महेंद्र अवधेश-
पिछले दो-ढाई साल से दुर्भाग्य ने जीवन को इस कदर जकड़ रखा है कि कुछ कहते नहीं बनता। कई करीबी रिश्ते मुट्ठी से रेत की तरह फिसलते चले गए। और, अब विमलेंदु सिंह भाई साहब! साल 2006 का यही फरवरी माह था, जब मैं फोर्थ डाइमेंशन मीडिया (ओजोन ग्रुप) में नौकरी के लिए गया था। संपादक श्री विनोद श्रीवास्तव से संपर्क कराया था उस वक्त पहली बार मिले अग्रज श्री सत्येंदु मिश्र ने। संपादक जी के निर्देश पर मेरा टेस्ट (संपादन एवं प्रूफ रीडिंग) लिया विमलेंदु जी ने।

मार्च 2006 से अगस्त 2008 तक मैं फोर्थ डाइमेंशन में रहा। विमलेंदु जी संडे इंडियन जा चुके थे। उस पत्रिका में भी मुझे लिखने का मौका मिला। इधर-उधर लिखना और नौकरी की तलाश जारी थी। तब तक विमलेंदु जी चौथी दुनिया ज्वाइन कर चुके थे। सितंबर 2009 के आखिरी सप्ताह में उनका फोन आया कि बाराखंबा मेट्रो स्टेशन पर मिलिए सीवी के साथ। मुलाकात हुई तो कहा कि चौथी दुनिया में चांस मिल सकता है। कल सुबह ऑफिस आ जाइए। मैं दूसरे दिन चौथी दुनिया के कनॉट प्लेस स्थित ऑफिस पहुंचा।
वहां विमलेंदु जी ने मुझे डॉ मनीष कुमार से मिलवाया। एक दिन, दो दिन, तीन दिन..। मैं काम करता रहा। कोई जवाब नहीं मिला। मूड उखड़ा और मैं ऑफिस में किसी को बिना कुछ बताए ससुराल मुरादाबाद चला गया। दो-तीन दिन बाद लौटा, तो फिर चौथी दुनिया के ऑफिस गया। अक्टूबर शुरू हो गया था। विमलेंदु जी बोले, कहां रह गए थे? फोन भी नहीं लग रहा था! मैंने कहा कि कोई जवाब तो मिल नहीं रहा। तभी वहां से मनीष जी गुजरे, तो मुझे देखकर बोले कि मन लग रहा है? विमलेंदु जी ने बिना समय गंवाए पूछ लिया कि महेंद्र जी को लेकर क्या तय हुआ? मनीष जी तपाक से बोले, अरे इनका मीटर तो एक तारीख से स्टार्ट हो चुका है!
बाद में विमलेंदु जी घरेलू जिम्मेदारियों के चलते चौथी दुनिया छोड़कर बिहार वापस चले गए। मैं मई 2016 तक वहीं बना रहा। उनके साथ टेलीफोन पर संपर्क होता रहा। लेकिन इधर एक-डेढ़ साल से कोई बातचीत नहीं हो सकी। वजह वही, जिंदगी का संघर्षों में जकड़ जाना। विमलेंदु जी के साथ मेरी कई यादें जुड़ी हैं। वह दोस्तों के दोस्त, अनुजों के अग्रज, सीनियर से बढ़कर साथी रहे। बड़े भाई आपको शत-शत नमन…
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