कमल शुक्ला-
ऐसे घटिया और भ्रष्ट लोगों का साथ छोड़े बिना किसी की भी वापसी पर विश्वास करना मुश्किल है।
मैंने कल खुद एक पोस्ट डालकर इस कार्यक्रम में आने के लिए साथियों को आमंत्रित किया था, जबकि मैं स्वयं इस कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं था। सिद्धार्थ वर्दराजन जैसे साहसी और विद्वान पत्रकार को आमंत्रित किए जाने और स्वयं रुचिर गर्ग की पुरानी शैली से वाकिफ होने के कारण मुझे लगा कि उनकी पत्रकारिता में सच में वापसी हो रही है।
लेकिन इस कार्यक्रम के पीछे किसका सहयोग है, यह पास में लगे चित्र से स्पष्ट हो जाता है। यह वही व्यक्ति है जिसने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को भीतर से खोखला कर दिया। उस समय गर्ग जी उनके सलाहकार थे और उनकी जनविरोधी नीतियों में हिस्सेदार भी।


इस चित्र ने साबित कर दिया है कि वह अब भी निष्पक्ष पत्रकार की भूमिका में नहीं हैं। अगर उन्हें सचमुच एक ईमानदार पत्रकार के रूप में अपनी वापसी दर्ज करानी है, तो उन्हें उस दौर का हिसाब देना चाहिए जब वे मुख्यमंत्री के सलाहकार थे। उन पाँच वर्षों में ‘फासिस्ट ताकतों से लड़ने’ के नाम पर फासिस्ट नीतियाँ लागू की गईं—राम वनगमन पथ, कौशल्या माता और छत्तीसगढ़ी माता जैसे प्रतीकों के ज़रिये क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा देना, कई निरर्थक योजनाएँ, हसदेव अरण्य की कटाई, बोधघाट जैसी अवांछनीय परियोजनाओं की घोषणाएँ और बस्तर में आदिवासियों पर अत्याचार जैसे मुद्दों पर उन्होंने चुप्पी क्यों साधे रखी?
फिलहाल, मैंने बिना आमंत्रण के इस कार्यक्रम में शामिल होने की तैयारी कर रखी थी, लेकिन अब जबकि इसका असली चेहरा सामने आ चुका है, मुझे इसमें जाना उचित नहीं लग रहा है।
अभिषेक श्रीवास्तव- कमल भाई, मैं खुलकर नहीं लिखा लेकिन इशारा इधर ही था। आप अब भी सिद्धहार्थ, अपूर्वनन्द जैसे लोगों को निष्पक्ष मान रहे हैं, ये आपका बड़प्पन है लेकिन ये सब के सब दूसरी वाली गोदी के पलिहर हैं। देर आए, दुरुस्त आए.
सुरेश महापात्रा- यह सही है कि राजनीति से परे पत्रकारिता की कसौटी का समय है। पर यदि पूर्व मुख्यमंत्री इस कार्यक्रम में एक सामान्य दर्शक, श्रोता की हैसियत से आ रहे हैं तो आपत्ति नहीं होनी चाहिए… यदि विशिष्ट भूमिका के साथ बुलाया गया है तो कमल भाई आपके तर्क पूरी तरह गलत नहीं हैं… रुचिर जी को मैं जितना जान समझ पाया वे भले ही तालाब में डूबे थे पर पानी उन्हें छुआ नहीं… वैसा ही वे अपने बारे में मानते हैं। सीएम हाउस में मुख्यमंत्री रहते Bhupesh Baghel जी ने पत्रकारों के दल के सामने Alok Putul से दुर्व्यवहार किया था तब वहां रूचिर जी भी थे। किसी ने प्रतिवाद नहीं किया। मुझे थोड़ी निराशा हुई थी। जब आप पर हमले की रिपोर्ट लेकर जाँच कमेटी की ओर से मैं सीएम हाउस पहुंचा था तब मैंने तब के सीएम भूपेश जी को नवभारत के पत्रकार और वर्तमान में रायपुर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रफुल्ल ठाकुर के बारे में शिकायत करते देखा सुना था। तब भी किसी ने प्रतिवाद नहीं किया रूचिर जी ने भी नहीं… इसके बाद प्रफुल्ल के साथ क्या हुआ यह इतिहास है… बावजूद इन घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी होने के मैं रूचिर जी की पत्रकारिता को निष्पक्ष ही मानता हूँ… कमल शुक्ला पर हमले की घटना के बाद मैने सबसे पहले तीव्र प्रतिक्रिया दी थी। इसके बाद कमेटी गठित कर जाँच के लिए भेजी गई। इसमें मुझे शामिल किया गया था। यह जानते हुए कि मैं घटना के बाद कम से कम सरकार या प्रशासन का पक्ष नहीं ले सकता… यह भी रूचिर जी की ही समझ थी वे पूरी सच्चाई जानना और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई चाहते थे… सबको नीर-क्षीर का हक है। मुझे भी… मैं तमाम सच्चाई के बाद भी रूचिर जी की पत्रकारिता में वापसी का स्वागत करता हूँ और चाहूँगा लड़ने के लिये दूसरा वक्त तलाश लेंगे… अभी वक्त साथ देने का है…
राहुल वर्मा- जिसे आप ‘क्षेत्रीयता’ कहते हैं, वह दरअसल छत्तीसगढ़िया लोगों की सांस्कृतिक और सामाजिक अस्मिता की लड़ाई है। अपनी भाषा, खानपान, पहनावे और परंपराओं के लिए लिखना, बोलना और ज़रूरत पड़ने पर लड़ना अगर ‘क्षेत्रवाद’ कहलाता है, तो फिर इस दुनिया में कोई भी सांस्कृतिक संघर्ष न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। भारत का संविधान स्वयं भाषाई और सांस्कृतिक आधार पर राज्यों के गठन की बात करता है। ऐसे में अपनी मौलिकता की रक्षा के लिए प्रयास करना न तो गलत है, न ही तंगदिली। छत्तीसगढ़ी भाषा लगभग तीन करोड़ लोगों की मातृभाषा है। ‘छत्तीसगढ़ महतारी’ एक भावना है, और यह वही भावना है जिससे प्रेरित होकर भारत माता की भी पूजा होती है। छत्तीसगढ़ी अस्मिता को ‘फासिस्ट’ कहकर संबोधित करना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि यह उन लाखों लोगों का अपमान है जो अपनी जड़ों से प्रेम करते हैं। एक व्यक्ति विशेष से नाराज़गी की वजह से पूरी संस्कृति को संदेह की निगाह से देखना अनुचित है। भूपेश बघेल अकेले छत्तीसगढ़ नहीं हैं। जिस धरती से आप अन्न-जल पाते हैं, उसकी संस्कृति की बात करने वालों को ‘क्षेत्रीयता फैलाने वाला’ कह देना बहुत ही संकुचित दृष्टिकोण है। फिर यह सवाल भी उठता है—भारत का कौन-सा राज्य है जहाँ लोग अपनी क्षेत्रीय पहचान, भाषा और संस्कृति के लिए काम नहीं कर रहे? तमिलनाडु से लेकर पंजाब, बंगाल, असम, महाराष्ट्र और गुजरात—हर जगह अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा को लेकर चेतना जागरूक रही है। क्या सभी को फासिस्ट कहा जाएगा? छत्तीसगढ़ का यह आंदोलन भी उतना ही वैध, स्वाभाविक और गरिमामय है।



