अजीत अंजुम-
मैंने कई बार लिखा और बोला है कि किसी भी चैनल के रिपोर्टर के साथ फील्ड में बदसलूकी, गाली-गलौज और धक्का मुक्की नहीं की जानी चाहिए. जंतर -मंतर पर हुई मारपीट या धक्का मुक्की के ख़िलाफ़ भी मैंने लिखा है. मैंने कई बार CJP के लोगों के X पर अपील की है कि किसी भी सूरत में रिपोर्टर पर हमले नहीं होने चाहिए, चाहे वो किसी भी चैनल का हो. मेरी टाइम लाइन पर इस बारे में कई पोस्ट मौजूद है.
मेरा हमेशा से मानना है कि चैनलों के संपादकों और मालिकों की तरफ़ से तय एजेंडे के मुताबिक़ रिपोर्टर फील्ड में काम करने को मजबूर होते हैं. बावजूद इसके, कई चैनलों में कुछ शानदार रिपोर्टर और एंकर हैं, जो जन-सरोकार से जुड़े मुद्दे पर सालों से शानदार और असरदार रिपोर्ट कर रहे हैं. संस्थागत मजबूरियों के बाद भी अपने लिए स्पेस निकालकर अपने ही चैनल से कई गुना बेहतर काम कर रहे हैं. कभी किसी आंदोलन या प्रदर्शन के दौरान उनके साथ भी बदसलूकी हो जाती है या हो सकती है क्योंकि मीडिया की छवि सरकार परस्त हो गई है.
चैनलों का रवैया हमेशा विरोध की आवाजों के ख़िलाफ़ ही रहता है. आंदोलन चाहे किसानों का हो, पहलवानों का हो या नौजवानों का, छात्रों का हो या शिक्षकों का, जवानों का हो या बेरोजगारों का, हर आंदोलन में चैनलों को देश के ख़िलाफ़ साज़िश नज़र आती है. इनके लिए मोदी ही देश हैं. मोदी ही संविधान हैं. मोदी ही संसद हैं. मोदी ही सब कुछ हैं. जो भी मोदी की नीतियों का विरोध करते हुए सड़क पर उतरता है, उसके ख़िलाफ़ मुहिम शुरू हो जाती है. जनता में इसे लेकर जबरदस्त नाराजगी है. भीड़ के बीच रिपोर्टिगं करते वक्त इस नाराजगी का शिकार कभी भी, कोई भी हो सकता है.
मैं लगभग दस दिनों तक जंतर -मंतर के प्रोटेस्ट को लगातार कवर करता रहा. हर वक्त मुझे स्नेह और सम्मान ही मिला. हजारों की भीड़ में कुछ लफंगे और बदमाश लड़के भी थे, जिनका काम शोर मचाना और अश्लील नारे लगाना था. ऐसे लड़के किसी को भी देखकर एक ही भाव में चीखते – चिल्लाते थे.
25 जुलाई की देर रात जब सारे प्रदर्शनकारी जीत का जश्न मनाते हुए वापस लौट रहे थे तो सीपी के पास एक भीड़ का हिस्सा बने कुछ लड़के कैमरा और लाइट देखकर दूर से ही गोदी मीडिया- गोदी मीडिया के नारे लगाने लगे. हालांकि उनमें से ही कुछ लोगों ने उन्हें समझाया. जो हुआ वो वायरल है. चैनलों के साथी लोग ख़ुश होकर मेरे वीडियो वायरल कर रहे हैं कि देखो – देखो अजीत अंजुम के साथ भी ऐसा हुआ. मेरी सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. मैं ऐसे ही सड़क पर जाता रहूंगा. चुनावों में मोदी और योगी की रैलियों में भी जाता हूं और विपक्ष की रैलियों में भी.
हर आंदोलन और प्रदर्शन में जाकर विरोध की आवाजों को समझने की कोशिश करता हूं. करता रहूंगा. जब देश में विरोध और विपक्ष की आवाजों को कुचलने की साजिशें हो रही हों तो उन साजिशों के ख़िलाफ़ तनकर खड़े होने के लिए हम जैसे लोग बने हैं. धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के पहले चैनलों के कवरेज को देखिए. कैसे ज़्यादातर चैनल इस प्रोटेस्ट के खिलाफ मुहिम चलाकर सरकार को कवर फायर दे रहे थे. दो दिन से कुछ चैनल ये साबित करने में जुटे हैं कि प्रोटेस्ट में सिर्फ लफंगे और गुंडे थे. हां, हजारों की भीड़ में कुछ ऐसे लफंगे भी आ गए थे लेकिन आप ये नहीं कह सकते कि हजारों स्टूडेंट नहीं थे. उनके परिजन नहीं थे.
खैर , आप अपना काम कीजिए. मैं अपना काम करुंगा. वही करुंगा, जो कर रहा हूं. जय हिंद


