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तरुण तेजपाल : अंदर की कहानी क्या है?

Male speaker with gray beard on a dark stage, hands raised in a gesturing pose while talking.

ऑपरेशन वेस्ट एंड, ऑपरेशन कलंक जैसे स्टिंग ऑपरेशनों से भाजपा सरकार की चूलें हिला देने वाले चर्चित खोजी पत्रकार तरुण तेजपाल को अब जाकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार ने कायदे से रगड़ा है। एक समय कांग्रेसी टूलकिट का दर्जा पा चुके तेजपाल ने भाजपा की अटल सरकार को 2001 में पानी पिला दिया था। यहां तक की तहलका और तेजपाल के स्टिंग से दबाव में आकर तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को अपना इस्तीफा तक देना पड़ा था। तेजपाल की पूरी कहानी को भारतीय पत्रकारिता में एक यादगार घटनाक्रम के रूप में पढ़ा जाएगा। कोई कायदे की सरकार आई बनी तो तेजपाल भाई को पत्रकारिता के सिलेबस में छपने से कोई रोक नहीं सकता। क्या है पूरा किस्सा नीचे सिलसिलेवार पूरा पढ़ जाइये….


मनीष दुबे-

कभी भारतीय खोजी पत्रकारिता में सत्ता और व्यवस्था को चुनौती देने वाले नाम के तौर पर पहचाने जाने वाले तरुण तेजपाल अब अपनी पत्रकारिता से नहीं, बल्कि 2013 के यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म मामले में हुई दोषसिद्धि के कारण सुर्खियों में हैं।

6 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने 2021 के ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को पलटते हुए तेजपाल को दोषी ठहराया और 10 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने उन पर ₹10.1 लाख का जुर्माना भी लगाया और आत्मसमर्पण के लिए दो सप्ताह का समय दिया।

लेकिन तेजपाल की कहानी सिर्फ एक आपराधिक मुकदमे की कहानी नहीं है। यह भारतीय पत्रकारिता के उस दौर की भी कहानी है, जब एक छोटे से न्यूज पोर्टल तहलका ने स्टिंग ऑपरेशन के जरिए राष्ट्रीय राजनीति में भूचाल पैदा कर दिया था। यही पत्रकार बाद में खुद एक ऐसे मामले में आरोपी बना, जिसमें पहले निचली अदालत ने उसे बरी किया और करीब पांच साल बाद हाईकोर्ट ने उसी मामले में दोषी ठहरा दिया।

Man with gray beard holds a Tehelka newspaper showing a large central image and bold headline front page.

तरुण तेजपाल भारतीय पत्रकारिता के चर्चित संपादक और तहलका के संस्थापक रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में कई संस्थानों में काम करने के बाद वर्ष 2000 में तहलका की शुरुआत की। तहलका ने शुरुआत में वेबसाइट के रूप में काम किया और बाद में समाचार पत्रिका का रूप लिया।

तहलका की पहचान पारंपरिक रिपोर्टिंग से ज्यादा अंडरकवर पत्रकारिता, स्टिंग ऑपरेशन और सत्ता से सीधे सवाल करने वाली खोजी रिपोर्टिंग से बनी। इस पहचान ने तेजपाल को भारतीय मीडिया के सबसे चर्चित संपादकों में शामिल कर दिया।

लेकिन इस सफर में दो स्टिंग ऑपरेशन खास तौर पर महत्वपूर्ण रहे—ऑपरेशन वेस्ट एंड और बाद में गुजरात दंगों पर किया गया ऑपरेशन कलंक।

तहलका का सबसे बड़ा शुरुआती धमाका था ऑपरेशन वेस्ट एंड।

तहलका के पत्रकार मैथ्यू सैमुअल और अनिरुद्ध बहल ने खुद को एक काल्पनिक विदेशी रक्षा कंपनी के प्रतिनिधि के रूप में पेश किया। उन्होंने रक्षा सौदे में मदद के नाम पर सैन्य अधिकारियों, रक्षा मंत्रालय से जुड़े लोगों और राजनीतिक संपर्कों तक पहुंच बनाई।

