अखिलेश शर्मा-
निधि जी केवल एक नाम नहीं, अपने-आप में संस्थान हैं। वे अनगिनत पत्रकारों की प्रेरणा स्रोत रही हैं। उन्हें देख कर ही आज के कई स्थापित एंकर्स ने टेलीविजन में आने की ठानी। वे सौम्यता, शालीनता और मानवता की प्रतिमूर्ति हैं।
पिछले 22 वर्षों से भी अधिक समय तक उनके साथ न्यूजरूम में काम करने का अवसर मिला। एंकरिंग के पांच वर्षों में उन्होंने कई बार मार्गदर्शन किया। व्यक्तिगत जीवन में जब भी कोई संकट आया, उन्होंने हमेशा ढांढस बंधाया। निधि जी से आप सहजता और सरलता के साथ किसी भी मुद्दे पर बात कर सकते हैं। वे निर्विवाद तौर पर सबसे बड़ी स्टार एंकर्स में हैं लेकिन उनसे बात करते समय कभी इसका एहसास नहीं होने देती हैं।
रिटायर होना एक बड़ी यात्रा में एक पड़ाव भर है। निधि जी की पत्रकारिता की यह यात्रा आगे भी जारी रहे, यही शुभकामना है। अभी उनसे लोगों को बहुत कुछ सीखना है।
संजय किशोर-
निधि कुलपति: ख़ामोशी की आवाज़, जो तीन दशक तक गूंजती रही। निधि कुलपति को जानने का सौभाग्य मुझे तक़रीबन तीस साल पहले मिला था। 1998 में जब मैंने ज़ी न्यूज़ से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की, तो पहली बार उनसे सामना हुआ। वह तब भी स्क्रीन पर थीं — वही सौम्य मुस्कान, वही संयमित आवाज़ और वही नपी-तुली प्रस्तुति। कुछ ऐसी उपस्थिति, जो नज़र नहीं बल्कि भीतर तक असर करती है।
2003 में जब वह एनडीटीवी आईं, तो मेरा भी रास्ता उधर ही मुड़ गया। उनके साथ काम करना किसी स्कूल में सीखने जैसा था, जहाँ हर रोज़ शांति से बहुत कुछ सिखाया जाता है — बिना शोर के, बिना अहंकार के।
निधि मूलतः एक न्यूज़ रीडर रही हैं। वह वो दौर था जब एंकर का मतलब केवल तेज़ आवाज़ या भौंचक चेहरा नहीं था, बल्कि एक भरोसेमंद आवाज़ थी जो दर्शकों तक ख़बरों को ईमानदारी से पहुँचाती थी। आज जब न्यूज़ स्टूडियो किसी अखाड़े से कम नहीं लगते, निधि जैसे चेहरे शायद मिसफिट लगते हैं। पर सच तो ये है कि वही ‘मिसफिट’ असल पत्रकारिता की परिभाषा थे, हैं और रहेंगे।
उनकी शैली में एक पुरानी दुनिया की गरिमा थी — कुछ वैसा ही जैसे दूरदर्शन की सलमा सुल्तान या सरला माहेश्वरी की एंकरिंग। चेहरे पर शांति, भाषा में मर्यादा और बातों में भरोसा। आज की पीढ़ी को शायद ये शैली ‘धीमी’ या ‘बोरिंग’ लगे, पर जो लोग 90 के दशक की उस ‘रेट्रो पत्रकारिता’ को जिया है, उनके लिए यह शैली समय की सबसे ज़रूरी कसौटी है।
निधि पूरे करियर के दौरान सिर्फ़ साड़ी पहनती रहीं। आज जब तमाम एंकर पश्चिमी सभ्यता के लिबास में ग्लैमर ढूँढते हैं, निधि की साड़ी एक सांस्कृतिक वक्तव्य की तरह थी — चुपचाप, लेकिन दृढ़। यह केवल परिधान नहीं, एक विचार था। वह हर दिन अपनी पहचान को, अपनी ज़मीन को, अपने मूल्यों को पहनकर स्टूडियो आती थीं। कैमरे के सामने उनका खड़ा होना, मानो यह बताता था कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।
