इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय का शुरुआती हिस्सा – आस्था, भक्ति और राजनीति के बीच सच्चाई से हम सब का वास्ता है। रेंगने के लिए बार कौंसिल ने कानून का उल्लंघन किया है, इसके मुखिया की विदाई होनी चाहिए।
संजय कुमार सिंह
आज खबर है – भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई), नेशनल एकेडमी ऑफ़ लीगल स्टडीज़ एंड रिसर्च (नलसार), हैदराबाद के छात्रों ने बार कौंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) से पूछा आप कौन हैं? पूर्व छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, (बीसीआई का) परिपत्र अवैध है, असहिष्णुता दिखाता है। छात्रों ने कहा है वे अभी भी सीजेआई को मुख्य अतिथि बनाने के खिलाफ हैं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा है, यह मेरे और उनके बीच का मामला है (टाइम्स ऑफ इंडिया)। द टेलीग्राफ के अनुसार, नलसार, हैदराबाद के पूर्व छात्रों (असल में इस साल परीक्षा पास करने वाले) ने बार कौंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को एक खुला पत्र लिखा है। इसमें संस्थान के इस साल के स्नातकों पर उनके हमले को ‘असंवैधानिक’, ‘मनमाना’ और ‘अमानवीय’ कहा गया है। यही नहीं, बीसीआई की कार्रवाई को इन छात्रों ने अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला कहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (बीसीआई) को उसके उस सर्कुलर के लिए फटकार लगाई, जिसमें नलसार यूनिवर्सिटी के उन छात्रों को प्रैक्टिस का लाइसेंस देने से मना कर दिया गया था, जिन्होंने सीजेआई सूर्यकांत के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर आने का विरोध किया था। कोर्ट ने छात्रों को ज़बरदस्ती की कार्रवाई से बचाया और लॉ ग्रेजुएट को लीगल एड काउंसिल के तौर पर काम शुरू करने का मौका दिया। जाहिर है, इस पूरे मामले में दो बाते हैं – एक तो बीसीआई की मनमानी और दूसरा सीजेआई का बड़प्पन। इसमें समझने वाली बात यह है कि बीसीआई ने मनमानी क्यों की, किसके लिए की, किसके दम पर की। इसे समझने के लिए जानना होगा कि बीसीआई प्रमुख मनन कुमार मिश्र कौन हैं और उन्होंने ऐसा आदेश क्यों निकाला जिसे कुछ ही घंटे में वापस लेना पड़ा। अगर मनन कुमार मिश्र जाने माने होते, सबको पता होता कि वे अधिवक्ताओं के प्रतिनिधि ही नहीं, भाजपा के सांसद भी हैं और मीसा भारती के लोकसभा के लिए चुने जाने से खाली हुई जगह पर भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं। यानी नए बने सांसद हैं तो लोग समझ जाते कि उत्साह संदिग्ध है। लोग अभी यह सब जानना चाहेंगे पर उसे नहीं बता कर मुख्य न्यायाधीश की उदारता को खबर बनाया गया है। यह खबर चाहे जैसी हो, चापलूसी भी है। मेरे लिए वह मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि हिन्दुओं का भला करने आई सरकार ने डबल, ट्रिपल इंजन होने पर भी बारह साल से ज्यादा समय में भी, हिन्दुओं का कोई भला नहीं किया है। चंदा-चोरी होने दिया सो अलग। फिर भी सरकारी लाभ पाने वाले लोग उसका समर्थन कर रहे हैं। यह पहला ठोस उदाहरण है लेकिन खबर कायदे से नहीं छपी है।
कहने की जरूरत नहीं है कि छात्रों ने सरकार, भाजपा और नरेन्द्र मोदी की मनमानी को रोक दिया है और पहली बार एक केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा हुआ है। इससे सरकार की परेशानी एक तरफ लेकिन आंदोलन में सक्रिय छात्रों को परेशान किए जाने के मामले हैं। गाली देने के नाम पर भी पुलिसिया कार्रवाई के साथ भिन्न तरीकों से धमकाने और डराने का काम हुआ है। आंदोलन के दौरान भी यह लिखा, कहा और बताया जाता रहा है कि सरकारी कार्रवाई परेशानी में डाल सकती है, भविष्य खराब हो जाएगा आदि। ऐसे में बीसीआई की कार्रवाई एक ऐसी संस्था और नियामक की कार्रवाई है जिसे छात्रों, अधिवक्ताओं और विधि क्षेत्र के मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम करना है। उसके मुखिया को सत्तारूढ़ पार्टी का राज्यसभा सदस्य बना दिया जाना