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आज के अखबार : जब चुनाव आयोग की साख ही नहीं बची है तो उसका स्पष्टीकरण पहले पन्ने पर क्यों?

संजय कुमार सिंह

आज नवोदय टाइम्स में एक अलग तरह की खबर पहले पन्ने पर है और यह है चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण। खबर में ही कहा गया है कि यह झूठ है। मुझे लगता है कि ऐसे मामले को पहले पन्ने पर रखने की क्या जरूरत? आज के समय में न तो चुनाव आयोग की ऐसी साख रह गई है कि उसके ‘स्पष्टीकरण’ को गंभीरता से लिया जाये और न ऐसा कोई कारण है कि उसे झूठ कहे जाने के बावजूद बताना जरूरी हो। ठीक है कि यह खबर है और ऐसे मामलों में निर्णय करने का अधिकार पाठकों पर ही छोड़ देने का रिवाज रहा है लेकिन ऐसी खबरें पहले पन्ने पर छपने लगें तो अंदर क्या छापेंगे? शीर्षक है, ईसी (यानी चुनाव आयोग) ने देरी से कदम उठाने के आरोप को किया खारिज। इस खबर के बीच में हाईलाइट किया हुआ अंश है, तृणमूल ने आयोग के दावे को बताया झूठ। मैंने आज इस मामले को सबसे पहले लिया है तो इसलिए कि कल ही सोशल मीडिया पर चर्चा थी (खबर भी) कि बिहार में उपचुनाव की तारीख दूसरे राज्यों की तरह 13 से 20 करने की मांग चुनाव आयोग ने तो नहीं ही मानी, सुप्रीम कोर्ट में इससे संबंधित याचिका खारिज हो गई। मुझे लगता है कि एक बार तारीख घोषित करने के बाद चुनाव की तारीख किसी पार्टी की मांग पर या किसी अन्य कारण से बदलना या बढ़ाना साबित करता है कि चुनाव आयोग ने अपना मूल काम ठीक ढंग से नहीं किया। चुनाव कराना आयोग का काम है और कराने का मतलब औपचारिकता निभाना नहीं है बल्कि इस ढंग से ऐसे समय में चुनाव कराये जाने चाहिये कि अधिकतम लोगों की आसान भागीदारी संभव हो और यह चुनाव लड़ने वालों के लिए ही नहीं, वोट देने वालों के लिए भी है। ऐसे में एक बार तारीख घोषित करने और प्रक्रिया शुरू होने के बाद तारीख बदलने से चुनाव लड़ने वालों पर प्रभाव पड़े या नहीं पड़े मतदान देने वाले कुछ लोगों पर तो पड़ेगा ही और जब हार जीत एक वोट से भी होना है तो हर वोट का मतलब है। आप जानते हैं कि इस बार महाराष्ट्र चुनाव देर से हो रहे हैं और उसके साथ घोषित उपचुनाव की तारीख बढ़ाई जा चुकी है।

