इंडियन एक्सप्रेस का संतुलन – संसद के मकर द्वार पर विपक्षी दलों के सांसद (बाएं) और सत्तारूढ़ दल के सांसद। अखबार आज यह भी यह भी नहीं बताते कि आरटीआई से पेलेट गन चलने की पुष्टि हो गई है।
संजय कुमार सिंह
आज के अखबार नहीं बताते हैं कि लोकसभा में अमित शाह का संबोधन हुआ या नहीं, हुआ तो क्या और नहीं हुआ तो क्यों? आप जानते हैं कि कल अखबारों में दो ही खबर सबसे बड़ी थी। अमित शाह लोकसभा में बिन्दुवार जवाब देंगे, राहुल गांधी भागें नहीं। पर क्या हुआ यह आज के अखबारों में नहीं मिला। दूसरी ओर, संसद में चंदा चोरी का मामला अभी भी जारी है। हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार, राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ पद के उम्मीदवारों को आस्था की परीक्षा का सामना करना पड़ रहा है। अमर उजाला की खबर का शीर्षक है, …. पहले दिन इंटरव्यू देने वालों में एनकाउंटर वाले आईपीएस व संतों की संगत वाले आईएएस अफसर। एक खबर आज अरुणाचल में चीन के दावे की है। भारत ने अभी तो इसे खारिज कर दिया है लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, धमकी भरी चिट्ठी के बाद कश्मीर घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडितों से कहा गया है कि सतर्क रहें, घर पर रहें। यह अमित शाह के इस दावे के बावजूद है कि आतंकवाद खत्म हो चुका है, 370 तो हटा ही दिया गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, ट्रम्प को टर्की से निकालने के लिए सुरक्षा कारणों से कैटरिंग ट्रक का इस्तेमाल करना पड़ा। देश दुनिया की ऐसी हालत में आज खबर यह भी है कि अमेरिका में अदाणी के खिलाफ सारे मामले बंद हो गए। हाल में खबर थी कि संसद में पास टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026 के जरिए यूपीआई और रूपे भुगतानों पर भविष्य में मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) या शुल्क लगाने का कानूनी रास्ता खुल गया है। इस नए कानून और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के बीच संबंध को लेकर राजनीतिक गलियारों और आर्थिक हलकों में ‘ट्रंप कनेक्शन’ की चर्चा थी। मोटे तौर पर इसे अमेरिकी कंपनियों वीसा और मास्टरकार्ड को राहत देने वाला बिल कहा जाता है। वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन का कहना है, अदाणी को अमेरिका में जेल से बचाने की क़ीमत भारतीय व्यापारी और उपभोक्ता उठाएंगे।
देश में शिक्षा और परीक्षा की हालत सुधारने के लिए कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन को लाठी-गोली से कुचलने की कोशिश के विरोध में संसद में चल रहे गतिरोध को खत्म होने की संभावना कल के अखबारों ने दिखाई थी। आज मेरे किसी भी अखबार में पहले पन्ने पर यह खबर नहीं है कि अमित शाह लोकसभा में आए या नहीं, आए तो क्या बोले और नहीं बोले को क्यों? अकेले इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर का आधा शीर्षक है, …. विपक्ष और भाजपा की भिड़ंत (संसद के) बाहर। आप जानते हैं कि दिल्ली में छात्रों के आंदोलन के बाद से झारखंड में छात्रों का आंदोलन शुरू हो गया था। वहां भाजपा की डबल इंजन की सरकार नहीं है और हेमंत सोरेन के नेतृत्व में जो सरकार है उसे कांग्रेस यानी राहुल गांधी का समर्थन है। 10 अगस्त को विधानसभा घेरने की अपील पर निकले छात्रों पर पुलिस के लाठी चार्ज के बाद भाजपा प्रायोजित राहुल विरोध की फोटो आज इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपी है। जैसा मैंने पहले बताया, खबर विपक्ष और भाजपा के भिड़ंत की है। अखबार ने लिखा है कि संसद के मकर द्वार पर विपक्षी दलों के सांसद (बाएं) और सत्तारूढ़ दल के सांसद (फोटो ऊपर)। आज यह खबर देशबन्धु और नवोदय टाइम्स में भी पहले पन्ने पर है। दैनिक भास्कर की लीड झारखंड की खबर है, आंदोलित छात्रों के दबाव में दो और परीक्षाएं रद्द। