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सुख-दुख

हॉस्पिटल के बेड पर ऑक्सीजन मास्क लगाए शुभांकर मिश्रा की ये तस्वीर एक बड़ी सीख देती है!

Man lying in hospital bed with an oxygen mask and IV tubing, resting with eyes closed.

जिंदगी में काम से कम चार दोस्त ऐसे चाहिए जिससे आप शरीर के किसी भी भाग पर मलहम लगवा सको… जिंदगी की 80% मुश्किलें आसान हो जाएगी..
-सुनील सिंह बघेल, वरिष्ठ पत्रकार


अपूर्व भारद्वाज-

हॉस्पिटल के बेड पर ऑक्सीजन मास्क लगाए शुभांकर मिश्रा की यह तस्वीर देखकर एक बात याद आती है—सोशल मीडिया पर आपकी हैसियत उतनी स्थायी नहीं, जितनी आपको दिखाई देती है।

आज 89 लाख लोग आपको follow करते हैं। अरबों views हैं। हर पोस्ट पर हजारों-लाखों लोग प्रतिक्रिया देते हैं।

और धीरे-धीरे एक भ्रम पैदा होता है— “मैं लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हूँ।” यही सबसे बड़ा भ्रम है।

शुभांकर ने अपनी पोस्ट में प्रणय रॉय का उदाहरण दिया। एक दौर में प्रणय रॉय भारतीय टेलीविजन न्यूज़ का इतना बड़ा नाम थे कि शायद ही कोई उन्हें न जानता हो। आज नई पीढ़ी के बहुत से लोग उनका नाम तक नहीं जानते।

इसका मतलब यह नहीं कि प्रणय रॉय का योगदान कम हो गया। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि दुनिया आगे बढ़ गई।

सोशल मीडिया की audience आपकी नहीं है। वह आपके content की है। जब तक आप उसे कुछ दे रहे हैं—वह आपके साथ है।

जिस दिन आप रुक गए, वह किसी और को देखने लगेगी। आज के करोड़ों views कल की यादों की गारंटी नहीं हैं।

इसलिए followers की संख्या से ज्यादा जरूरी है कि आप लगातार कुछ ऐसा करते रहें जिसे लोग देखना, सुनना और याद रखना चाहें।

क्योंकि सोशल मीडिया पर सबसे बड़ा सच यही है— आपको कोई याद नहीं रखता है… और लोग किसी और शुभांकर की और बढ़ जाते हैं।

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