मुझे चुनाव आयोग और चुनाव से संबंधित दो खबरें कल मालूम हुईं और दोनों चुनाव आयोग के इस स्पष्टीकरण से महत्वपूर्ण हैं। मेरा मानना है कि नवोदय टाइम्स में जिसने भी इस स्पष्टीकरण को पहले पन्ने पर रखने का फैसला किया उसे बिहार में तारीख नहीं बढ़ाये जाने की खबर भी मालूम होगी और तब उसे छोड़कर इसे महत्व देने का मतलब है, चुनाव आयोग को महत्व देना जिसके बारे में लग रहा है कि वह सरकार यानी भाजपा और संघ परिवार के पक्ष में काम कर रहा है। इस खबर में भी कहा गया है कि चुनाव आयोग पर “भाजपा की एक शाखा” में बदलने का आरोप लगाया गया है। ऐसे में मुझे लगता है कि उपचुनाव की तारीख बढ़ाने वाले चुनाव आयोग से संबंधित इस मामले को भी लोगों को जानना चाहिये। कल जब इस खबर को पहले पन्ने पर छापना तय हुआ होगा तभी यह भी खबर थी कि बिहार की रामगढ़, इमामगंज, बेलागंज और तरारी की चार सीटों पर विधानसभा उपचुनाव 13 नवंबर को होने हैं। मुख्य रूप से बिहार में करीब हफ्तेभर चलने वाले छठ का त्यौहार 8 नवंबर को पूरा हुआ है। 31-एक को दीवाली थी उसके बाद आठ तक छठ में व्यस्त रहने वाली बिहार की आबादी 13 को होने वाले उप चुनाव में कैसे और कितनी भागीदारी कर सकेगी यह समझाने की जरूरत नहीं है। फिर भी मांग पर (और कुछ राज्यों में पूरी करने के बावजूद) चुनाव आयोग अगर बिहार में तारीख नहीं बढ़ा रहा है तो साफ है कि उसे बिहार के चुनाव में लोगों की भागीदारी से मतलब नहीं है। यह तो एक बात हुई। दूसरी बात यह है कि तारीख बढ़ाने की कोशिश में अन्य लोगों के साथ पूर्व आईएएस और सांसद पवन वर्मा ने फोन कर चुनाव आयुक्त से बात करनी चाही। उनके लिए यह काम मुश्किल रहा और इसका वर्णन उन्होंने अपने एक लेख में किया है। उन्होंने लिखा है कि काफी प्रयास के बाद चुनाव आयुक्त से बात हुई पर उनकी मांग नहीं मानी गई। उनसे बातचीत के बाद चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश, केरल और पंजाब में विधानसभा के चुनाव की तारीख बढ़ा दी।

जनसुराज पार्टी ने बिहार में भी उपचुनाव की तारीख बढ़ाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी पर सोमवार को इसे खारिज कर दिया गया। आप जानते हैं कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के रिटायर होने और उससे पहले प्रधानमंत्री के उनके घर जाकर पूजा करने के सार्वजनिक वीडियो से मुख्य न्यायाधीश की छवि पर जो प्रभाव हुआ है उससे परेशान पूर्व मुख्य न्यायाधीश के कारण आजकल सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी समीक्षा और आलोचना के घेरे में हैं पर अभी वह मुद्दा नहीं है। हालांकि, आज इंडियन एक्सप्रेस में प्रताप भानु मेहता का एक लेख अपने समय के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के कार्यकाल पर है। इसमें उन्होंने लिखा है, डीवाई चंद्रचूड़ ने इसे (अपने समय के मुख्य न्यायाधीश को) व्यक्त करते हुए कहा कि नागरिक-राजनीतिक अधिकार व्यक्तिगत लाभ के कार्य हैं। लेख का जो हिस्सा अखबार ने हाई लाइट किया है उसके अनुसार, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के संबंध में स्कोर कार्ड वाला नजरिया एक श्रे णी वाली गलती पर आधारित है। यह कुछ इस तरह होता है जैसे अच्छे निर्णयों की संख्या एक्स, संदेहास्पद निर्णयों की संख्या वाई। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ इस प्रकार के अंकगणित से जो पता चलेगा उससे कहीं अधिक चतुर रहे। प्रधान मंत्री की ही तरह, वे किसी इमारत पर चमकदार पेंट की अच्छी-खासी मात्रा खर्च कर नींव को न्यायिक दीमकों के साथ सड़ने दे सकते हैं। पीछे मुड़कर देखें तो, अच्छे निर्णयों ने बिल्कुल वही काम किये हैं: वे लिबास और रूप को जीवंत रखते हैं ताकि हम यह मुगालता पाल सकें कि हमें अभी भी भारत के मुख्य न्यायाधीश से न्याय मिल सकता है।