कैमरे पर कथित तौर पर रिश्वत के लेन-देन रिकॉर्ड किए गए। इस स्टिंग में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण भी कैमरे पर पैसे लेते हुए दिखाई दिए। मामला सामने आने के बाद उन्होंने भाजपा अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में 2012 में विशेष सीबीआई अदालत ने उन्हें भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराते हुए चार साल की सजा सुनाई।

स्टिंग की जांच और उससे जुड़े विवाद ने तत्कालीन एनडीए सरकार को भारी राजनीतिक दबाव में डाल दिया। तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस, समता पार्टी की नेता जया जेटली और रक्षा सौदों से जुड़े कई लोगों के नाम भी मामले में सामने आए।

हालांकि ऑपरेशन वेस्ट एंड को लेकर पत्रकारिता की नैतिकता पर भी गंभीर बहस हुई। स्टिंग के दौरान अधिकारियों को फंसाने के लिए अपनाए गए तरीकों और कथित तौर पर सेक्स वर्करों के इस्तेमाल पर सवाल उठे। यानी तहलका की खोजी पत्रकारिता ने जहां सत्ता को कटघरे में खड़ा किया, वहीं उसने स्टिंग पत्रकारिता की सीमाओं और नैतिकता पर भी बहस शुरू कर दी।

स्टिंग के बाद तहलका पर सरकारी दबाव के आरोप

ऑपरेशन वेस्ट एंड के बाद तहलका और उससे जुड़े लोगों पर सरकारी एजेंसियों की कार्रवाई और दबाव की खबरें भी सामने आईं। तहलका के शुरुआती निवेशकों और समर्थकों पर छापे पड़े, विज्ञापनदाताओं के पीछे हटने और संस्थान की आर्थिक मुश्किलों की खबरें आईं। एक समय तहलका को अपना रूप बदलना पड़ा और बाद में उसने पत्रिका के रूप में वापसी की।

इसी दौर ने तेजपाल की उस छवि को मजबूत किया जिसमें वह खुद को सत्ता-विरोधी और स्वतंत्र खोजी पत्रकारिता के प्रतिनिधि के रूप में पेश करते थे।

तहलका की दूसरी बड़ी खोजी परियोजनाओं में ऑपरेशन कलंक शामिल था। 2007 में पत्रकार आशीष खेतान ने गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि में अंडरकवर रिपोर्टिंग की।

इसमें बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और दंगों से जुड़े विभिन्न लोगों से बातचीत रिकॉर्ड की गई। इन स्टिंग टेपों में दंगों में भूमिका और स्थानीय स्तर पर हुई हिंसा को लेकर कई दावे सामने आए।

इस रिपोर्ट ने देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा विवाद पैदा किया।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक अंतर समझना जरूरी है। यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने इन स्टिंग टेपों को गुजरात दंगों की ‘बड़ी साजिश’ का निर्णायक कानूनी सबूत मान लिया था।

2022 में जकिया जाफरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तहलका के स्टिंग का संबंध स्थानीय स्तर की साजिश के आरोपों से था और वह उस बड़ी साजिश के आरोप से संबंधित नहीं था जिसकी जांच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एसआईटी ने की थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि स्टिंग में दर्ज व्यक्तियों के बयान बिना corroboration के दूसरे लोगों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किए जा सकते।

यानी ऑपरेशन कलंक राजनीतिक और पत्रकारिता के स्तर पर बेहद प्रभावशाली रहा, लेकिन उसके कानूनी प्रभाव को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

और फिर आया 2013…

तेजपाल के करियर का सबसे बड़ा मोड़ नवंबर 2013 में आया।

गोवा में तहलका का वार्षिक THiNK Festival आयोजित किया जा रहा था। इसी दौरान तहलका में काम करने वाली एक जूनियर महिला पत्रकार ने आरोप लगाया कि तेजपाल ने गोवा के एक होटल की लिफ्ट में दो मौकों पर उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन हमला और दुष्कर्म किया।

