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कस्तूरबा गांधी मार्ग और बाराखंभा रोड कभी दिल्ली का ‘मीडिया कॉरिडोर’ था!

विवेक शुक्ला-

के.जी मार्ग और बाराखंभा रोड: जहां रातें जागती थीं खबरों के लिए

दिल्ली की कुछ सड़कें अपने आप में सिर्फ रास्ते नहीं हैं; ये अपने भीतर समय की परतें, यादों की खुशबू और इतिहास की आवाज़ें समेटे हुए हैं। कस्तूरबा गांधी मार्ग और बाराखंभा रोड भी ऐसी ही सड़कों में शामिल हैं। आज इन रास्तों पर ट्रैफिक पहले की तरह ही दौड़ता है, ऊंची-ऊंची इमारतें भी खड़ी हैं, लेकिन एक दौर में इन पर पत्रकार और मीडिया की दुनिया से जुड़े लोग बड़ी संख्या में मिल जाया करते थे।

बेशक, कस्तूरबा गांधी मार्ग और बाराखंभा रोड दिल्ली का ‘मीडिया कॉरिडोर’ था। इन सड़कों पर हिंदुस्तान टाइम्स, द स्टेट्समैन, राष्ट्रीय सहारा, एशियन एज, अमर उजाला (ब्यूरो), द हिन्दू, संडे ऑब्जर्वर और ऑब्जर्वर फॉर बिजनेस एंड पॉलिटिक्स जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के दफ्तर हुआ करते थे। बी बी सी भी ht हाउस में था। दिन से लेकर देर रात तक यहां पत्रकारों, संपादकों और फोटो जर्नलिस्टों की हलचल रहती थी, और रात में भी इन इमारतों की खिड़कियों से रोशनी झिलमिलाती रहती थी।

उस दौर की रातें कुछ अलग ही हुआ करती थीं। जब दिल्ली के अधिकतर हिस्से सोने लगते थे, तब यहां काम की रफ्तार तेज हो जाती थी। रिपोर्टर अपनी खबरें लेकर भागते हुए आते, सब-एडिटर डेस्क पर बैठकर शब्दों को तराशते, और प्रेस की मशीनें देर रात तक गूंजती रहती थीं। खबरों की दुनिया का वह धड़कता हुआ दिल यहीं बसता था।

कस्तूरबा गांधी मार्ग और बारा खंभा रोड के फुटपाथों पर अक्सर छोटे-छोटे समूहों में पत्रकार दिखाई दे जाते थे। कोई चाय के कप के साथ दिन भर की खबरों पर चर्चा कर रहा होता, तो कोई किसी बड़ी स्टोरी के सोर्स तलाश रहा होता। सबसे बड़ी बात यह थी कि अलग-अलग मीडिया संस्थानों में काम करने के बावजूद सबके बीच दोस्ताना संबंध हुआ करते थे। बाराखंभा रोड के आसपास के ढाबे और चाय की दुकानें भी उस दौर के गवाह थे। इधर के छोटे साइज के समोसे खाकर पत्रकार अपनी एक्सक्लूसिव स्टोरी लिखते थे।

बाराखंभा रोड की विजय बिल्डिंग में संडे ऑब्जर्वर (हिंदी और अंग्रेज़ी) और ऑब्जर्वर फॉर बिजनेस एंड पॉलिटिक्स के दफ्तर थे। यहीं राजीव शुक्ला काम करते थे। वे हर गुरुवार को अपनी स्टोरी फाइल करने आते थे। उनके पास मारुति 800 कार हुआ करती थी। अंबानी समूह के अखबारों में चंदन मित्रा, प्रभाकर सिन्हा, राजेश रपरिया, मोहम्मद सईद मलिक और राजीव कटारा जैसे धाकड़ पत्रकारों ने काम किया था। ये दोनों पेपर आला दर्जे के थे।

विजय बिल्डिंग के नीचे या हिंदुस्तान टाइम्स हाउस के पीछे देर रात तक ढाबों में चाय बनती रहती थी, क्योंकि पत्रकारों की ड्यूटी का समय कभी तय नहीं होता था। हिंदुस्तान टाइम्स और अंसल भवन के बीच एक दुकान पर मीडिया कर्मियों की भीड़ लगी रहती थी। वहां यूनियन के नेता जावेद फरीदी, एस.एन. सिन्हा, प्रेम नाथ भार्गव और आनंद प्रकाश शर्मा और उनके ट्रेड यूनियन के साथी शाम के वक्त गपशप करते मिल जाते थे। तब अमर उजाला अरविंद कुमार सिंह, अतुल सिन्हा और अजीत अंजुम काम करते थे। अरविंद सिंह के पास शैलेश मटियानी आते रहते थे।

