा था वह भी खत्म हो गया। ऐसे में दैनिक अखबारों से यही उम्मीद थी कि वह हादसा स्थल से कुछ ऐसी सूचनाएं देगा जो टीआरपी और लाइक बटोरने वालों से अलग हो। यह स्थानीय प्रशासन की प्रेस कांफ्रेंस, सूचनाओं पर आधारित हो सकती थी। मीडिया चैनल और सोशल मीडिया के प्रचारकों में अंतर तो होना ही चाहिये। वैसे तो गलत सूचना सोशल मीडिया पर भी नहीं चलनी चाहिये थी लेकिन उससे हमेशा बिल्कुल सही खबर की अपेक्षा भी नहीं की जाती है और उसकी सूचनाओं की जांच कर ली जाती है या कर ली जानी चाहिये। उदाहरण के लिए, कल किसी महिला ने अपनी पुरानी पोस्ट शेयर करते हुए विजय रुपानी को याद किया कि वह एक यात्रा में उनके साथ थी। विमान हादसे पर अपने लिखे के साथ किसी ने यह तस्वीर पोस्ट की तो उन्हें बताया जाने लगा कि फोटो इस यात्रा की नहीं, पहले की है। यह अलग बात है कि उन्होंने फोटो के बारे में कुछ लिखा नहीं था और तस्वीर विमान के अंदर बैठे यात्रियों की थी जो आम तौर पर लेख या रिपोर्ट के साथ छपती है। फिर भी यह माना जा सकता है कि फोटो के साथ बताया जाना चाहिये था कि यह फोटो विजय रुपानी की इस यात्रा की नहीं पुरानी है। पर बहुत सारे लोगों ने इस फोटो को इसी यात्रा की समझ कर उपयोग किया और फिर तो बिना जाने, बिना पुष्टि किये उसका उपयोग कई लोगों ने किया। इससे आप समझ सकते हैं कि सोशल मीडिया पर खबरें कैसे बनती हैं। अखबार और मीडिया संस्थान भी ‘सबसे तेज’ दिखने के चक्कर में धोखा खा जाते हैं। दूसरी ओर, जिस खबर का इंतजार हो वह कहीं नहीं होती या होती है तो चलताऊ किस्म की। मेरा मकसद यह बताना है कि आज के समय में किसी भी खबर पर भरोसा करने से पहले एक बार उसकी सत्यता के बारे में सोच लेना चाहिये।
इस लिहाज से आज दि एशियन एज का शीर्षक सबसे अलग है – इसमें 242 लोगों के मरने की खबर है जबकि दूसरे अखबारों ने विमान के कुल यात्रियों की संख्या इतनी बताई है और सबको पता है कि एक यात्री बच गया है। ठीक है कि कई बार जगह की कमी होती है और एक यात्री बच गया – खबर में बता दिया जाता है। इस मामले में विमान के यात्रियों की संख्या नहीं मरने वालों की संख्या बताई गई है तो उसे 241 कर दिया जाना चाहिये था जैसा देशबन्धु ने किया है। शीर्षक है, अहमदाबाद में बड़ा विमान हादसा, 241 की मौत। दि एशियन एज ने ऐसा नहीं किया है और मरने वालों की संख्या 242 ही बताई है। हालांकि, एक अकेला जो बच गया शीर्षक से बचने वाले की तस्वीर भी छापी है और बताया है कि वे चलते हुए एक एम्बुलेंस की ओर जा रहे हैं। इस तरह, अखबार के पास सूचना तो है, प्रस्तुति में चूक है। यह भी संभव है कि ऐसा इस मान्यता के कारण हुआ हो कि विमान हादसे में कहां कोई बचता है। फिर भी, एक बार चेक किया जाना चाहिये था। कहने की जरूरत नहीं है कि अखबार का पूरा शीर्षक ऐसा है कि इस गलती की ओर ध्यान दिलाना जरूरी है। यह अलग बात है कि यहां शीर्षक गलत होने के कारण दूसरे अखबारों के शीर्षक सही होने के बावजूद पाठक गलत ही समझें पर अखबार की सूचना इतनी गलत नहीं होनी चाहिये कि देखते ही खटके।
