दिनेश श्रीनेत-
मैंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन खत्म किया, हड़बड़ी में कंप्यूटर के कोर्स में दाखिला लिया, तब विंडोज से पहले वाले सॉफ्टवेयर यानी एमएस डॉस होते थे. मन नहीं लगा तो आधा-अधूरा कोर्स जैसे-तैसे कर लिया और उसके बाद नौकरी करने इलाहाबाद चला गया.
इलाहाबाद यानी कि शहर भी संगम जैसा. ऊपर से शांत मगर भीतरी सतह पर खूब हलचल होती थी. पत्रकारिता उसी शहर से करते-करते सीखी. जिन आयोजनों में बड़े रिपोर्टर नहीं जा पाते थे, उनका आमंत्रण मुझे थमा दिया जाता था.
गेस्ट हाउस में सीताराम येचुरी और वृंदा करात आने वाले थे. मुझे जिम्मेदारी मिली उनका इंटरव्यू करने की. यह वो समय था जब अखबारों के बीच कुछ एक्सक्लूसिव करने और बाईलाइन रिपोर्ट्स की होड़ रहती थी. मैं भी पीछे नहीं रहता था.
इसके पहले के चार-पांच साल पर्चा, अखबार, पोस्टर और नारे लगाने वाले कम्यूनिस्ट दोस्तों के साथ झांव-झांव में बीते थे. लिहाजा रात को बैठकर मैंने बड़ी मेहनत से सवाल तैयार किए. ट्रेड यूनियन की बदलती हालत, उदारीकरण, बेरोजगारी, महिला श्रमिकों से जुड़े मुद्दे समेत कुछ राजनीतिक सवाल भी थे. दोनों के लिए अलग-अलग कागज पर सवाल लिख रखे थे.
मैं अगले दिन सुबह करीब नौ बजे गेस्ट हाउस पहुंच गया, ताकि दूसरे मीडिया वाले न पहुँच सकें. यह उनकी चाय का वक्त था. उन दिनों अचानक जा धमकना पत्रकारों के लिए आसान था. उनका इतना सम्मान था कि मुझ जैसा कोई कॉलेज से निकला स्टूडेंट जैसा पत्रकार भी हो तो अक्सर मना नहीं किया जाता था.
मैंने जब सवाल पूछने शुरू किए तो वृंदा करात मुस्कुराईं, उन्होंने तंज़ में कहा कि आप अखबार के लिए कुछ लिखेंगे या रिसर्च पेपर लिखने की तैयारी कर रहे हैं. आपके सवाल तो ऐसे ही हैं. मगर येचुरी गंभीरता से हर सवाल के विस्तार में गए. उन्होंने बहुत सधे हुए सारे संदर्भों के साथ जवाब दिए. उनका अप्रोच देखते हुए वृंदा भी सहज हुईं और उन्होंने भी मेरे सारे भारी-भरकम सवालों का धैर्य से जवाब दिया.
यह मेरे जीवन का शायद दूसरा-तीसरा इंटरव्यू रहा होगा. मैं इसके बाद बहुत से राजनेताओं से मिला मगर येचुरी ने मन में जो छाप छोड़ी, वह आज भी बरकरार है. एक ठेठ राजनेता मगर जो बेहद पढ़ा लिखा है, इतिहास, अर्थशास्त्र और राजनीति को न सिर्फ समझता है बल्कि उस पर देर तक बोल भी सकता है… किसी भी सवाल से असहज होने की बजाय.
समय बदला है, येचुरी शायद अभी कुछ समय और सक्रिय रहते. उनके और उनके जैसे दूसरे बहुत से लीडर कम होते जा रहे हैं. दुनिया भी अब सवालों के प्रति पहले जैसी सहज नहीं रही.


