विजय गुप्ता-
मैं एक पत्रकार, साजिश का शिकार!
बिना किसी ठोस तथ्य और सबूत के मुझ पर ठगी का झूठा आरोप लगाने की कोशिश की गई, लेकिन सच्चाई को दबाया नहीं जा सकता।
पिछले दो महीनों से पुलिस इस मामले की जांच कर रही है, लेकिन अब तक मेरे खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला।
सबूत न मिलने के कारण पुलिस ने जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
पूरा मामला क्या है?
रीवा। कुछ दिनों पहले मुझ पर—यानी पत्रकार विजय गुप्ता पर—एक करोड़ रुपये की ठगी का झूठा आरोप लगाया गया। यह खबर बिना किसी ठोस आधार के इतनी तेजी से फैली कि रीवा से लेकर भोपाल तक चर्चा का विषय बन गई। इसकी वजह सिर्फ एक ही थी—यह सब एक सोची-समझी साजिश थी, जिसमें कुछ पत्रकार भी शामिल थे। इनका मकसद या तो मुझ पर दबाव बनाना था या मुझे मेरी संस्था से बाहर करवाना।
स्थानीय अखबारों और कई पत्रकारों ने इस खबर को प्रमुखता से चलाया, लेकिन किसी ने यह पुष्टि करने की कोशिश नहीं की कि आरोप सही हैं या सिर्फ मनगढ़ंत कहानियां।
शिकायतकर्ता डॉ. भानु सिंह ने अमहिया थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी। लेकिन कुछ पत्रकारों ने बिना जांच-पड़ताल किए ही मुझे अपराधी घोषित कर दिया। बड़ी-बड़ी हेडलाइंस के साथ मेरी तस्वीरें छापी गईं और लंबी-चौड़ी खबरें लिखी गईं, जिनका मकसद सिर्फ मुझे बदनाम करना और शिकायतकर्ता को खुश करना था।
मुझे क्यों निशाना बनाया गया?
जब से मैंने न्यूज 18 में बतौर पत्रकार काम शुरू किया, तब से ही कुछ लोगों को यह खलने लगा। पत्रकारों का एक गुट, जो न्यूज 18 में जगह पाने का सपना देख रहा था, मुझसे जलने लगा। जब मुझे रीवा में स्टिंगर के तौर पर नियुक्त किया गया, तो यही लोग मेरे खिलाफ साजिश रचने लगे।
पत्रकार बिरादरी में पहले से ही कुछ अनजाने दुश्मन थे, लेकिन मेरी बढ़ती लोकप्रियता और प्रतिष्ठा से चिढ़ने वाले लोग भी खुलकर मेरे खिलाफ आने लगे। इन सभी ने मिलकर एक ऐसा षड्यंत्र रचा, जिसका उद्देश्य था—
✔️ मुझ पर झूठा केस करवाना
✔️ मेरी छवि खराब करना
✔️ मुझे न्यूज 18 से बाहर करवाना
इस साजिश में वे काफी हद तक सफल भी रहे, लेकिन कहते हैं “सांच को आंच नहीं”। सत्य की हमेशा जीत होती है, और अब धीरे-धीरे इस साजिश में शामिल सभी चेहरे बेनकाब हो रहे हैं। जल्द ही इनके नाम भी सार्वजनिक होंगे।
पुलिस की जांच और मेरा पक्ष
अमहिया थाने में डॉ. भानु प्रताप सिंह की शिकायत के दो महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक पुलिस को मेरे खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला।
इसका एकमात्र कारण यह है कि पूरा मामला ही फर्जी है। शिकायतकर्ता कोई ऐसा प्रमाण नहीं दे सका जिससे यह साबित हो कि उसके साथ एक करोड़ रुपये की ठगी हुई है।
जब मुझे इस मामले की जानकारी मिली, तो मैंने खुद एसपी को पत्र लिखकर निष्पक्ष जांच की मांग की और लेन-देन से जुड़े सारे दस्तावेज पुलिस को सौंपे। लेकिन कुछ स्थानीय पुलिसकर्मी भी इस साजिश में शामिल थे। उन्होंने शिकायतकर्ता का पक्ष लिया और मुझे फंसाने के लिए कूट-रचित (फर्जी) दस्तावेज तैयार किए।
मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि थाने में दिए गए मेरे बयान से छेड़छाड़ की गई।
पुलिस ने मेरी मूल बातों में चार अतिरिक्त लाइनें जोड़ दीं ताकि यह दिखाया जा सके कि मैं खुद अपने गुनाह को कबूल कर रहा हूं और छह महीने में पैसे लौटाने की बात कह रहा हूं।
मैंने इस फर्जीवाड़े की लिखित शिकायत एसपी से की, और इसकी भी जांच चल रही है। कुल मिलाकर, पुलिस के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने साजिशकर्ताओं के साथ मिलकर इस फर्जी मामले को सच साबित करने की कोशिश की।
कुछ अहम सवाल जो पुलिस को जवाब देने चाहिए
❓ डॉ. भानु प्रताप सिंह, जो एक शिक्षित चिकित्सक हैं, उन्होंने एक करोड़ रुपये की इतनी बड़ी रकम बिना किसी लिखित दस्तावेज के कैसे दी?
अगर उनके पास कोई दस्तावेज हैं, तो अब तक उन्होंने पुलिस के सामने पेश क्यों नहीं किए?
❓ डॉ. भानु प्रताप सिंह, जो सालों से भोपाल में रह रहे थे, अचानक अपने पैसे की याद आ जाने पर रीवा क्यों आए और शिकायत दर्ज कराई?
❓ अगर पुलिस जांच निष्पक्ष कर रही थी, तो मेरे बयान के साथ छेड़छाड़ करने की जरूरत क्यों पड़ी?
जो दस्तावेज पुलिस इन्वेस्टिगेशन का अहम हिस्सा थे, वे लीक कैसे हो गए और उन्हें लीक करने वाला कौन था?
❓ जब मैंने खुद पुलिस को सभी संबंधित दस्तावेज सौंप दिए, तो जांच में देरी क्यों हो रही है?
अगर पुलिस सही से जांच करे, तो कई पत्रकार और मेरे करीबी लोगों की असलियत सामने आ जाएगी।
अंत में मेरी बात
मैंने हमेशा पत्रकारिता के सिद्धांतों पर चलते हुए काम किया है और किसी भी अनैतिक गतिविधि का हिस्सा नहीं रहा। इस मामले में सच को दबाने की हरसंभव कोशिश की गई, लेकिन मैं अपने सत्य और ईमानदारी पर अडिग हूं।
नोट: मेरे द्वारा सभी दस्तावेज और तथ्य पुलिस एवं संबंधित अधिकारियों को सौंपे जा चुके हैं।







मूल खबर-