दि एशियन एज का शीर्षक है,अहमदाबाद से लंदन जा रहे एयर इंडिया 787 के उड़ान भरने के तुरंत बाद क्रैश करने से 242 मारे गये। इसमें 242 तथ्यात्मक रूप से गलत है, 241 होना चाहिये। यह अलग बात है कि द टेलीग्राफ के शीर्षक, 242 व्यक्तियों के साथ विमान गिरा, एक जिन्दा है, बेहतर है। मुझे लगता है कि एक यात्री का जिन्दा बच जाना इस हादसे का एक महत्वपूर्ण पहलू है और इसे वैसे ही पेश किया जाना चाहिये। भले पाठक 242 विमान यात्री थे तो सब मर ही गये हों सोच कर खबर भी न पढ़ें। जैसा मैंने पहले कहा है, उत्सुकता यह होती है कि विमान जमीन पर कहां गिरा वहां क्या हुआ, कोई मरा तो नहीं आदि। आज की दूसरी बड़ी खबर यही होनी चाहिये थी। मेरे आठ अखबारों में इसका सबसे अच्छा विवरण देने वाला शीर्षक द एशियन एज का है। इसके अनुसार, विमान गिरने से जो गैर यात्री मारे गये उनमें एमबीबीएस के पांच छात्र, पीजी इंटर्न, सीनियर डॉक्टर की पत्नी शामिल हैं। 60 घायल हैं। उपशीर्षक है, मलबा बिखरा पड़ा है, मेडिकल कॉलेज में जले हुए शव देखे गये। मुझे लगता है कि यह मामला दुर्घटना के बाद स्थानीय प्रशासन की सक्रियता और काम-काज की सफलता से जुड़ा है इसलिए इसपर ध्यान नहीं दिया गया। वरना स्थानीय प्रशासन को (राजधानी है इसलिए मुख्यमंत्री भी इनमें शामिल हैं) पूरा विवरण देना चाहिये था। दि एशियन एज की खबर फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन के हवाले से है।
द टेलीग्राफ ने लिखा है, अधिकारियों ने अभी तक मृतकों की संख्या औपचारिक तौर पर नहीं बताई है। अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर जीएस मलिक ने शाम में रिपोर्टर्स से कहा, हमलोगों ने 204 शव निकाले हैं। पर मरने वालों की संख्या ज्यादा होने का अनुमान है। जाहिर है, प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर सूचना साझा नहीं की है। जब देश के प्रधानमंत्री ने आज तक कायदे से एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है तो मौके-बेमौके किसी शहर या राज्य के स्थानीय प्रशासन से प्रेस कांफ्रेंस करके सूचना देने की उम्मीद करना बेमानी है। लेकिन सरकार या प्रधानमंत्री अगर इसकी जरूरत समझते हैं और खुद किसी कारण (इसमें यह साबित करना शामिल हो सकता है कि मुझे पत्रकारों की जरूरत नहीं है) प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते हैं तो उन्हें चाहिये कि अधिकारियों मंत्रियों से कहें कि वे प्रेस कांफ्रेंस करके सूचनाएं दें। पत्रकारों के सवालों के जवाब दें। लेकिन प्रधानमंत्री यह सब नहीं करते हैं वे साथियों को नसीहत देते हैं जैसा मैंने कल बताया था और आज वैसी ही खबर द एशियन एज में पहले पन्ने पर है। यह वीरवार की खबर है और लगता है, दोबारा दी गई नसीहत है जो इस बार भाजपा प्रवक्ताओं के लिये है। मुद्दा यह है कि भाजपा नेता, प्रवक्ता क्या बोलें यह पार्टी का मामला है और नेता के रूप में वे नसीहत दे सकते हैं पर प्रशासन और अधिकारी को तो यह आदेश दिया जाना चाहिये कि वे खास मौकों पर प्रेस कांफ्रेंस करके जानकारी दें। सरकार ऐसा नहीं करती है वह एक बात है और मीडिया को इससे परेशानी नहीं है – या है तो वह इसे भी नहीं बताता- बिल्कुल अलग बात है।
