यशवंत सिंह-
ईमानदारी का अपना एक नशा होता है, एक अलग ही आनंद। अब मैं समझ पाया हूँ कि बेईमानी अक्सर सिस्टम की देन होती है — ऐसा सिस्टम जो अपने कारकूनों को भ्रष्ट होने के लिए प्रेरित करता है, उन पर दबाव डालता है। फिर भी, कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इन प्रेरणाओं और दबावों के बावजूद ईमानदार बने रहते हैं। कई ऐसे अधिकारी हैं, जिन्हें मैं ‘सैलरीजीवी’ कहता हूँ।
जब कोई व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है, तो वह आम आदमी के जीवन में राहत लेकर आता है। ईमानदारी कोई किताब से सीखने वाली चीज नहीं है — यह भीतर से आती है, यह एक ईश्वरीय गुण है। ईमानदारी से बड़ी कोई आध्यात्मिकता नहीं होती। यही वह रास्ता है जो किसी को आंतरिक यात्रा के लिए पात्र बनाता है।
ईमानदार व्यक्ति अक्सर अकेला होता है। वह थोड़ा मूडी, कभी-कभी सनकी और अनपेक्षित व्यवहार वाला हो सकता है — लेकिन मुझे ऐसे लोग बहुत प्रिय लगते हैं।
यह तस्वीर और इसका विवरण कितना सही है, मैं नहीं कह सकता — लेकिन देखकर अच्छा लगा। फेसबुक पर मिला ये-
“संभल के जिलाधिकारी डॉ. राजेन्द्र पेंसिया का ये फोटो पूरे उत्तर प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है. सभी अधिकारी अगर इसी विचारधारा के साथ कार्य करें तो लालफीताशाही पर तत्काल अंकुश लग जाएगा और जनता का भला अपने आप होगा.”
राकेश रंजन-
फोटो में दिख रहे व्यक्ति संभल के जिलाधिकारी है, इनके टेबल पर लिखी बातें चर्चा में है। सही लिखा है कि प्रत्येक पत्रावली के पीछे एक व्यक्ति की उम्मीदें है। लोग बड़ी उम्मीद से किसी भी प्रशासनिक पदाधिकारी से मिलते है अथवा पत्र लिखते है। भले सिस्टम के लिए लिखे गए पत्र/आवेदन महज एक। आंकड़ा हो लेकिन पीड़ित व्यक्ति के लिए उम्मीद की किरण होती है। थका हारा व्यक्ति बड़े आस से किसी पदाधिकारी को पत्र अथवा आवेदन लिखकर देते है। काश प्रत्येक पदाधिकारी की इस तरह की सोच हो जाए।
इसी क्रम में एक वाकया याद आ गया। संभवतः 2007- 08 में मधेपुरा में ए जेड खान नाम के अधिकारी डीडीसी पदस्थापित थे। एक बैंक मैनेजर के साथ उनसे मिलने गया था। डीडीसी साहब ने मैनेजर साहब से पूछा कि क्या गरीबों के कार्य को प्राथमिकता देते है। वहीं डीडीसी ने एक बात और कही कि देखिए हमारी खुशकिस्मती है कि है जिस बात की सेलरी लेते है उस कार्य को ईमानदारी से करते हुए आमलोगों की बड़ी सेवा कर सकते है।
कहने का मतलब यह था कि हमारी ड्यूटी जिस कार्य की है उससे लोगों का भला हो सकता है। इसीलिए इस मौके को गंवाइए नहीं। संयोग से ये डीडीसी साहब कुछ समय के लिए प्रभारी जिलाधिकारी भी रहे थे। उस दौरान स्वास्थ्य विभाग से संबंधित स्थानीय एक व्यक्ति के कार्य से रात को मिलने गया था। मिलकर तत्काल उस समस्या का समाधान कराए थे। रात को सिविल सर्जन को कॉल कर कहे थे कि अभी हॉस्पिटल जाइए।
काश ऐसे पदाधिकारी और मिलते रहे…लेकिन अफसोस अब ऐसे पदाधिकारी गिनती के रहे..
