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साहित्य

रांगेय राघव की यह किताब पढ़कर मुझे नाथ संप्रदाय के बारे में एक बिल्कुल नई दृष्टि मिली!

Hindi-language book cover with bold Devanagari title and a smaller subtitle; abstract grayscale background with vertical lines and geometric blocks.

लक्ष्मण सिंह देव-

रांगेय राघव की यह किताब पढ़कर मुझे एक बिल्कुल नई दृष्टि मिली। रांगेय राघव की पारिवारिक पृष्ठभूमि बेहद अनोखी थी—वे एक ऐसे दक्षिण भारतीय तमिल परिवार से ताल्लुक रखते थे जो लगभग तीन शताब्दी पहले तमिलनाडु से आकर बृज क्षेत्र में बस गया था। रांगेय राघव ने गुरु गोरखनाथ जी के विषय में गहन शोध करके अपनी पीएचडी (Ph.D.) की थी। इस किताब में ऐसे अनेक ऐतिहासिक तथ्य समाहित हैं जो प्रचलित और रूढ़ मान्यताओं को पूरी तरह ध्वस्त कर देते हैं।

किताब का पहला हिस्सा गुरु गोरखनाथ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। प्रचलित लोकमान्यताओं के अनुसार गुरु गोरखनाथ का समय आमतौर पर आठवीं शताब्दी माना जाता है, जबकि कुछ अन्य विद्वानों की मान्यताओं के अनुसार उनका काल 11वीं शताब्दी ठहरता है। [यहाँ यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि गुरु गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ को नेपाल में राष्ट्रीय संत का दर्जा प्राप्त है। जिस गुफा में गुरु गोरखनाथ ने कठिन तपस्या की थी, उसी गुफा के नाम पर उस जिले का नाम ‘गोरखा’ पड़ा और आगे चलकर नेपाली सैनिकों को ‘गोरखा’ कहा जाने लगा—ये तथ्य इस किताब में शामिल नहीं हैं, परंतु इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।]

नाथ संप्रदाय अपने दौर का एक विशाल और अत्यंत प्रभावशाली संप्रदाय था। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसके अनुयायी अपने आपको पारंपरिक अर्थों में हिंदू एवं मुसलमान दोनों से अलग और स्वतंत्र मानते थे। गुरु गोरखनाथ से जुड़ी अनेक प्राचीन किताबों, ग्रंथों और लोक-किस्सों का जिक्र मिलता है; यह सामग्री इतनी भारी मात्रा में उपलब्ध है कि किसी भी शोधार्थी या पाठक के मन में भ्रम पैदा हो जाना स्वाभाविक है।

रांगेय राघव के अनुसार गोरखनाथ के संप्रदाय की मुख्य 12 शाखाएँ (बारह पंथ) थीं और इस पूरे संप्रदाय का मुख्य केंद्र यानी मुख्यालय ‘टीला जोगियान’ था, जो वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है। गोरखपुर स्थित नाथ मठ के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए किताब बताती है कि इसे पहली बार अलाउद्दीन खिलजी ने ध्वस्त कराया था। इसके बाद जब दूसरा मठ बनाया गया, तो उसे औरंगजेब ने ध्वस्त करवा दिया था। [तीसरे मठ के निर्माण के लिए अवध के शिया नवाबों ने जमीन दी थी। संभवतः इसका कारण शियाओं का अल्पसंख्यक होने के नाते मेजॉरिटी (बहुसंख्यक) समुदाय से अच्छे और सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास रहा होगा—ऐसा मेरा अपना व्यक्तिगत मत है, यह बात किताब में नहीं लिखी है।]

गुरु गोरखनाथ ने भारतीय योग परंपरा के विकास और उसे जन-जन तक पहुँचाने में बहुत बड़ा योगदान दिया। महान योगी भर्तृहरि [जिनके नाम पर आज हरिद्वार की प्रसिद्ध ‘हर की पौड़ी’ है] गुरु गोरखनाथ के ही प्रमुख शिष्यों में से एक थे।

शुरुआती दौर में अनेक मुसलमानों ने भी नाथ पंथ को अपनाया था। मैंने स्वयं ईरान के अनेक इलाकों में भ्रमण के दौरान ऐसे नाथपंथी जोगी देखे हैं जो अब अपनी मूल नाथ परंपरा और जड़ों से एकदम कट चुके हैं। सैकड़ों साल पहले ही नाथ पंथ ईरान और अफगानिस्तान जैसे सुदूर क्षेत्रों में फैल गया था; यहाँ तक कि कुछ साहसी नाथपंथी योगी रूस के अत्यंत दुर्गम और शीत इलाकों तक भी पहुँच गए थे।

इस पुस्तक में एक और अत्यंत रोचक घटना का जिक्र आता है: गुरु मत्स्येन्द्रनाथ कश्मीर के कौल तंत्र और वामाचार से प्रभावित होकर उसमें उलझ गए थे। जब गुरु गोरखनाथ को इस बात का पता चला, तो उन्होंने अपने गुरु मत्स्येन्द्रनाथ को जमकर खरी-खोटी सुनाई और उन्हें उस मार्ग से वापस निकाला। इसके बाद गुरु गोरखनाथ ने स्त्री-निंदा और काम-नियंत्रण से अपने अभियान का आरंभ किया। उनका स्पष्ट मानना था कि स्त्री-आकर्षण और कामासक्ति के कारण उनके नाथ योगी अपने साधना-पथ से भटक रहे थे। गोरख मत के दार्शनिक सिद्धांत के अनुसार, पुरुष जितनी स्त्रियों के साथ मैथुन या भोग करता है, उसे मुक्ति पाने से पहले उतनी ही अलग-अलग योनियों में पुनर्जन्म लेना पड़ता है।

किताब का आखिरी हिस्सा गुरु गोरखनाथ की प्रामाणिक वाणियों, पदों और सबदियों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की प्रसिद्ध किताब ‘नाथ संप्रदाय’ इनसे पहले प्रकाशित हो चुकी थी, इसलिए रांगेय राघव ने अपनी इस कृति में द्विवेदी जी के शोध के कई महत्वपूर्ण संदर्भों को शामिल करते हुए उनके निष्कर्षों को आगे बढ़ाया है।

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