आज अखबारों में ऐसी कई खबरें हैं जो सोशल मीडिया पर कल ही देख ली गई थीं। मुझे लगता है कि अखबारों को कुछ अलग नया देना चाहिये और नहीं देंगे तो उनकी पठनीयता कम होती जायेगी और अगर इसपर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो नया देने के लिए आवश्यक खर्च घाटे का सौदा हो जायेगा और ऐसा करना संभव ही नहीं होगा। पर हो यह रहा है कि प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए उनका नियमित कार्यक्रम मन की बात पहले पन्ने पर छप रहा है। जिसे मन की बात सुननी होगी वह रेडियो पर 20 घंटे पहले क्यों नहीं सुन लेगा कि अखबार में पढ़ने का इंतजार करेगा। दूसरी ओर, वहां जो खबर छप सकती थी उसकी जगह उस पाठक के लिए बेकार गई जिसने पहले सुन लिया था या जिसे नहीं पढ़ना है। इसी तरह विमान दुर्घटना से संबंधित सोशल मीडिया की खबरें पहले पन्ने पर रखी गई हैं और राहुल गांधी का यह आरोप नहीं है कि, मोदी ने 11 वर्षों में हर वादा तोड़ा (देशबन्धु)। कहने की जरूरत नहीं है कि राहुल गांधी का यह आरोप किसी विपक्षी नेता या विरोधी के आम आरोप की तरह नहीं है और राहुल गांधी ऐसे आरोप नहीं लगाते थे, अब लगा रहे हैं तो उसका कारण है और वह चुनाव आयोग की पक्षपाती भूमिका भी हो सकती है। इस खबर का उपशीर्षक है, युवाओं को राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनाने की बजाय बेरोजगार बनाया और भारत को अमेरिका से तीन बड़े झटके लगे। पाठकों के लिए यह सूचना आज पहले पन्ने की कई खबरों से महत्वपूर्ण है। लेकिन 50 साल पुराने या 50वीं बरसी पर इमरजेंसी को याद करने वाले संपादक ही खबर सेंसर करें तो रेखांकित करना जरूरी है।
आइये, अब देखें कि अखबारों के पहले पन्ने की किन खबरों की जगह राहुल गांधी के आरोप को नरेन्द्र मोदी के आरोपों की ही तरह प्रमुखता दी जा सकती थी। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार दुर्घटनाग्रस्त विमान के दोनों पायलट को कुल मिलाकर 9300 घंटे का अनुभव था। बेशक, यह महत्वपूर्ण और दिलचस्प खबर है। विमानन की खबर देने वाले अखबार में पहले पन्ने पर होनी ही चाहिये थी पर राजनीतिक खबरों वाले अखबार में राहुल गांधी वाली खबर में राजनीति ज्यादा है और उसे पहले पन्ने पर प्राथमिकता मिलनी चाहिये थी। मैं उन्हीं अखबारों और खबर की बात कर रहा हूं जहां विज्ञापन कम हैं या कोई खबर अखर रही है। हिन्दुस्तान टाइम्स का पहला पन्ना विमान हादसे की खबरों और फोटो से भरा हुआ है। राहुल गांधी के आरोप की खबर तो नहीं ही है, अंदर की चार खबरों की सूचना है और यह खबर उनमें भी नहीं है। आजकल होती भी नहीं है और स्पष्ट रूप से यह हेडलाइन मैनेजमेंट का प्रभाव लगता है। द हिन्दू में राहुल गांधी की खबर भले नहीं