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, एयर इंडिया पायलट गांजा के नशे में था, सहयोगी उड़ा रहा था विमान। अगर ऐसा है तो विमान सहयोगी उड़ा रहा था जो नशे में नहीं था और उड़ान के दौरान हुई गडबड़ी (टर्बुलेंस) के लिए जिम्मेदार कुछ और होगा। खबर के अनुसार, …. हाइड्रोलिक में खराबी से हुई थी यह घटना। यही नहीं, हाईलाइट किया गया अंश इस प्रकार है, “कॉकपिट लाइव : हवा में अचानक आया विमान के रुकने का अलर्ट”। नागरिक उड्डयन मंत्रालय सूत्रों के हवाले से छपी इस रिपोर्ट में कहा गया है, मीडिया में लीक हुई एअर इंडिया की आंतरिक उड़ान सुरक्षा रिपोर्ट के अनुसार, उस समय फुकेट-दिल्ली विमान में अफरातफरी मची थी, जब एयरबस ए320 विमान उड़ा रहे सह पायलट को प्लेन की स्पीड बढ़ाने और उसे अचानक रुकने से बचाने के लिए प्लेन का अगला हिस्सा (नोज) तेजी से नीचे की ओर झुकाना पड़ा।
हवाई हादसे के संबंध में सूत्रों की यह खबर बेहद गैर जिम्मेदारी पूर्ण रिपोर्टिंग हैं और पत्रकारिता के गिरते स्तर का उदाहरण है जो राजनीतिक खबरों से आगे निकलता दिख रहा है। यह खबर आज इंडियन एक्सप्रेस में भी है लेकिन पहले पन्ने पर सिर्फ गांजा के नशे में होने की पुष्टि है। अमर उजाला की खबर में कहा नहीं गया है लेकिन इसका मतलब यही लगता है कि पायलट नशे में था तो क्या हुआ, सह-पायलट तो था। विमान टर्बुलेंस में गया तो उसकी वजह पायलट का नशे में होना नहीं है, मशीनी खराबी है जिसे सह पायलट ने समय रहते देख लिया, संभाल लिया और यात्रियों को जो चोट लगी वह मामूली है, उसने संभाला नहीं होता तो बड़ा हादसा हो सकता था। मुझे लगता है कि यह 100 प्रतिशत सही और वास्तविक स्थिति भी हो तो सूत्रों की खबर नहीं है और इस आधार पर एजेंसियां जो करें अभी तो पायलट का नशे में होना ही खबर है भले ‘लीक’ हो। पत्रकारिता में लीक (अगर सही है) तो उपलब्धि है। गलत है तो नाम लेकर, सूत्रों के नाम औऱ पहचान के साथ बताया जाना चाहिए कि फलां खबर या लीक इन कारणों से इस तरह गलत है। अमर उजाला ने दोनों नहीं किया है। बाकी नौ अखबारों में यह खबर लीड नहीं है।
इंडियन एक्सप्रेस की, “…. विपक्ष और भाजपा में भिड़ंत” वाली खबर आज देशबन्धु में भी है। हालांकि फोटो सिर्फ विपक्ष का है, सत्तारूढ़ दल के विरोध प्रदर्शन की फोटो इंडियन एक्सप्रेस के साथ नवोदय टाइम्स में है। खबर का शीर्षक है, लोकसभा में हंगामे के बीच दो बिल पारित, कार्यवाही स्थगित। नवोदय टाइम्स ने कल जेपी नड्डा को टॉप पर तीन कॉलम में छापा था, शीर्षक था – जंतर मंतर पर नहीं चली थी गोली और इसके साथ छपा था – अमित शाह बोलेंगे, भागना मत : रिजिजू। आज पहले पन्ने पर नहीं बताया गया है कि अमित शाह क्या बोले या राहुल गांधी भाग गए इसलिए नहीं बोल पाए। रिजिजू कहां हैं या क्या बोले? एक खबर में लिखा है, …. हंगामे के कारण मंगलवार को लोकसभा की कार्यवाही एक बार के स्थगन के बाद अपराह्न दो बजकर 25 मिनट पर दिन भर के लिए स्थगित कर दी गई। रांची में लाठी चार्ज के बाद भाजपा की अपील पर कल झारखंड बंद था इसकी खबर आज दिल्ली के अखबारों में प्रमुखता से नहीं है। दैनिक भास्कर में यह लीड के साथ है। लीड का शीर्षक है, आंदोलित छात्रों के दबाव में दो और परीक्षाएं रद्द। ऐसा ही अमर उजाला में है। मुख्य खबर है,”क्रांति मार्च के अगले ही दिन तीन परीक्षाएं निरस्त”। इसके साथ छपी खबर का शीर्षक है, “राज्य बंद : भाजपाइयों और पुलिस में झड़प”। देशबन्धु की मुख्य खबर का शीर्षक है, “छात्रों का चोला पहनकर राजनीतिक स्वार्थ साधने में लगे भाजपाई”। इसका फ्लैग शीर्षक है, “हेमंत सोरेन ने विधानसभा में भाजपा पर निशाना साधा”।