भले ही मैं विषयांतर हो गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट भी देश की एक ऐसी संवैधानिक संस्था है जिसे बाकायदा बर्बाद किया गया है। पर बात हो रही थी, चुनाव आयोग की। छठ के लिए बिहार में चुनाव की तारीख नहीं बढ़ाने वाले चुनाव आयोग ने दूसरे राज्यों में चुनाव की तारीख बढ़ा दी क्योंकि केरल के पालक्कड़ विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग 13 से 15 नवंबर 2024 तक मनाए जाने वाले “कलपथी रास्तोलसवम” उत्सव में शामिल होगा। उत्तर प्रदेश में लोग कार्तिक पूर्णिमा मनाने के लिए तीन से चार दिन पहले ही यात्रा करते हैं। पंजाब में श्री गुरु नानक देव जी का 555वां प्रकाश पर्व 15 नवंबर को मनाया जाना है और 13 नवंबर से अखंड पाठ का आयोजन किया जाना है। ऐसा नहीं है कि चुनाव आयोग यह कहकर बच सकता है कि उसे केरल या पंजाब के त्यौहारों की जानकारी नहीं थी। चुनाव आयोग पूरे देश का है और जानकारी रखना या करना उसका काम है। फिर भी तारीख घोषित करने के बाद सूचना मिलने पर जब तारीख बढ़ाई गई तो बिहार की क्यों नहीं? वैसे भी छठ कोई नया या अनजाना त्यौहार नहीं है। अव्वल तो पहले ही इसका ख्याल रखा जाना चाहिये था ऐसी तारीख रखी ही नहीं जानी थी जिसे बढ़ाने की मांग हो। इनमें छठ ही नहीं बाकी राज्यों के त्यौहार भी शामिल हैं। जो भी हो, जब तीन राज्यों में उपचुनाव की तारीख बढ़ाई गई है तो चौथे में भी बढ़ाई जानी चाहिये थी ताकि पक्षपात या किसी विशेष सुविधा का आरोप नहीं लगता। पर चुनाव आयोग अब इन आरोपों की परवाह नहीं करता है और वही करता है जो उसका मन करता है। इसमें पहले त्यौहार की उपेक्षा और फिर किसी का कहना मानना ताकि किसी को कोई शक-शुबहा ना रहे, शामिल है।

चुनाव आयोग से भाजपा की मांग

चुनाव आयोग को अगर भाजपा की एक शाखा कहा जा रहा है तो इसका कारण है और ऊपर या पहले के कारणों के अलावा एक कारण है, चुनाव आयोग से भाजपा की मांग (और उनका पूरा होना)। दि एशियन एज में चार कॉलम में छपी खबर के अनुसार, भाजपा ने (अब) मांग की है कि राहुल गांधी को उसके खिलाफ बोलने से रोका जाये और पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे तथा राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर हो। आप जानते हैं कि सरकार में आने में बाद नरेन्द्र मोदी ने नियम बदलवा लिया और प्रधान प्रचारक के चुनावी दौरे देश के प्रधानमंत्री के सरकारी दौरे माने जाने जाने लगे, 2019 के लोकसभा चुनाव में पुलवामा के शहीद कैदियों के नाम पर वोट मांगे गये और 2024 में कांग्रेस पर झूठे आरोप लगाये गये। चुनाव आयोग ने समय रहते कार्रवाई तो नहीं ही की और जब पत्र लिखने की कार्रवाई की तो पत्र प्रधानमंत्री की बजाय पार्टी अध्यक्ष को पत्र लिखा। दूसरी ओर, मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी तो जवाब पार्टी अध्यक्ष ने दिया जो पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं हैं और अध्यक्ष रहते केंद्रीय मंत्री बना दिये गये हैं। कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ एफआईआर की मांग भाजपा पर संविधान को खत्म करने का आरोप लगाने के लिए की गई है और पार्टी ने इसे झूठ कहा है। चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन रोकना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है।

सरकार ने ऐसी व्यवस्था की थी और स्थितियां ऐसी बनने दी गईं कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सरकार ने ही की है और उन्हीं आयुक्तों पर निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी है। यह आयोग बंटेंगे तो कटेंगे और फिर एक हैं तो सेफ हैं जैसे नारों पर चुप्पी साधे हुए है जबकि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि किसी नागरिक को कटने (मरने) या अनसेफ (असुरक्षित) होने का डर नहीं रहे। सरकार की जिम्मेदारी है कि स्थितियां ऐसी रहें कि लोग न सिर्फ सुरक्षित महसूस करें बल्कि सुरक्षित रहें भी। इसके बावजूद डबल इंजन वाली सरकार के मुखिया (मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री) बंटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं जैसे नारों से नागरिकों को डरा रहे हैं। चुनाव लड़ने वाले नेताओं का ऐसा कहना और करना संविधान के खिलाफ है, चुनाव लड़ने वाले सभी बराबर हैं और जीतने-हारने तक इनमें कई बड़ा या छोटा नहीं होता है फिर भी एक तरफ दोनों नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है और सच दिखने वाले आरोप लगाने के लिए भाजपा कांग्रेस नेताओं के खिलाफ एफआईआर की मांग कर रही है। इसका पहले पन्ने पर होना उतना ही महत्वपूर्ण है। 