कानूनन भले गलत न हो पर सरकार विरोधियों के खिलाफ उनकी ऐसी मनमानी कार्रवाई सांसद बनाने की कीमत चुकाने जैसी लगती है। यह भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप दिया जाना है और इस सरकार ने ऐसा खूब किया है। चूंकि मामले की शुरुआत भारत के मुख्य न्यायाधीश से ही हुई है ऐसे में बीसीआई अध्यक्ष को लगा होगा कि सब लोग खुश होंगे और उन्हें कोई रोकेगा नहीं। पर ऐसा नहीं हुआ और बीसीआई अध्यक्ष कुछ ही घंटे में अपना आदेश वापस लेने के लिए मजबूर हुए तो खबर सीजेआई की प्रशंसा है। दैनिक भास्कर में खबर है, प्रदर्शनकारी को दुष्कर्म की धमकी, याचिका लगाई। आप समझ सकते हैं कि सरकार के विरोधियों का इस व्यवस्था में क्या हाल है और इसमें बच्चों, महिलाओं को भी नहीं बख्शा जा रहा है। यह सब 2014 के बाद से सोशल मीडिया पर चल रही ट्रोलिंग का बड़ा और बिगड़ा रूप भी माना जा सकता है। लेकिन जनहित को खबर बनाने, जनता की परेशानियों को उजागर करने की बजाय सरकारी मनमानी और सरकार की सेवा को ढंकने, छिपाने का काम हुआ है।
अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है और जो खबर लीड है वह यह कि एयर इंडिया की फुकेत से दिल्ली की जिस उड़ान के पायलट के गांजा के नशे में होने की खबर है उसमें गंभीर खराबी आई थी जो खुद ठीक हो गई। हादसे के इतने दिनों बाद इस तरह की खबरें माहौल बनाने का काम ही करती हैं वरना पायलट का नशे में होना मुद्दा है उसे विमान की खराबी से जोड़ दिया जा रहा है। निश्चित रूप से विमान की खराबी भी मुद्दा है और उसे तो पायलट और यात्री रिपोर्ट करते ही, आवश्यक कार्रवाई होगी ही। लेकिन जो व्यवस्था है उसमें पायलट नशे में पाया गया तो इसलिए कि विमान में खराबी आई। नहीं आई होती तो संभव है पायलट का नशा करना पता ही नहीं चलता। अमर उजाला ऐसी ही रिपोर्टिंग पहले भी कर चुका है। करोड़ों के विमान में तकनीकी खराबी का मुद्दा उसकी बिक्री और विश्वसनीयता पर असर डाल सकता है इसलिए ऐसे मामलों में बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता है लेकिन मूल मुद्दा यह है कि कोई भी पायलट कभी भी कुछ देर के लिए भी नशे में ड्यूटी पर क्यों रहे। ऐसा हुआ है तो न सिर्फ संबंधित पायलट के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में ऐसा न हो। सिस्टम दुरुस्त हो पर खबर छपी है जो मुद्दे को कमजोर करती है, दूसरे मुद्दे खड़े करती है। नलसार के छात्रों के मामले में बीसीआई के आदेश के बाद की एक खबर अमर उजाला में अंदर के पन्ने पर है, पंजीकरण कराएं छात्र, पैनल में हम शामिल करेंगे। मुझे लगता है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को यह भी देखना चाहिए और वे देखेंगे ही कि नए छात्र जज के बच्चे हैं कि नहीं और भले उन्हें भी अधिकार हो लेकिन उनके जरिए रिश्वत दिए जाने के संस्थागत मामले को भी रोकना ही होगा।
देशबन्धु की लीड का शीर्षक भी आदर्श स्थिति की बात कर रहा है लेकिन अभी मुद्दा कुछ और है। भले इसे अब कहा गया है। अखबार ने इसे उपशीर्षक बनाया है – सीजेआई ने कहा, बीसीआई की दखलंदाजी पूरी तरह अनावश्यक। यह प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस, आरपीएफ और पुलिस के जवानों, बिना वर्दी वाले गुंडों के मामले में भी सही है। सरकार ने नहीं बताया कि यह सब कैसे हुआ, किसने करवाया। लेकिन बीसीआई नहीं कर पाया तो यह खबर नहीं है। सबको पता है। आज खबर यह होती कि मनन मिश्रा से पूछा गया कि उन्होंने क्या सोचकर ऐसा किया? यह जानने-समझने की कोशिश की जाती कि वे अपने बारे में या बीसीआई के अधिकारों के बारे में गलतफहमी में थे या सिर्फ अपने आका की सेवा करना चाहते थे उसमें उन्हें बाकी कुछ ध्यान ही नहीं रहा। उनका जवाब दिलचस्प होता, आगे की कार्रवाई के लिए रास्ता खोलता। यह दिलचस्प है कि मनन कुमार मिश्रा बोले और देशबन्धु ने पहले पन्ने पर रिवर्स में फोटो के साथ छापा है। यह बताए बिना कि वे 2024 से भाजपा के टिकट पर राज्यसभा के सदस्य हैं और खाली हुई सीट पर चुने गए हैं इसलिए