सिद्धांत मोहन-
नहीं रहे छत्तीसगढ़ के पत्रकार मुकेश चंद्राकर। मुकेश उन कुछ पत्रकारों में से एक थे, जो दो सालों पहले बस्तर के जंगलों में गए। फिर नक्सलियों के चंगुल से CRPF के जवानों को छुड़ाकर ले आए।
कुछ दिनों पहले एक सड़क की क्वालिटी पर स्टोरी की। सड़क का दाम 120 करोड़ रुपए। बनवाने वाले ठेकेदार सुरेश चंद्राकर पर जांच बैठ गई।
फिर दो दिनों पहले ठेकेदार के भाई नरेश ने पत्रकार मुकेश को मिलने के लिए बुलाया।
और आज शाम मुकेश की ठेकेदार के घर में बने सेप्टिक टैंक से लाश बरामद हुई। मुकेश की पीठ पर घाव होने की सूचना मिली। और लाश को सेप्टिक टैंक में डालकर ऊपर से कंक्रीट की एक लेयर बिछा दी गई।
मदन मोहन सोनी-
दिल्ली और नोएडा में बैठे पत्रकारिता के ठेकेदार आपस में हिंदू-मुस्लिम की मुर्गा लड़ाई में मशगूल हैं, टीआरपी के लिए खून की धार बहा रहे हैं, और फिर अपनी मोटी सैलरी का सुख ले रहे हैं। क्या यही है हमारी मीडिया का असली चेहरा? जबकि छत्तीसगढ़ में, एक पत्रकार अपनी जान हथेली पर लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहा था।
काश, कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार होती! तब तो शायद पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या पर पूरे देश में हाहाकार मच गया होता, न्यूज चैनलों के स्टूडियो में विधवा विलाप शुरू हो गया होता।
लेकिन भाजपा की सरकार में? सब सन्नाटा है, जैसे कि इस हत्या का कोई मतलब ही नहीं है। क्या यही है हमारी राजनीति का अंतिम सत्य?
सुदीप ठाकुर-
बीजापुर के संभावनाओं से भरे युवा पत्रकार साथी मुकेश चंद्रकार की हत्या की खबर विचलित करने वाली है। यह हत्या उस बस्तर में हुई है, जहां केंद्रीय गृह मंत्री ने मार्च 26 तक नक्सलियों के सफाए का ऐलान किया है। यह हत्या उस बस्तर में हुई है जहां की नक्सली हिंसा पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सली हिंसा को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था।
यह हत्या उस बस्तर में हुई है जहां से ठेकेदारों और औद्योगिक घरानों की मनमानी की खबरें आती रहती हैं। यह हत्या उस बस्तर में हुई है, जहां कभी सरकारी कारिंदे अपनी पोस्टिंग को कालापानी समझते थे। यह हत्या उस बस्तर में हुई है, जहां आदिवासी तमाम धमकियों के बावजूद लोकतंत्र को जिंदा रखे हुए हैं और उनके साथ मुकेश जैसे साथी जमीन पर कदम से कदम मिलाकर खड़े रहते हैं।
मुकेश राजधानियों से दूर बस्तर के घने जंगलों में पत्रकारिता कर रहे थे। मैंने उन्हें पहली बार उनके यूट्यूब चैनल में देखा था, जिसकी शुरुआत में ही वह कहते थे कि आप बस्तर जंक्शन देखना शुरू कर चुके हैं। मुकेश रायपुर और दिल्ली से आने वाले पर्यटक पत्रकार नहीं थे। वह उन खबरिया चैनलों के पत्रकार नहीं थे जो “ग्राउंड जीरो” की रूमानियत की कहानियों के सहारे अपने करिअर का ग्राफ ऊंचा करते हैं। वह उन लेखकों-पत्रकारों जैसे भी नहीं थे, जिन्हें लगता है कि दो तीन बार की बस्तर की यात्रा के बाद किताबें लिख कर बस्तर के विशेषज्ञ हो गए।
मुकेश सही मायने में ग्राउंड जीरो के पत्रकार थे। यह ग्राउंड जीरो तो उनका घर ही था। उनके साथ जो हुआ है वह रोंगटे खड़े कर देना वाला है। बस्तर को जीने वाले इस जांबाज पत्रकार को सलाम!
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