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आज के अखबार (दो) : न्यायमूर्ति वर्मा पर लगे आरोपों के मुकाबले मुख्य न्यायाधीश पर आरोप AI से सवाल-जवाब

Newspaper front page showing the headline 'Charges against Justice Varma proved; LS panel', with the word 'proved' circled in red.

‘साबित’ जो पैसा न्यायमूर्ति वर्मा का होना साबित नहीं हुआ, बरामद नहीं हुआ, जल गया वह उनका साबित हो गया क्योंकि वे उसके अपना नहीं होने का सबूत नहीं दे सके। सर्वोच्च न्यायालय मेरी पुश्तैनी जमीन पर नहीं बना है इसे मैं कैसे साबित कर सकूंगा? मैं तो तर्क और कारण ही बता सकूंगा मानना तो सामने वाले को है। नहीं माने तो मेरा हो जाएगा? जाहिर है नहीं, लेकिन जले हुए नोटों का मामला अलग है।

संजय कुमार सिंह

न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा पर आरोप है कि उनके घर के बाहरी हिस्से में रखी नकदी के संबंध में उनके जवाब संतोषजनक नहीं रहे। क्या किसी ने उन्हें पैसे देने का आरोप लगाया है। क्या कोई मामला या उनका फैसला है जिसमें पैसे लेने का शक या सबूत है। (मेरा सवाल)

एआई, गूगल जेमिनाई का जवाब : पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा से जुड़े मामले की स्थिति इस प्रकार है: (1) क्या किसी ने उन्हें पैसे देने का आरोप लगाया है? सामान्यता किसी विशिष्ट व्यक्ति या संस्था ने प्रत्यक्ष रूप से यह सार्वजनिक आरोप नहीं लगाया है कि उसने न्यायमूर्ति वर्मा को पैसे दिए थे। यह मामला मुख्य रूप से अघोषित / बेनामी नकदी की बरामदगी से जुड़ा है। (मेरा मानना है कि उनके घर पर था तो उनका ही है यह क्यों माना जाए? इसका पता आग लगने पर चला था और तब वे घर पर या शहर में नहीं थे। निष्पक्ष न्याय में Benefit of doubt न्यायमूर्ति वर्मा के साथ है)।  

आप जानते हैं, एआई ने याद दिलाया है, मार्च 2025 में नई दिल्ली स्थित सरकारी आवास (30 तुगलक क्रीसेंट) के स्टोररूम/आउट हाउस में आग लगने के बाद अग्निशमन कर्मियों को ₹500 के नोटों के ढेर (जले और आधे जले हुए) मिले थे। संसद द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति (जांच समिति अधिनियम, 1968 के तहत) ने अगस्त 2026 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला कि न्यायमूर्ति वर्मा अपने परिसर में इतनी बड़ी मात्रा में बरामद नकदी के स्रोत, स्वामित्व या मौजूदगी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके। (अगर नकदी उनकी नहीं हो, उन्होंने रखा ही नहीं हो या उन्हें पता ही नहीं हो तो वे संतोषजनक जवाब कैसे देंगे? या कौन सा जवाब संतोषजनक माना जा सकता है।)  

2. क्या सार्वजनिक जांच रिपोर्टों और अदालती रिकॉर्ड के अनुसार कोई मामला या फैसला है जिसमें पैसे लेने का शक या सबूत है?  

किसी विशेष मुकदमे या फैसले का ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिसके बदले यह रकम ली गई हो। इसके बावजूद जांच समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ तीन प्रमुख आरोपों को साबित माना है। अघोषित नकदी की बरामदगी व स्वामित्व पर स्पष्टीकरण न देना भी एक आरोप है। (मेरी टिप्पणी – लेकिन मुद्दा यह है कि पैसे उनके हों ही नहीं तो वे क्या जवाब दे सकते हैं? दूसरी ओर, सीबीआई के एक मामले में जज को उनके वकील बच्चों के जरिए सरकार की तरफ से पैसे दिए जाने और सरकार के पक्ष में फैसले का उदाहरण है।)

न्यायमूर्ति वर्मा पर एक आरोप साक्ष्यों को सुरक्षित न रखना भी है। आग की घटना के बाद स्टोररूम के साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़/गड़बड़ी होने देना। (मेरी टिप्पणी – सर्वविदित है कि घटना के समय वे शहर में नहीं थे। आग लगने पर मामला अग्निशमन वालों के नियंत्रण में होगा। सबूत रखना, वीडियो बनाना, रिपोर्ट करना सब उनका काम था या उनके भरोसे ही हुआ होगा। वे यहां थे ही नहीं तो उन्हें कुछ करना नहीं था। घर में आग लगी तो क्या जला इसे सार्वजनिक करने का कोई नियम नहीं है। अघोषित नकदी की जानकारी उन्हें किसने दी और उसपर उन्होंने क्या कार्रवाई की – या नहीं की – यह महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन उसपर कोई खबर नहीं है। फिर भी) जांच के दौरान न्यायमूर्ति वर्मा द्वारा दिए गए बयानों और तर्कों को टालने वाला, अधूरा और भ्रामक माना गया है।

