रवीश कुमार-
हो सके तो हर किसी को अपना मूल पेशा छोड़ कर दूसरा काम ज़रूर करना चाहिए। ज़रूरी नहीं कि आप सत्तर साल तक पत्रकारिता ही करें, उसमें कुछ ग़लत नहीं है लेकिन कुछ और आता है तो वो भी करना चाहिए।
कुछ और से मेरा मतलब अलग काम से है। उससे उपार्जन से है। मेरा बड़ा मन करता है कि इस पेशे को किसी मोड़ पर हमेशा के लिए छोड़ दूं लेकिन दूसरा कुछ आता ही नहीं। एक नया स्किल सीखने के लिए कब से सोच रहा हूँ।
गणित में मास्टर होता तो ट्यूशन पढ़ाने लग जाता और इसी बहाने कई घरों में जाता। पढ़ाता भी और उनके घर की चाय पीता। घर में क्या चल रहा है, उसमें भी शामिल होता। लेकिन गणित में भी ज़ीरो हूँ। अगर आप कुछ करना जानते हैं, तो ज़रूर मूल पेशे को छोड़ कर करना चाहिए।
जीवन भर एक ही स्कूल, एक ही कॉलेज की पहचान ढोते रहने वाले बहुत लोग होते हैं। कुछ नया भी कीजिए। आजीवन पत्रकार बने रहने में कोई बुराई नहीं है, लोग होते ही हैं, लेकिन पूरी तरह छोड़ कर कुछ करने और उससे कमाने से मेरा मतलब है। जहां आप ज़ीरो से शुरू करें। नए पेशेवर संबंध बनाएं।
पत्रकारिता छोड़ कर राजनीति और साहित्य की बात नहीं कर रहा, मेरी नज़र में वो अलग करना नहीं हुआ। राजनीति और साहित्य में आप अपने पुराने पेशे का ही विस्तार बन जाएंगे और उसका लाभ उठाएंगे। कुछ ऐसा कीजिए जो एकदम अलग हो। पत्रकारिता से विच्छेद हो।
या अगर आप फिल्मकार हैं तो उससे विच्छेद हो या टीचर हैं तो उससे अलग हो जाएं। ऐसा कोई नहीं होगा जो दिन में दो बार नहीं कहता होगा कि कुछ और किया जाए।
इसका मतलब है कि कुछ और करने की कल्पना आपके लिए एक पार्किंग स्पेस है जहां आप अपने काम से ब्रेक लेते हैं। जो भी ऐसा कर रहे हैं या कर चुके हैं, उनको मेरा सलाम। मेरा भी इंतज़ार कीजिए क्योंकि मैंने ऐसा सोचा तो है, बस किया नहीं है। करूंगा ज़रूर।
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने बिजनेस इनसाइडर की एक रिपोर्ट शेयर करते हुए यह बातें कहीं हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि एक मीडिया संस्थान के डेस्क पर कार्य कर रहे एक पत्रकार की नौकरी चले जाने पर वह फुल टाइम इलेक्ट्रीशियन का काम अपना लेता है। आप यह रिपोर्ट रवीश की वॉल पर या फिर बिजनेस इनसाइडर की वेबसाइट पर जाकर पढ़ सकते हैं…
रिपोर्ट इस हेडिंग से है-