है, सरकार के खिलाफ मानी जाने वाली खबर है और मैं नहीं कहूंगा कि इसकी जगह उसे लिया जाना चाहिये था। यह इरादतन किया गया हो तो तब भी संपादकीय विवेक का मामला हो सकता है। इंडियन एक्सप्रेस में आधे पन्ने का विज्ञापन है और बाकी में सारी खबरें विमान हादसे से संबंधित है। यह भी संपादकीय विवेक का मामला ज्यादा लगता है, हेडलाइन मैनेजमेंट का कम। हालांकि कल इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पहले पन्ने पर याद करना (25 जून को तो किया ही जायेगा) रेखांकित करने वाला मामला था।
अमर उजाला में हादसे की जगह का वर्णन तो विस्तार से है लेकिन खौफनाक से शुरू होने के कारण वर्णन खौफनाक ही है। मुझे नहीं लगता कि शीर्षक पढ़ने के बाद कोई खबर पढ़ेगा या शीर्षक खबर है। यह तो सबको पता ही है या अनुमान तो होगा ही। अमर उजाला ने इसे छह कॉलम से ज्यादा में छापा है और शीर्षक है, खौफनाक सड़कों पर बिखरे पड़े थे शव, पहचानना भी मुश्किल। अहमदाबाद में या भारत में या किसी के जीवन में ऐसा हादसा भले पहली बार हुआ हो, अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है और अखबारों का काम खबर देना, आंखों देखा हल बताना नहीं। बेशक, यह शीर्षक भी संपादकीय विवेक और समझ का मामला है लेकिन मुझे नहीं लगता है कि यह खबर जैसा कुछ है, विमान हादसे में शव पहचानने लायक हों तो खबर है। इसी तरह, एक और शीर्षक है – एंबुलेंस कम पड़ी तो ठेले-स्ट्रेचर के साथ कंधों पर लादकर अस्पताल पहुंचाये गये शव। सरकारी अस्पतालों से शव ले जाने के लिए शायद ही किसी को एम्बुलेंस मिलते हों। गरीब लोग भी तरह-तरह के उपाय करते हैं और सब देखा-जाना है। सरकार ने कोई व्यवस्था की होती तो प्रचार भी दिखा होता। ऐसे में विमान हादसे के शव ले जाने के लिए एम्बुलेंस की उम्मीद करना तो 15 लाख की उम्मीद से भी फर्जी है। पता नहीं ऐसे रिपोर्टर और संपाद वास्तविक अपेक्षाओं के समय कहां रहते हैं।
एक शीर्षक है, जलकर क्षत-विक्षत हो चुके थे शव। मुख्य खबर का उपशीर्षक है, घायलों व शवों को देखकर दहला दिल, सीट बेल्ट तक चिपकी, डॉक्टर बोले – घायलों को बचाना प्राथमिकता। सबको पता है कि विमान का एक ही यात्री बचा और उसे चोट जरूर आई है वह चलकर एम्बुलेंस में गया है। ऐसे में घायलों से मतलब गैर यात्रियों से भी हो सकता है लेकिन उनके लिए यह नहीं कहा जायेगा कि, सीट बेल्ट तक चिपकी और घायलों को बचाना – डॉक्टर बोले तब रिपोर्टर को पता चला और उप संपादक, संपादक सबने ने खबर माना? घायलों को बचाना किसी की भी प्राथमिकता होनी चाहिये और किसी के बोलने-बताने की जरूरत कहां है? नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर जगह ही नहीं है और जो है वही ज्यादा है और सबसे खास है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शोक संदेश। अखबार के दूसरे पहले पन्ने पर भी गर्दन तक विज्ञापन है और दूसरी लीड का शीर्षक है, विमान में था 1.25 लाख लीटर ईंधन। यहां खबर है, पीएम मोदी आज जा सकते हैं अहमदाबाद।