उनके पास समय भी कम है। देशबन्धु की खबर है, विवाद पूरी तरह खत्म। इसमें कहा गया है, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के चेयरमैन और भाजपा सांसद मनन कुमार मिश्रा ने नालसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के छात्रों के वकालत के एनरोलमेंट पर रोक से जुड़े विवाद को पूरी तरह खत्म बताया है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय को भेजा गया पत्र जारी होने के करीब 30 मिनट के भीतर ही वापस ले लिया गया था और उस पर कभी अमल नहीं हुआ। मुझे लगता है कि विवाद तो अब शुरू हुआ है। चोर दुकान का ताला तोड़ दे और पकड़ा जाए तो कहे कि मैं तो अंदर घुसा ही नहीं – का मतलब चोरी की कोशिश खत्म हो गई, हो सकता है। पर कोशिश हुई यह कम नहीं है। खबर पढ़ने वाला सब जानना चाहता है। यहां मुद्दा यह है कि ऐसा आदेश जारी क्यों किया गया जो 30 मिनट में वापस ले लिया गया। अगर 30 मिनट में वापस लेना था जो जारी क्यों किया गया और जारी किया गया तो वापस क्यों लिया गया। अपराधी देखकर एफआईआर नहीं होनी चाहिए लेकिन आजकल देश में ऐसा ही चल रहा है। कई उदाहरण हैं।
नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – छात्रों को विरोध प्रदर्शन का हक। मुझे लगता है कि यह खबर नहीं है। छात्रों को पता था तभी उन्होंने विरोध किया और विरोध के कारण ही बीसीआई के आदेश को वापस लिया गया। इसका एक मतलब यह भी है कि बीसीआई अध्यक्ष को नहीं पता था कि छात्रों को विरोध का हक है या यह नहीं पता था कि विरोध करने वालों पर वे प्रतिबंध नहीं लगा सकते हैं। चूंकि मामला सीजेआई से संबंधित था तो उन्होंने मना कर दिया या इन्होंने वापस ले लिया लेकिन देश में ऐसे लोगों के पास अधिकार है, उसका दुरुपयोग हो रहा है और सजा मुद्दा नहीं है। – मेरे हिसाब से आज जो खबर थी वह खबर है ही नहीं। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर दो कॉलम में छपी है। शीर्षक है, नालसर विवाद के बीच सीजेआई ने बीसीआई को फटकार लगाई कहा, छात्रों को विरोध करने का अधिकार है। द हिन्दू में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन अंदर होने की सूचना पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, नलसार विवाद में सीजेआई ने बीसीआई की कार्रवाई पर सवाल किया। दि एशियन एज में यह पहले पन्ने पर तीन कॉलम की खबर है। इसमें भी यही कहा गया है कि नलसार नामांकन विवाद में सीजेआई ने बीसीआई को फटकारा। गैर जरूरी कहा। उपशीर्षक में है कि विरोध के बाद बीसीआई ने प्रतिबंध को वापस ले लिया। अकेले टेलीग्राफ ने इसे दो अलग खबर के रूप में अलग-अलग छापा है। एक का शीर्षक है – सीजेआई ने कहा बीच में न पड़ें। दूसरे का शीर्षक है – नलसार के छात्रों ने कहा आदेश अवैध है। जाहिर है, इस अवैध आदेश के लिए कार्रवाई होनी चाहिए। पर होगी? ऐसी खबर नहीं है, समय बताएगा। ऊपर आपने नौ अखबारों की खबर पढ़ ली। मैंने यही महसूस किया कि इसमें खबर वह नहीं है जो होनी चाहिए थी। जो किसी पाठक को जानने की इच्छा होगी या छिपाई जाएगी। वैसे भी, खबर वही होती है जो छिपाई जाती है। ऊपर जो मैंने देखा और महसूस किया के बाद 10वें अखबार, इंडियन एक्सप्रेस में एक शीर्षक है – सदस्यों ने कहा बीसीआई प्रमुख ने अपने स्तर पर काम किया। आप समझ सकते हैं कि मामला क्या है और जो है वह खबर तो नहीं ही है। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी विस्तृत खबर में बताया है कि यह आदेश बीसीआई प्रमुख का अपना था और इंडियन एक्सप्रेस ने मनन मिश्रा की प्रतिक्रिया लेने की पूरी कोशिश की लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। जाहिर है, मुद्दा मनन मिश्रा के खिलाफ कार्रवाई का होना चाहिए पर वह खबर ही नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने इस मामले में संपादकीय भी लिखा है, रेंगने के लिए बार कौंसिल ने कानून का उल्लंघन किया है, इसके मुखिया की विदाई होनी चाहिए।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