अंग्रेजी अखबारों में आज इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू की लीड लगभग एक ही खबर है। द टेलीग्राफ में भी यही लीड है लेकिन इसका शीर्षक अलग है। नवोदय टाइम्स में पहले हिन्दी का शीर्षक पढ़िए – एफसीआरए बिल को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने पर विचार। राज्यसभा की कार्य मंत्रणा समिति (बीएसी) की बैठक में कांग्रेस, टीएमसी ने की विधेयक को वापस लेने की मांग। इस पर टेलीग्राफ का शीर्षक जानने से पहले देखिए दि एशियन एज की लीड का शीर्षक – दिल्ली के आंदोलन पर लोकसभा में (अमित) शाह का भाषण आज होने की उम्मीद। इसमें भी साथ छपी खबर का शीर्षक है, सरकार जांच के लिए एफसीआरए विधेयक को जेपीसी को भेज सकती है; विपक्ष ने वापस लेने की मांग की। अब देखिए द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक, आमना-सामना और एफसीआरए ‘सौदा’। इस सौदे के लिए भाजपा को ताकत कैसे मिली – का अनुमान दि एशियन एज के इस शीर्षक से होता है – भाजपा, अभाविप ने छात्रों के आंदोलन का समर्थन किया, रांची को पूरी तरह रोक दिया। उपशीर्षक है, गतिरोध जारी, विधानसभा को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया और दि एशियन एज की लीड आज इन सबसे अलग है। आइए अब उसे भी देख लें। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट ने कहा : बंगाल के एसआईआर ट्रिब्यूनल को तेजी से काम करना चाहिए”। इस खबर का इंट्रो है, प्रक्रिया अनंत काल तक नहीं चल सकती है, प्रदर्शन से जुड़े आंकड़े मांगे। आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की वोटर लिस्ट को नई लगी बीमारी, लॉजिकल डिसक्रिपेंसी के लिए की गई इस कार्रवाई के कारण पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में लाखों लोग वोट नहीं डाल सके और जो कार्रवाई चुनाव से पहले खत्म हो जानी चाहिए थी वह अभी भी चल रही है और सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्रक्रिया अनंत काल तक नहीं चल सकती है। टाइम्स ऑफ इंडिया में ही आज एक खबर है, ‘सीजेपी ने सीजेआई की टिप्पणी को गलत तरीके से पेश किया‘: सुप्रीम कोर्ट ने पीआईएल पर सरकार और सीबीआई से जवाब मांगा। नई दिल्ली डेटलाइन से धनंजय महापात्रा की रिपोर्ट के अनुसार, सीजेआई सूर्यकांत की ‘कॉकरोच‘ वाली टिप्पणी से ‘कॉकरोच जनता पार्टी‘ (सीजेपी) का जन्म हुआ, जिसने जेन जी का विरोध प्रदर्शन किया। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सरकार और सीबीआई से एक पीआईएल पर जवाब मांगा। इस पीआईएल में उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है जिन्होंने “इस टिप्पणी का व्यावसायिक फायदा उठाया और इसे ऐसा मतलब दिया जो कभी था ही नहीं”। याचिकाकर्ता और अधिवक्ता राजा चौधरी ने सीजेआई की अध्यक्षता वाली बेंच से कहा, “संवैधानिक अदालतों की मौखिक टिप्पणियों को कमर्शियल फायदे वाले डिजिटल कंटेंट या वायरल पॉलिटिकल तमाशे में नहीं बदला जा सकता।”
आज की यह खबर न्यायपालिका की टिप्पणियों और डिजिटल युग के बीच बढ़ते टकराव को उजागर करती है, जहां अदालती कार्यवाही के अंश सोशल मीडिया और राजनीतिक अभियानों का हिस्सा बन जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार और सीबीआई से जवाब मांगना दर्शाता है कि अदालतें अपनी मौखिक टिप्पणियों के व्यावसायिक इस्तेमाल, दुरुपयोग और उन्हें ‘डिजिटल तमाशा’ बनाए जाने को लेकर सतर्क हो रही हैं। हालाँकि, इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू यह भी है कि जनता और खासकर युवा वर्ग (जेन जी) न्यायपालिका की भाषा और न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर संवेदनशील और मुखर हैं। कोर्ट क्लिपिंग्स पर रोक और पूर्व के विवादों के बाद, सार्वजनिक टिप्पणियों को राजनीतिक या व्यावसायिक हथियार बनाए जाने के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का यह रुख न्यायिक गरिमा बनाए रखने और सार्वजनिक बहस की सीमा को तय करने की दिशा में एक कदम साबित हो सकता है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