तब अखबारों के दफ्तर सिर्फ दफ्तर नहीं होते थे, वे एक तरह से विचारों की प्रयोगशाला होते थे। यहाँ देश और दुनिया की राजनीति पर बहसें होती थीं, समाज के मुद्दों पर चिंतन होता था और लोकतंत्र की धड़कन को शब्दों में ढाला जाता था। नई पीढ़ी के पत्रकार अपने वरिष्ठों से सीखते थे, और हर रात एक नई कहानी अखबार के पन्नों में जन्म लेती थी।

हिंदुस्तान टाइम्स के ठीक सामने की सूर्य किरण बिल्डिंग से एशियन एज के शुरू होने के बाद इस इलाके की रौनक और बढ़ गई। इसके संपादक एम.जे. अकबर थे। अगर मेरी याददाश्त सही है, तो इसमें सीमा मुस्तफा और गोलू एजेकियल जैसे बेहतरीन पत्रकार काम करते थे। द स्टेट्समैन की औपनिवेशिक दौर की लाल रंग की इमारत के सामने से गुजरते हुए हम सबके गुरु आर.वी. स्मिथ, किथ फ्लोरी, भूपेंद्र सिंह और रामू शर्मा जैसे वरिष्ठ पत्रकार मिल जाया करते थे। इधर ही पहली बार जिया उस सलाम से मिलना हुआ था।

लेकिन समय का स्वभाव ही बदलाव है। धीरे-धीरे मीडिया का स्वरूप बदलने लगा। तकनीक ने खबरों की दुनिया को नई दिशा दी, और बड़े-बड़े मीडिया हाउस अपने दफ्तर शहर के दूसरे हिस्सों में ले जाने लगे, जबकि कुछ बंद हो गए। देखते ही देखते वे इमारतें, जो कभी खबरों की फैक्ट्री हुआ करती थीं, अब किसी और काम में इस्तेमाल होने लगीं।

आज जब कोई कस्तूरबा गांधी मार्ग या बाराखंभा रोड से गुजरता है, तो शायद उसे यह एहसास भी नहीं होता कि इन सड़कों ने कभी पत्रकारिता के स्वर्णिम दिनों को देखा था। अब वहाँ वैसी हलचल नहीं है, न रात के सन्नाटे में टाइपराइटर की आवाज़ सुनाई देती है और न ही प्रेस मशीनों की गूंज।

सब कुछ बदल गया है—खबरों का माध्यम भी और उनका ठिकाना भी। अब न्यूज़रूम डिजिटल हो गए हैं; खबरें मोबाइल और कंप्यूटर की स्क्रीन पर जन्म लेती हैं। लेकिन उस पुराने दौर की एक अलग ही गरिमा थी, एक अलग ही आत्मा थी।

आज भी अगर कोई पुराना पत्रकार इन सड़कों से गुजरता है, तो शायद उसकी आंखों में अनायास ही पुरानी यादें तैर जाती होंगी। उसे याद आता होगा कि कैसे रात के दो बजे भी दफ्तर में हलचल रहती थी, और कैसे एक बड़ी खबर के आने पर पूरे न्यूज़रूम में उत्साह की लहर दौड़ जाती थी।

कस्तूरबा गांधी मार्ग और बाराखंभा रोड आज भी दिल्ली के नक्शे पर मौजूद हैं, लेकिन उनके भीतर छिपी पत्रकारिता की वह पुरानी धड़कन अब सुनाई नहीं देती। अंबानी समूह ने अपने अखबारों को बहुत पहले ही बंद कर दिया था। यह बदलाव समय का हिस्सा है, लेकिन यादों की दुनिया में वे दिन आज भी जिंदा हैं।

शायद यही शहरों की सबसे बड़ी खासियत भी है—वे बदलते जरूर हैं, लेकिन अपने अतीत की कहानियों को कहीं न कहीं सहेजकर रखते हैं। कस्तूरबा गांधी मार्ग और बाराखंभा रोड भी आज भले ही अलग नजर आते हों, पर उनकी हवाओं में अब भी उन दिनों की हल्की-सी गूंज महसूस की जा सकती है, जब यहां से हर सुबह देश को जगाने वाली खबरें निकलती थीं।

(फोटो हिंदुस्तान टाइम्स हाउस और विजय बिल्डिंग)

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