दया शंकर शुक्ल सागर-
ऐसे ईमानदार आईएस अफसरों का लंबा इतिहास है। ये शुरू में ऐसे ही काम करते है। फिर एक दिन खुलासा होता है कि ये तो डकैत हैं। झारखंड में आईएस पूजा सिंघल से लेकर विनय चौबे तक और यूपी में चंद्रकला से लेकर अभिषेक प्रकाश तक एक लंबी फेहरिस्त है। डॉ राजेंद्र अच्छा कर रहे है कब तक कर पाते है ये जरूरी है।
जब मैं इलाहाबाद में हिंदुस्तान का संपादक था तब बी चंद्रकला की बतौर सीडीओ पहली पोस्टिंग थी। एक दिन किसी खबर से नाराज दफ्तर आ गई। खूब हंगाम किया। अपनी बातों, तेवर और अंदाज से ईमानदार दिखी। वो भी आंध्रा के किसी केंद्रीय विद्यालय से पढ़ी थीं। एक तरह से दोस्ती हो गई। हमारी छपी खबरों पर तत्काल कार्रवाई होने लगी। दलित और गरीब घर से थी। फिर इलाहाबाद छूट गया। और उनका भी तबादला हो गया।
दोनों नए थे। करियर बनाने के जुट गए। फिर एक दिन पता चला कि वो लेडी सिंघम बन गई।
यूपी छूट चुका था। बस खबरें पढ़कर खुश होता था। पर कभी फोन नहीं किया उन्हें। फिर एक दिन पता चला कि भ्रष्टाचार में फंस गई। अपनी संपत्ति का हिसाब नहीं दे पाई।
मुझे यकीन नहीं हुआ। मन मानने की तैयार नहीं हुआ कि वो ऐसी निकलेंगी। कई बार लगा कि वो किसी राजनीतिक साजिश का शिकार हुई होगी। खैर कभी कही मिली तो पूछूंगा जरूर। एक लंबा इंटरव्यू लूंगा उनका।

सत्येंद्र पीएस-
यूपी में अभी जो हालात हैं, रिश्वत देने पर काम हो जाएगा, इसके लिए जुगाड़ लगाना पड़ता है। डकैत निकली या निकले, मसला ही नहीं है। मेरे तमाम मित्र, परिचित जानने वाले प्रशासन और जूडिशियरी में हैं। अगर वह रिश्वत नहीं लेते हैं तो उनकी जान को खतरा होता है। कोई ईमानदार जज अगर जिले में पहुँच गया तो अमूमन उसकी पोस्टिंग फेमिली कोर्ट में होती है जहां सबसे कम रिश्वत मिलती है। एक जमानत देने की 15/20 लाख रुपये की पेशकश लोवर कोर्ट में आ जाती है। और अगर आप नहीं लेते हैं तो वकील हाई कोर्ट में शिकायत कर देते है किसी फैसले को लेकर और जज बेचारा अपनी नौकरी बचाने के लिए वर्षों तक हाई कोर्ट के चक्कर लगाता है।
इससे बुरा हाल प्रशासन में है। मंत्री सीधे पैसे लेकर पोस्टिंग कर रहा है। किस तरह से पैसे बनाए जा रहे हैं, उसके एक उदाहरण बताता हूँ। पहले किसी बड़े शहर की टाउन प्लानिंग होती थी। अब वह सब गौड़ हो गया है। किसी अधिकारी के पास जाइए। उसको बताइए कि सर देखिए मन कामेश्वर मन्दिर के बगल में एक रिवर फ्रंट और बोटिंग एरिया बना दिया जाए तो पब्लिक बहुत खुश होगी और वहां बड़ी संख्या में लोग आते हैं। वहां एक स्मारक बनाते हैं, मन्दिर के एस्थेटिक के मुताबिक पेंटिंग कर देते हैं और पिलर्स को तिरंगा कर देते है। फिर वह धीरे से कान में कहेगा कि सर इसमें 30 परसेंट आपको दे देंगे, 300 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट है। फिर अधिकारी कहेगा कि इतने में क्या होगा? 500 करोड़ का प्रोजेक्ट बनाओ, सीएम साहब से उद्घाटन कराएंगे, मन्दिर और देश का मसला है। उसके बाद डीपीआर बनने में 100 करोड़ खर्च होगा और वहाँ इतना सुंदरीकरण होगा जैसे किसी ने जगह जगह हग दिया हो।
अब भूल जाइए कि मायावती ने जिस तरह अम्बेडकर स्मारक बनवाया उस टाइप कोई शहर को खूबसूरत बनाने वाली ऐतिहासिक परियोजना बन पाएगी। जिंदगी बड़ी कठिन हो गई है। ईमानदार इंसान को समाज एक निहायत असफल आदमी मानता है। वह मेंटल, सोशल, इकनॉमिक ट्रामा से गुजरता है और कुछ साल ईमानदारी दिखाई भी, तो टूट जाता है। अभी हाल में एक लड़के ने बड़ी पोस्ट से रिजाइन कर दिया। उसने कहा कि इतने प्रेशर में काम नहीं कर पाएंगे।
आप किसी सरकारी मेडिकल अस्पताल में चले जाइए। एमएस कर रहे डॉक्टरों की लगातार 32 घण्टे ड्यूटी लगी होती है। एक डॉक्टर 32 घण्टे ड्यूटी करके जा रहा था। स्कूटर चलाते हुए उसे नींद आ गई, गिरा और उसके दोनों हाथ टूट गए।
यूपी में जिस तरह सिस्टम सड़ चुका है, वही हाल हर राज्य में होगा। बकचोदी वही कर पाते हैं, जो स्थिति को जान नहीं रहे हैं और उनको सिर्फ ज्ञान देना है। या किसी को पर्सनल निशाना बनाना हो। बहुत लम्बा लिख दिया। बड़ी कहानियां भरी पड़ी हैं। यही सब लखनऊ में बैठकर सुन रहा हूँ आजकल।



Sri narain mishra
June 22, 2025 at 1:54 pm
सत्येंद्र पीएस जी क़ी बातों से पूर्णतः सहमत। सिस्टम बनाने वाले उसे बदलने को राजी नहीं हैं। अयोध्या में हालिया विकास उसी मॉडल में हुआ है, जिसका ज़िक्र सतेंद्र जी ने किया है।