ट्रम्प और अमेरिका का असर चीन संबंध पर  

वैसे तो आज की सबसे बड़ी खबर मणिपुर में सीआरपीएफ की चौकी पर आतंकी हमला है। इसमें 10 उग्रवादियों के मारे जाने और एक सीआरपीएफ कर्मी के शहीद होने की खबर है। हालांकि, खबरों के लिहाज से मणिपुर विशेष श्रेणी का राज्य बना दिया गया है और आज इस खबर को लीड नहीं बनाने का कारण यह भी हो सकता है। वैसे भी, 10 आतंकी मारे गये हैं तो लीड बनाने पर सरकार जी के नाराज होने का कोई कारण नहीं है। पर यह मामला अभी मुझे अच्छी तरह समझ में नहीं आया है। इसलिये आज मैं लीड और सेकेंड लीड की बात नहीं कर रहा हूं। इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबरों से मैं कुछ असली खबरों को समझने और बताने की कोशिश कर रहा हूं। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, अमेरिका में ट्रम्प के जीतने के बाद भारत और चीन को साझी चुनौतियों से निपटने के लिए काम करना चाहिये। खबर यह भी है कि इस सिलसिले में दोनों देशों के अफसर अगले हफ्ते जी20 की बैठक में मिल सकते हैं और इसलिए चीन के अधिकारियों के अनुसार, दिल्ली और बीजिंग की कोशिश है कि संबंधों को 2020 से पहले की सामान्य स्थिति में ले आया जाये।  

जलवायु की चिन्ता ही नहीं

इंडियन एक्सप्रेस की एक और खबर का शीर्षक है, बैठक पर ट्रम्प की छाया। यह सीओपी 29 से संबंधित खबर है। सीओपी 29, का आयोजन 11 से 22 नवंबर 2024 तक बाकू, अजरबैजान में किया जा रहा है। यह संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन है। इस लिहाज से जलवायु (और पर्यावरण) भी इस समय महत्वपूर्ण है। इस संबंध में श्रुति व्यास ने नया इंडिया में लिखा है, काफी जटिल स्थितियों का दौर है और कोई भी इन जटिलताओं की मूल वजह – जलवायु में बदलाव – को गंभीरता से लेने के लिए तैयार नहीं है। न तो राजनैतिक बहस-मुबाहिसों में और न चुनावी चर्चाओं में इसका ज़िक्र होता है। पिछली गर्मियों में हुए हमारे आम चुनाव के दौरान जलवायु संकट चर्चा का मुद्दा नहीं था। इन दिनों दो राज्यों में चुनाव हो रहे है, लेकिन किसी भी छोटे-बड़े राजनैतिक दल या उसके किसी नेता ने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा है। महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जिसे जलवायु परिवर्तन का घातक प्रभाव झेलना पड़ा है – ग्रामीण क्षेत्रों में बार-बार पड़ने वाले सूखे से लेकर शहरी इलाकों में आने वाली बाढ़ तक। लेकिन वहां भी नौकरियाँ, आरक्षण, मुफ्त अनाज और साम्प्रदायिकता ही मुख्य मुद्दे हैं। यदि हम अपेक्षाकृत बड़े कैनवास पर बात करें तो ट्रंप के दुबारा चुनाव जीतने से सीओपी29 (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन) और भविष्य में होने वाले जलवायु सम्मेलनों पर अनिश्चितता के काले बादल घिर आए हैं। एक तरफ तो वैश्विक तापमान में वृद्धि को कम रखने के लिए ग्रीन हाउस गैसों का उर्त्सजन कम करने के बारे में चिंतन-मनन चल रहा है तो दूसरी तरफ हम दीवाली पर पटाखे चलाना नहीं रोक पाये और हमारे अखबार उसी में उलझे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की खबर और श्रुति व्यास की चिन्ता वैश्विक स्तर पर है तो अमर उजाला की पांच कॉलम की लीड का शीर्षक है, कोई धर्म प्रदूषण फैलाने की अनुमति नहीं देता, स्वच्छ हवा सबका मौलिक अधिकार है। यही लीड नवोदय टाइम्स में है।

