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उत्तर प्रदेश

अखिलेश जी के लिए यूपी का मुख्यमंत्री एक छोटा पद है!

मनीष सिंह-

बगल में अवधेश प्रसाद,
दलित हैं।

पीछे जो बैठा है, उसे कपड़ो से पहचान सकते हैं। सिर पर समाजवादी टोपी।

अखिलेश जुबान से ही नही, अपने स्टेज सेटअप से भी बोलते हैं। जुबान पर वो, जो बोलने की हिम्मत सबकी नहीं।

अखिलेश की इस निर्भीकता का कायल हूँ।

इसी तस्वीर में पीछे पत्नी भी है। परिवारवाद का आरोप लगने के लिए वह काफी है। लेकिन अखिलेश बेपरवाह हैं।

दरअसल जो उनके साथ है, वो उसके साथ है, वह पत्नी हो, मुसलमान हो, दलित.. वे सहज हैं। पोलिटिकली करेक्ट दिखने की कोशिश नही करते। माजरत के साथ कहूंगा, यह सहजता तो राहुल में भी नही दिखती।

स्वाभाविकता के साथ सन्देश देना एक पॉलिटिशियन की सबसे बड़ी स्किल है।

अखिलेश को बोलते देखना दर्शनीय होता है। अव्वल उनके भाषण में टोकाटाकी करने का चांस नही होता,

लेकिन दुष्ट भाजपाई अपनी ट्रेनिंग के अनुसार विघ्न डालते भी हैंवह अपने विट और ह्यूमर से उससे पार निकल जाते हैं।

संसदीय बहसों का सबसे बदतरीन दौर है।

खास तौर पर सत्ता पक्ष की ओर से चीखते झूठ, दादागिरी, निजी आक्षेप, बेशर्म हंसी, टोकाटाकी, और निहायत बकवास, निम्नस्तरीय अध्यक्षीय आसंदी कार्यवाही देखने का मजा दोनों ही सदनों में खराब कर देती है।

लेकिन इसके बीच इमरान प्रतापगढ़ी, संजय सिंह, मंनोज झा को सुनना अच्छा लगता है।

कपिल सिब्बल बहुत एकेडमिक हो जाते हैं। अंग्रेजी में महुआ मोइत्रा अच्छा बोलती हैं, लेकिन एक ही पैटर्न को फॉलो करना और विट का अभाव उन्हें नीरस बना देता है।

हास्य के अभाव की समस्या तो राहुल के साथ भी है। अति संजीदा और भारी भरकम भंगिमाओ से सहज सुलभ हंसी कहीं ज्यादा असरकारी होती है।

अखिलेश में यह स्वाभाविक है। तो सदन में वह साधारण सरल भाषा, स्टेज सेटिंग और जुदा अंदाज से खुद पर निगाह टिका लेते है।

सच कहूँ तो समाजवादी पार्टी, या यूपी का मुख्यमंत्री उनके लिए एक छोटा मंच है।

लेकिन राजनीति में उनके पास लम्बा समय है। आशा है किसी दिन वे, इन सबसे ऊंचे पायदान पर दिखेंगे।

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