महिला पत्रकार उस समय कार्यक्रम की टीम का हिस्सा थीं और तेजपाल संगठन में उनसे वरिष्ठ पद पर थे। मामला सामने आने के बाद तहलका के भीतर ई-मेल संवाद सार्वजनिक हुए। महिला पत्रकार ने अपनी शिकायत तत्कालीन मैनेजिंग एडिटर शोमा चौधरी को भेजी थी। तेजपाल ने कुछ समय के लिए संपादक पद से हटने की घोषणा की और मामले को लेकर माफी से संबंधित ई-मेल भी सामने आए। इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा और 23 नवंबर 2013 को एफआईआर दर्ज हुई। तेजपाल को 30 नवंबर को गिरफ्तार किया गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2014 में उन्हें जमानत दे दी।

तेजपाल ने आरोपों से इनकार किया और पूरे मामले को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ बताया।

उनका दावा था कि तहलका ने भाजपा और उसके नेताओं के खिलाफ कई बड़ी खोजी रिपोर्ट की थीं और इसी वजह से भाजपा सरकार वाले गोवा में उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। यह दावा उन्होंने अदालतों में भी उठाया।

यह राजनीतिक एंगल इस मामले का सबसे विवादित हिस्सा रहा।

एक तरफ तेजपाल का दावा था कि वे राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार हैं। दूसरी तरफ भाजपा और उसके नेताओं ने तहलका पर कांग्रेस के प्रति नरम रुख रखने के आरोप लगाए थे।

लेकिन किसी अदालत ने यह स्थापित नहीं किया कि 2013 का यौन अपराध मामला किसी राजनीतिक साजिश का हिस्सा था। इसी तरह केवल तहलका की भाजपा-विरोधी रिपोर्टिंग के आधार पर राजनीतिक साजिश को तथ्य के रूप में पेश करना भी उचित नहीं होगा।

2014 में 2,846 पन्नों की चार्जशीट

गोवा पुलिस ने मामले में करीब 2,846 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की। इसमें 150 से अधिक गवाहों के बयान और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का उल्लेख था। पुलिस ने आरोप लगाया कि महिला पत्रकार पर दो बार हमला हुआ था।

मामला कई वर्षों तक अदालत में चलता रहा।

2017 में आरोप तय हुए। तेजपाल ने आरोपों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन मुकदमा जारी रहा। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रायल रोकने की उनकी मांग खारिज कर दी और मामले की सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया।

करीब आठ साल की कानूनी प्रक्रिया के बाद 21 मई 2021 को गोवा की मापुसा जिला एवं सत्र अदालत ने तरुण तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन की कहानी, पीड़िता के बयानों और CCTV सहित उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।

ट्रायल कोर्ट के फैसले में महिला के व्यवहार और उसके बयानों में कथित विसंगतियों को भी महत्व दिया गया था। इस फैसले की व्यापक आलोचना हुई और इस बात पर बहस छिड़ी कि यौन हिंसा के मामलों में अदालतें पीड़िता से किस तरह के व्यवहार की अपेक्षा करती हैं।

ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद गोवा सरकार (BJP के डॉ. प्रमोद सावंत गोवा के वर्तमान मुख्यमंत्री हैं) ने बरी किए जाने को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। यहीं से इस 13 साल पुराने मामले की कहानी ने एक और मोड़ लिया।

हाईकोर्ट में अभियोजन ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का गलत मूल्यांकन किया और पीड़िता की गवाही तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सही संदर्भ में नहीं देखा।

अब 6 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया। अदालत ने तेजपाल को दोषी ठहराते हुए 10 साल के सश्रम कारावास और ₹10.1 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई। उन्हें आत्मसमर्पण के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियों में पीड़िता की गवाही को उच्च गुणवत्ता की गवाही माना जाना, CCTV से घटनाक्रम की टाइमलाइन का समर्थन मिलना और तेजपाल की ओर से भेजे गए माफी वाले ई-मेल को महत्वपूर्ण साक्ष्य के तौर पर देखना शामिल है। अदालत ने ‘आदर्श पीड़िता’ की धारणा को भी खारिज किया।

अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पीड़िता के साथ किए गए व्यवहार पर भी गंभीर टिप्पणी की।

  • एक ही मामले में दो बिल्कुल अलग न्यायिक निष्कर्ष।
  • यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।

2021 में: गोवा की सत्र अदालत ने कहा—अभियोजन आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।