अखबार भी क्या करें जब प्रधानमंत्री कह रहे हैं और किसी भी तरह चुनाव जीतने की कोशिशों में लगे हैं। उन्होंने कहा है कि संविधान की बात करने वाले, उनके कार्यकाल का सच बताने वाले विपक्ष के लोग (जो उनके अनुसार राष्ट्र विरोधी हैं) समाज को बांटने का प्रयास कर रहे हैं और इसीलिए वे एक हैं तो सेफ हैं का ज्ञान दे रहे हैं भले इसका मतलब कुछ खास लोगों को एक रखना और सरकारी कार्रवाई से बचाना बताया और समझा जा रहा है। अखबार इसे नहीं बतायेंगे और संविधान को खत्म करने के प्रयासों पर मीडिया में पहले पन्ने पर कुछ खास क्यों नहीं है। और होता है उसकी दूसरी मिसाल अमर उजाला में है, विदेशी चंदे से धर्मांतरण कराया तो निरस्त होगा एनजीओ का लाइसेस। यह गृहमंत्रालय की चेतावनी है और तब है जब समाज सेवा से लेकर स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले सैकड़ों एनजीओ के लाइसेंस रद्द हो चुके हैं और यह असल में विदेशी चंदा लेने से रोकने की कार्रवाई है। मुझे लगता है कि सरकार का विरोध करने वालों की कमाई रोक कर उन्हें कमजोर करना राजनीति सबसे आसान है और हिन्दुत्व की आड़ में यह सब करना आसान है। जो भी हो, यह चुनाव प्रचार है – इसपर गौर किया जाना चाहिये। पर (ज्यादातर) अखबारों के लिए यह मुद्दा नहीं है।

झारखंड में घुसपैठियों का हौव्वा

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जो कहा है वह हिन्दुस्तान टाइम्स में उनकी एक कॉलम की फोटो के साथ तीन कॉलम में है। इसका शीर्षक हिन्दी में इस तरह होगा, घुसपैठियों को झारखंड से खदेड़ने के लिए शाह ने पैनल बनाने का आश्वासन दिया। आप जानते हैं कि घुसपैठ अंतरराष्ट्रीय सीमा से ही होगी। झारखंड की सीमा किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा से नहीं लगती है, 10 साल से केंद्र में भाजपा का शासन है और अंतरराष्ट्रीय सीमा से घुसपैठ रोकना भाजपा का ही काम है तब यह भाजपा के अनुसार होता रहा है और अब जब 10 साल सत्ता में रहते हो गये तो कहा जा रहा है कि झारखंड की सत्ता में आ गये तो घुसपैठियों को खदेड़ देंगे जबकि जहां डबल इंजन की सरकार है वहां बंटेंगे तो कटेंगे जैसे डर दिखाये जा रहे हैं और राष्ट्रीय स्तर पर इसका परिष्कृत रूप है, एक हैं तो सेफ हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट के इस सवाल को लीड बनाया है कि पटाखों पर पूरे साल प्रतिबंध रहे? शीर्षक के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दिल्ली से फैसला करने के लिये कहा है। आप जानते होंगे कि दीवाली से पहले दिल्ली सरकार के मंत्री इस संबंध में दिल्ली के उपराज्यपाल से निवेदन कर रहे थे और भाजपा के नेताओं ने भी प्रतिबंध के बावजूद पटाखे चलाये। दीवाली पर एक दिन जितना पटाखा चलता है उतना पूरे एक साल नहीं चलता। सुप्रीम कोर्ट, सरकार और पूरी व्यवस्था मिलकर दीवाली पर पटाखे नहीं रोक पाये अब चाहते हैं कार्रवाई हो और सुप्रीम कोर्ट ने फैसला लेने के लिए कहा है जो टीओआई में आज लीड है।