आज निधि कुलपति एनडीटीवी से रिटायर हो रही हैं। उम्र कहती है 58 साल, पर आंखें मानने को तैयार नहीं। स्क्रीन पर उनकी उपस्थिति अब भी उतनी ही तरोताज़ा लगती है। न चेहरे पर थकान, न आवाज़ में शिकन। शायद यही वजह है कि उनका जाना केवल एक एंकर की विदाई नहीं, बल्कि उस युग की विदाई है जहाँ पत्रकारिता एक ज़िम्मेदारी थी, न कि महज़ एक ‘परफॉर्मेंस’।
उनके जाने के बाद न्यूज़ रूम थोड़े और खाली लगेंगे, और स्क्रीन थोड़ी और शोरगुल से भरी। पर निधि कुलपति की पत्रकारिता एक स्मृति की तरह जीवित रहेगी — वह स्मृति जो हमें याद दिलाएगी कि शब्दों से ज़्यादा ज़रूरी होता है उन्हें कैसे कहा जाए।
उनके जैसा होना मुश्किल है। लेकिन उन्हें याद रखना ज़रूरी है — ताकि जब अगली पीढ़ी पत्रकारिता को केवल टीआरपी का खेल मानने लगे, तो निधि जैसी आवाज़ें एक संदर्भ की तरह मौजूद रहें।
संजय सिन्हा-
निधि कुलपति ही वो एंकर थीं, जिन्हें देख कर पहली बार मुझे टीवी पत्रकारिता की ओर मुड़ा था। तब ये ज़ी टीवी पर रात नौ बजे एंकरिंग करती थीं। बेस्ट एंकर।
बाद में 1999 में मुझे ‘ज़ी’ में उनके साथ काम करने का बहुत मौका मिला। निधि एक मात्र एंकर मुझे मिलीं, जो तपती दुपहरिया में शीतल बयार की तरह हैं।
एक एंकर को जैसा होना चाहिए, वो वैसी हैं। नपी-तुली। सधा अंदाज़। भूल कर भी भूल हो न। दुहरा रहा हूं, भारत की बेस्ट एंकर।
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Ram Singh Rana
May 22, 2025 at 5:05 pm
Nidhi ji ko is lambi pari ke liye bahut bahut badhai.1998 se sath kaam kiya Nidhi ji ko kabhi hiper nahi dekha. 1998 mein Nidhi anchoring ke sath ek Programme bhi host karti thi jo ki weekly hota tha. But aaj Saurabh Sinha ne bada acha likha hai but Saurabh ka misbehave sayad Nidhi ji ne maaf kar diya ho per humko yaad hai jo sirf Cheekhna or Chillana janta tha bus baki kuch nahi.
Finally Nidhi ji ko is lambe safar ki khatti mitthi yaadoon ke sath bahut bahut badhai.
Bijay Singh
May 22, 2025 at 5:31 pm
Happy Retirement Nidhi ji.
Best wishes for your all future endeavors.
Stay healthy and happy.
Manoj varshney
May 22, 2025 at 8:53 pm
नीधि कुलपति को सैल्यूट जो लड़ते लड़ाते भौपूओ के बीच, दादा साहब फाल्के,लाल बहादुर शास्त्री और प्रभाष जोशी जी जैसी सादगी के साथ पत्रकारिता के शिखर से नयी मंजिल की ओर जा रही हैं। आगे उन्हें देख कर हजारों ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता की मशाल जलाये रखेंगे।
Amit Luthra
May 22, 2025 at 10:56 pm
Happy Retirement Maam,
Best Wishes for Your Future Endeavor. You are the Legend of Indian Journalism.