नई दिल्ली/रांची: लोकसभा ने बुधवार को खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को पारित कर दिया। इस संशोधन का सीधा असर झारखंड जैसे खनिज संपदा वाले राज्यों पर पड़ सकता है। विधेयक के जरिए राज्य सरकारों द्वारा खनिज और खनिजयुक्त भूमि पर लगाए जाने वाले अतिरिक्त कर, उपकर या किसी अन्य शुल्क की व्यवस्था पर रोक लगाई गई है।
विधेयक के पारित होने के बाद झारखंड में खनिजों पर लगाए जाने वाले सेस को लेकर चल रही व्यवस्था खत्म हो जाएगी। इसका असर राज्य सरकार की राजस्व व्यवस्था और कई योजनाओं के वित्तपोषण पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
राज्यों की ओर से वसूला गया कर वापस नहीं होगा
संशोधन में यह स्पष्ट किया गया है कि कानून लागू होने से पहले राज्यों द्वारा खनिजों पर वसूली या जमा की जा चुकी रकम वापस नहीं की जाएगी। हालांकि, कानून लागू होने के बाद ऐसी कोई राशि वसूल नहीं की जा सकेगी।
विधेयक के अनुसार खनिज वाली भूमि के संबंध में कोई भी कर या शुल्क केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों, सीमाओं और रॉयल्टी के आधार पर ही तय किया जा सकेगा।
झारखंड में पहले से लागू था सेस
रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2024 में राज्यों को खनिज अधिकारियों पर सेस लगाने के अधिकार को मान्यता दी थी। इसके बाद झारखंड सरकार ने नवंबर 2024 में झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस एक्ट, 2024 लागू किया था।
झारखंड ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य बना था। इस कानून के तहत राज्य सरकार को खनिज वाली भूमि पर विशेष उपकर यानी सेस लगाने का अधिकार मिला था। इससे मिलने वाली राशि का इस्तेमाल सामाजिक सुरक्षा और जनहित की योजनाओं में किया जा सकता था।
मंईयां सम्मान समेत योजनाओं पर असर?
विधेयक के बाद झारखंड में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के वित्तपोषण को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि झारखंड सरकार मंईयां सम्मान योजना समेत कई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए खनिजों से मिलने वाले सेस के राजस्व का इस्तेमाल कर रही थी।
मंईयां सम्मान योजना के तहत करीब 51 लाख महिला लाभुकों को हर महीने 2,500 रुपये का भुगतान किया जा रहा है। ऐसे में सेस की व्यवस्था खत्म होने से राज्य के सामने इन योजनाओं के लिए वैकल्पिक राजस्व जुटाने की चुनौती बढ़ सकती है।
विपक्ष ने किया विरोध
लोकसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी सांसदों ने इसका विरोध किया। विपक्ष का कहना था कि खनिज संपदा वाले राज्यों के राजस्व अधिकारों को सीमित किया जा रहा है।
विधेयक के पारित होने के बाद अब इसे राज्यसभा से पारित होना और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना बाकी है। इसके बाद इसके प्रावधान कानून का रूप ले सकेंगे।
झारखंड के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की अर्थव्यवस्था और सरकारी राजस्व में खनिज क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। ऐसे में खनिजों पर सेस लगाने का अधिकार खत्म होने से राज्य की कमाई और सामाजिक योजनाओं के बजट पर इसका कितना असर पड़ेगा, इस पर अब नजर रहेगी।

मोदी सत्ता दावा कर रही है कि इस बार मानसून सत्र में संसद की प्रोडक्टिविटी सिर्फ़ 17% रही। लेकिन, आरएसएस की यह क्रिमिनल सत्ता यह नहीं बताएगी कि इसी 17% कामकाज के बीच मैगी बनाने की तर्ज़ पर 12 बिल पास हो गए। बंदर की तरह तमाशा करने वाला विपक्ष जेन ज़ी आंदोलन की लहर पर दौड़ना चाहता है। ऐसा होगा नहीं। राहुल गांधी ने कल दो बार हद पार की। मावलंकर हॉल में उन्हें तमाशा करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। उनके लिए ऐसा करना ज़रूरी था, ताकि ध्यान भटका सकें। यह उस बड़ी कीमत के बदले है, जो 20 जुलाई के बाद विपक्ष ने चुकाई है। जैसे, संसद ने पारित हुआ यह माइनिंग बिल। इसने झारखंड के हिस्से का माइनिंग सेस छीन लिया। इसी झारखंड में कांग्रेस सत्ता की पार्टनर है।
आप कहेंगे–विपक्ष के पास जीत का गणित नहीं। पर FCRA और परिसीमन के मामले में जरूर है।
UPA राज में इसी तरह की साज़िश कांग्रेस ने PESA कानून को कमज़ोर कर ग्राम सभाओं को लकवाग्रस्त बनाने का किया। कल शाम रोटी बनाते हुए एक मित्र से बात हो रही थी, जिन्होंने यह सब होते अपनी आंखों से देखा। वे कह रहे थे कि कांग्रेस आज भी बीजेपी की पिच पर बैटिंग कर रही है।
अब धीरे–धीरे जेन ज़ी और अल्फा अपनी पिच तैयार कर रही है, जिस पर बैटिंग बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किल है। मोदी सत्ता को 2014 में सत्ता कब्जाने के बाद ज़मीन नहीं बनानी पड़ी। वह तो तैयार थी। बस, उसे पुख़्ता करना था। मैं बहुत बार लिख चुका हूं कि कांग्रेस ने जितना महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज को भुलाया, उतना ही राजीव गांधी के सपनों को भी।
ये वे लोग थे, जो लोगों की सुनते थे, नब्ज़ जानते थे। नेहरू से लेकर राजीव तक की विरासत को उदारीकरण की आड़ में भुलाया गया।
आदिवासी राज्य झारखंड के खनिज अब बीजेपी के कॉरपोरेट मित्रों के हाथ में हैं।
-सौमित्र राय, वरिष्ठ पत्रकार