सड़क दुर्घटनाओं में 15 लाख लोग मरे   

टीओआई ने आज यह भी बताया है कि सड़क बनाने का रिकार्ड और उसका भरपूर प्रचार करने वाली सरकार के शासन के 10 वर्षों में दिल्ली भर में 15 लाख लोगों की मौत हुई है। कल ही एक परिवार के पांच लोगों की मौत की खबर थी। उनकी गाड़ी सड़क पर खड़ी खराब ट्रक से टकरा गई। कहने की जरूरत नहीं है कि सड़कें बनाना अगर अच्छा और प्रशंसनीय काम भी हो और सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये (और यह मुश्किल नहीं है) कि एक्सप्रेस वे पर प्रवेश करने वाली सभी गाडियों पर पीछे लाइट और रिफ्लेक्टर हो। अगर यह जिम्मा टोल लेने वालों को ही सौंप दिया जाये और पैसे वाहन चालक को देने हों तो यह काम कोई मुश्किल नहीं है। सामान्य इच्छा शक्ति से हो सकता है। हालांकि, इससे ज्यादा जरूरी है कि खराब गाड़ियों को सड़क से तत्काल हटाने और उन्हें खड़ी रखने की व्यवस्था करना सड़क बनाने से ज्यादा जरूरी है और उसे तेज गति से किया जाना चाहिये था। 10 साल में 15 लाख मौतों का मतलब होता है, हर साल डेढ़ लाख ऐसे लोग मर रहे हैं जो कार में चलते हैं। गरीबों को कौन पूछे?

द टेलीग्राफ महाराष्ट्र के मुद्दों पर

द हिन्दू ने अजरबेजान के बाकू शहर में शुरू होने वाली जलवायु चर्चा की खबर को सेकेंड लीड बनाया है और बताया है कि पेरिस में हुए जलवायु समझौते के लक्ष्य मुश्किल में हैं और 2024 में तापमान के नए रिकार्ड बनेंगे। द टेलीग्राफ में आज भी महाराष्ट्र चुनाव की विशेषता को प्रमुखता मिली है। मणिपुर में सुरक्षा बलों की गोली से मारे गये 10 लोगों को उग्रवादी कहा गया है और यहां यही खबर लीड है लेकिन उग्रवादी इनवर्टेड कॉमा में है और मणिपुर अगर डेढ़ साल से जल रहा तथा दिल्ली में यह मुद्दा ही नहीं है तो इनवर्टेड कॉमा पर ध्यान देने का समय किसे है खासकर तब जब पर्यावरण और जलवायु की चिन्ता नहीं है। कुल मिलाकर, लगता है कि मंदिर बनाने या भ्रष्टाचार मिटाने जैसे आश्वासनों से सत्ता पाने वाली भाजपा की सरकार अब किसी तरह सत्ता में बने रहने के लिए परेशान है। पांच साल महाराष्ट्र में यही हुआ है और दूसरे राज्यों में भी यह सब होता रहता है। इसके लिए बंटेंगे तो कटेंगे जैसे संविधान विरोधी नारे और विचार हैं तथा इसका बेहतर रूप एक हैं तो सेफ हैं का मतलब अगर यह बताया गया है कि कौन लोग सुरक्षित हैं तो मामला बिल्कुल साफ है। ऐसे में अखबारों का झुकाव तो पहले से पता था चुनाव आयोग का झुकाव भी अब दिखने लगा है। टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिन्दे का समर्थन मोदी-योगी के विभाजक नारे को नहीं, विकास को है। लेकिन समझने वाली बात यह है कि महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार उन्हीं के सहयोग से चली इसके लिए उनने महाराष्ट्र में मजबूत शिवसेना तोड़ दी या टूटने दी और अब मोदी से अलग हो जायेंगे तो अकेले क्या कर पायेंगे? निश्चित रूप से ऐसा शिन्दे के निजी अनुभवों के कारण हो रहा है और अगर कुछ खास है तो उन्हें भविष्य के लिए राजनीतिकों को इसकी जानकारी देनी चाहिये पर क्या वे ऐसे करेंगे? कर पायेंगे?

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