आपने बहुत संवेदनशील और सहज शब्दों में आशुतोष जी के ट्वीट की गहराई को समझाया है। धन्यवाद
-निधि कुलपति, वरिष्ठ पत्रकार

त्रिभुवन-
आशुतोष राणा का यह ट्वीट किसी धार्मिक आख्यान की पुनरावृत्ति भर नहीं है; यह उस न्यायपालिका जो कह देती है कि विडियो देखने का समय नहीं है और हृदयहीन सत्ता के नैतिक शरीर पर रखी गई एक ऐसी उँगली है, जो स्पर्श में अत्यंत विनम्र है, किंतु जिस जगह पड़ती है वहाँ शासन की त्वचा के नीचे छिपा हुआ रक्त अचानक दिखाई देने लगता है। उन्होंने प्रत्यक्षतः न सरकार का नाम लिया, न युवा आंदोलन का, न पुलिसिया दमन का; फिर भी कथा के भीतर आज का पूरा राजनीतिक दृश्य किसी दबे हुए मेंढक की तरह साँस लेता, सिसकता और रक्त बहाता दिखाई देता है।
समुद्रतट पर बैठे राम, उनके हाथ का धनुष और उसके नीचे अनजाने में कुचला जा रहा जीव; यह रूपक आज के लोकतंत्र की भयावह विडंबना को बड़ी कोमलता से खोलता है। संविधान ने जिस राज्य को नागरिकों की रक्षा का धनुष सौंपा था, वही धनुष यदि छात्रों, बेरोज़गार युवाओं, परीक्षार्थियों और आंदोलनकारियों की देह पर टिक जाए तो पीड़ित आखिर पुकारे किसे? पुलिस से पीड़ित नागरिक सरकार के पास जाता है; विश्वविद्यालय प्रशासन से प्रताड़ित छात्र शिक्षा मंत्रालय की ओर देखता है; व्यवस्था से निराश युवा संविधान की शरण लेता है। लेकिन जब संविधान का पालन कराने वाली सत्ता स्वयं दबाव, अपमान और बलप्रयोग का औज़ार बन जाए, तब शिकायत की अंतिम चौखट भी रक्त से भीग जाती है।
राम यहाँ नैतिक पश्चात्ताप की क्षमता रखते हैं; वे रक्त देखकर चौंकते हैं, धनुष हटाते हैं, ग्लानि से भरते हैं और पीड़ित जीव से पूछते हैं कि उसने आवाज़ क्यों नहीं उठाई। आधुनिक सत्ता की त्रासदी यह है कि वह रक्त देखकर भी अक्सर धनुष का भार बढ़ा देती है और फिर घोषणा करती है कि मेंढक राष्ट्रविरोधी ढंग से सिसक रहा था। इसलिए तुलना चरित्र की नहीं, परिस्थिति की है। राणा का रूपक इसी बिंदु पर अर्थवान हो उठता है: शासन स्वयं को रामराज्य कहता रहे, किंतु उसकी नैतिक परीक्षा इस बात से होगी कि उसके धनुष के नीचे कौन दब रहा है और वह रक्त देखकर धनुष हटाता है या नहीं।
राणा ने युवा आंदोलन को शोर, अव्यवस्था या राजनीतिक षड्यंत्र की तरह नहीं देखा; उन्होंने उसकी सिसकी सुनी है। वह सिसकी उस युवा की है जिसकी उम्र प्रतीक्षा में सूख रही है, जिसकी परीक्षा स्थगित होती है, जिसका परिणाम विवाद में फँसता है, जिसकी नौकरी विज्ञापन और नियुक्ति के बीच कहीं मर जाती है। छात्र सड़क पर इसलिए नहीं आता कि उसे सड़क प्रिय है; वह इसलिए आता है क्योंकि संस्थानों के भीतर उसके लिए कोई सुनने वाला कक्ष शेष नहीं रह जाता।
इस ट्वीट की सबसे बड़ी शक्ति उसका संयम है। इसमें नारा नहीं, कथा है; क्रोध नहीं, करुणा है; आरोप नहीं, एक ऐसा प्रश्न है जिसकी धार आरोप से कहीं गहरी है। राणा ने राम का नाम लेने वाली सत्ता को राम की ही नैतिक कसौटी पर रख दिया है। इससे अधिक सुसंस्कृत और इससे अधिक शर्मसार कर देने वाला राजनीतिक व्यंग्य शायद ही संभव हो। उन्होंने शासन पर कीचड़ नहीं फेंका; बस उसके सामने एक दर्पण रख दिया—और दर्पण में धनुष के नीचे से बहती हुई रक्त की पतली, चमकती हुई धारा दिखाई देने लगी

आशुतोष राणा का ट्वीट-
लंका विजय के लिए समुद्र पर वानर भालुओं के द्वारा पुल का निर्माण किया जा रहा था, श्रीराम समुद्र तट बैठे हुए थे इस निर्माण कार्य को देख रहे थे। अचानक उनकी दृष्टि भूमि के उस भाग पर गई जहाँ उनके हाथ में पकड़े हुए धनुष का अंतिम भाग टिका हुआ था, उन्होंने देखा वहाँ रक्त की धार है ! उन्होंने चौंक कर वहाँ से अपना धनुष हटाया तो देखा एक मेंढक लहूलुहान अवस्था में वहाँ सिसक रहा है।
श्रीराम इस दृश्य को देखकर दुख और ग्लानि से भरे हुए मेंढक से बोले- मैं इतनी देर से इस स्थान पर अपना धनुष टिकाए हुए था, मुझे ज्ञात ही नहीं था की मेरा धनुष किसी भूमि पर नहीं किसी जीव पर टिका हुआ है जो अनजाने ही मेरे धनुष के भार से रक्तरंजित होकर प्रताड़ित हो रहा है! मैं चकित हूँ इतने कष्ट में होने के बाद भी तुमने मुझसे कहा क्यों नहीं?
मेंढक बोला- प्रभु, जब संसार मुझे दबाता है तब मैं राम से बोलता हूँ, किंतु जब स्वयं श्रीराम ही मुझे दबा रहे हैं तब मैं किससे बोलता? जय श्री सीताराम