2026 में: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा—उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध होता है और ट्रायल कोर्ट का बरी करने वाला निष्कर्ष टिकाऊ नहीं है।

यानी एक ही मामले में दो अदालतों ने उपलब्ध सामग्री की अलग-अलग व्याख्या की और अंततः अपीलीय अदालत ने दोषसिद्धि दर्ज की।

तरुण तेजपाल की कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास शायद यही है कि एक दौर में वे सत्ता से सवाल पूछने वाली पत्रकारिता के प्रतीक थे। ऑपरेशन वेस्ट एंड ने रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के आरोपों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। ऑपरेशन कलंक ने गुजरात दंगों को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए। तहलका की अपनी वेबसाइट आज भी तेजपाल को संस्था के संस्थापक के तौर पर पेश करती है और उसके खोजी पत्रकारिता के इतिहास को रेखांकित करती है। लेकिन 2013 के मामले ने इस छवि को पूरी तरह बदल दिया। जिस मीडिया संस्था की पहचान सत्ता के ताकतवर लोगों से जवाब मांगने की थी, उसी संस्था के शीर्ष संपादक पर अपनी महिला सहकर्मी के साथ यौन अपराध का आरोप लगा। और अब 13 साल बाद हाईकोर्ट की दोषसिद्धि ने उस कहानी को एक निर्णायक मोड़ दिया है।

कानूनी तौर पर यह समझना जरूरी है कि राजनीतिक प्रतिशोध का दावा और यौन अपराध का मुकदमा दो अलग सवाल हैं।

तेजपाल ने शुरुआत से राजनीतिक प्रतिशोध का दावा किया। लेकिन अदालत का मौजूदा फैसला अपराध से संबंधित साक्ष्यों के मूल्यांकन पर आधारित है। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि की है।

इसलिए इस फैसले को केवल भाजपा बनाम तेजपाल या कांग्रेस बनाम भाजपा के राजनीतिक चश्मे से देखना मामले की न्यायिक वास्तविकता को छोटा कर देगा।

पहला अध्याय—खोजी पत्रकारिता: तहलका, ऑपरेशन वेस्ट एंड और सत्ता के गलियारों में भ्रष्टाचार के आरोप।

दूसरा अध्याय—2013 का विवाद: THiNK Festival, महिला सहकर्मी के आरोप, पुलिस केस, गिरफ्तारी और राजनीतिक प्रतिशोध का तेजपाल का दावा।

तीसरा अध्याय—न्यायिक पलटाव: 2021 में बरी, गोवा सरकार की अपील और 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट की दोषसिद्धि और 10 साल की सजा।

Hindi timeline infographic about a case, showing a bearded man on the right and dated events from 2013 to 2026.

अब आगे क्या?

हाईकोर्ट के फैसले के बाद कानूनी प्रक्रिया का अगला चरण अभी बाकी है। तेजपाल के पास उच्चतर अदालत में फैसले को चुनौती देने के कानूनी विकल्प मौजूद हैं। इसलिए 6 अगस्त 2026 का फैसला मौजूदा अपीलीय स्थिति में दोषसिद्धि है, लेकिन इसे पूरे न्यायिक तंत्र में अंतिम संभव चरण मानना अभी जल्दबाजी होगी।

तेजपाल की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक व्यक्ति के उत्थान और पतन की कहानी नहीं है। यह भारतीय मीडिया के उस दौर का दस्तावेज भी है, जिसमें स्टिंग पत्रकारिता ने सत्ता को चुनौती दी, पत्रकारिता की सीमाओं पर बहस खड़ी की और अंततः उसी पत्रकारिता की दुनिया के एक सबसे प्रभावशाली संपादक को एक गंभीर आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ा।

13 साल बाद कहानी का न्यायिक अध्याय बदल गया है—2013 का आरोपी अब 2026 के हाईकोर्ट फैसले में दोषी है। लेकिन इस फैसले के खिलाफ आगे की कानूनी लड़ाई क्या दिशा लेती है, यह देखना अभी बाकी है।

मूल खबर…

तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल पर वज्रपात, यौन उत्पीड़न मामले में निचली अदालत का बरी करने वाला फैसला पलटा, हाईकोर्ट ने सुनाई 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा

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