न्यायमूर्ति वर्मा ने आरोपों का खंडन करते हुए इसे अपने खिलाफ “साजिश” बताया था और दावा किया था कि वे उस दिन दिल्ली में नहीं थे तथा स्टोररूम में किसी और द्वारा नकदी रखी/प्लांट की गई हो सकती है। हालांकि, समिति ने कहा कि इस बचाव के समर्थन में न्यायमूर्ति वर्मा ने कोई सबूत पेश नहीं किया। न्यायमूर्ति वर्मा अप्रैल 2025 में पद से इस्तीफा दे चुके हैं। इसके समर्थन में क्या सबूत दिया जा सकता है, मैं नहीं समझ पा रहा हूं। वे यहां नहीं थे और नकदी खुले में नहीं रखी जाएगी और उन्होंने इतने पैसे कमाए ही नहीं – यह सबूत से कम क्यों हैं)। 

अब भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत से जुड़े अतीत के विवादों और हालिया न्यायिक घटनाक्रमों का विवरण इस प्रकार है: 1. बिल्डर/संपत्ति सौदों से जुड़े विवाद का विवरण – न्यायमूर्ति सूर्यकांत के संबंध में 2018–2019 के दौरान यह विवाद सार्वजनिक चर्चा में आया था: शिकायत /आरोप: वर्ष 2018-19 में जब न्यायमूर्ति सूर्यकांत को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय से पदोन्नत करके हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की गई थी, तब सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और कुछ अन्य शिकायतकर्ताओं द्वारा आपत्ति जताई गई थी। (यह एआई की सूचना है। इसपर मैं लिख चुका हूं, शिकायत निराधार नहीं है)।  आरोपों में एक रियल एस्टेट एजेंट/बिल्डर सतीश कुमार जैन से सांठगांठ के दावे शामिल थे। आरोप था कि वर्ष 2012 के दौरान कथित रूप से अघोषित/बेनामी संपत्तियों की खरीद-बिक्री में नकदी का लेन-देन हुआ था और कुछ संपत्तियों का कम मूल्यांकन दर्ज किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने इन शिकायतों और आपत्तियों की समीक्षा की थी। कॉलेजियम ने आरोपों में ठोस या प्रामाणिक साक्ष्यों की कमी पाते हुए पदोन्नति की सिफारिश को बरकरार रखा था, जिसके बाद वे हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और बाद में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बने।  

2. मुख्य न्यायाधीश बनाम पदमुक्त / इस्तीफा देने वाले न्यायाधीश का मामला – जनसामान्य में दो अलग-अलग मामलों (न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा) की तुलना को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालाँकि, दोनों मामलों की प्रकृति और कानूनी स्थिति में अंतर है: न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का मामला आप ऊपर पढ़ चुके। अब भारत के मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति सूर्यकांत का मामला – इस मामले में लगाए गए आरोप दस्तावेजों / शिकायतों पर आधारित थे, जो जांच और कॉलेजियम की समीक्षा के स्तर पर प्रामाणिक या निर्णायक साक्ष्य में नहीं बदल सके। सार्वजनिक और कानूनी दृष्टिकोण से अंतर मुख्य रूप से प्रत्यक्ष साक्ष्य की मौजूदगी और जांच समितियों के निष्कर्षों का है। जहाँ एक मामले में सरकारी आवास परिसर से भौतिक नकदी की बरामदगी और जांच रिपोर्ट मुख्य कारण बनी, वहीं दूसरे मामले में पुरानी शिकायतों को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा समीक्षा के बाद खारिज या अपर्याप्त माना गया था।

मुझे लगता है कि यह सरकार के समर्थक और विरोधी के लिए कानून के दो तरह से काम करने का अच्छा नमूना है और तमाम उदाहरण हैं जिनकी जांच करवाई जानी चाहिए ताकि इस बात की पुष्टि हो कि फैसले ऐसे ही हो रहे हैं क्या? याद रखिए 2018 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस करके क्या कहा था और क्या हुआ या नहीं हुआ। इसमें जजों को इनाम से लेकर प्रधानमंत्री का मुख्य न्यायाधीश के घर पूजा करने जाना शामिल है जो संभवतः पहली और आखिरी बार ही हुआ है। (समाप्त)

पिछली किस्त भी पढ़ें: आज के अखबार : न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोप साबित होने का दावा और भारत के मुख्य न्यायाधीश

लिंक यह रहा: https://www.bhadas4media.com/nyaymurti-verma-ke-khilaf-aarop-saabit/

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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