अमर उजाला की कल की लीड के बाद आज उसे दैनिक भास्कर की इस खबर को लीड बनाना चाहिए था। इससे कल की गलती की भरपाई हो जाती और पाठकों को सही सूचना मिल जाती।
संजय कुमार सिंह
अमर उजाला की आज की लीड का शीर्षक है, “आरोप साबित : जले नोटों का हिसाब नहीं दे पाए जस्टिस वर्मा, सबूत भी मिटाए थे”। मैं पूरी खबर एक सांस में पढ़ गया। दूसरे अखबारों की भी खबर देखी लेकिन मुझे नहीं लगता है कि आरोप साबित हो रहे हैं। या सबूत मिटाने के आरोप में दम है या जो स्थितियां थीं उनमें सबूत मिटाने का कोई लाभ होना था या ऐसी कोशिश की गई होगी। इस लिहाज से मेरा मकसद इस खबर के महत्व और इसे पहले पन्ने पर इतनी जगह देने का मकसद समझना है या बताना है। मेरे ख्याल से यह न्यायमूर्ति वर्मा को बदनाम करने के अभियान का भाग है और अभियान की कोशिश है कि उन्हें इस लायक भी नहीं रहने दिया जाए कि बाद में भी कोई उनकी बात सुने या उसपर यकीन करे। वरना आज कई खबरें हैं जो पहले पन्ने पर हो सकती थीं और उदाहरण दि एशियन एज है जिसका पहला पन्ना पूरा खाली है फिर भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अमर उजाला ने देश हित की तमाम खबरें छोड़कर इसे महत्व दिया है जबकि न्यायमूर्ति वर्मा इस्तीफा दे चुके हैं और अब उनके खिलाफ महाभियोग का औचित्य नहीं है (नवोदय टाइम्स)। शायद इसीलिए यह खबर दैनिक भास्कर में पहले पन्ने पर नहीं है, लेकिन अंदर है। न्यायमूर्ति वर्मा पर अगर आरोप हैं या थे तो उन्हें पर्याप्त परेशान और बदनाम किया जा चुका है। खबरों के अनुसार वे इस्तीफा दे चुके हैं। सामान्य तौर पर उनकी सेवानिवृत्ति 2031 में होनी थी लेकिन अपने खिलाफ चल रही महाभियोग की जांच प्रक्रिया के दौरान उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उनके साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज के खिलाफ सांप्रदायिक भाषण देने का मामला था। उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। रिटायर भी हो गए। चर्चा यह भी थी कि इन्हीं दो जजों के मामले में किसी निर्णय के लिए पूर्व राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को अचानक इस्तीफा देना पड़ा था। खबर ये सब भी होनी चाहिए थी। होती रहती तो आज की खबर भी सामान्य होती। पर ऐसा है नहीं। आइए, कुछ पुरानी खबरों के संदर्भ में इस खबर को समझें।
मुझे लगता है कि जज लोया की संदिग्ध मौत की जांच की जरूरत नहीं समझी गई, अदालत ऐसा कोई आदेश नहीं कर दे इसके लिए जनता के पैसे से वकील को करोड़ों की फीस दी गई लेकिन जांच नहीं होने दी गई। यही नहीं, भारत के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश पर आरोप हैं, उसकी चर्चा होती रही है। वे नौकरी में बने हुए हैं, फैसले कर रहे हैं, मामलों की सुनवाई कर रहे हैं जिसका असर देश और जनता पर पड़ रहा है। न्यायमूर्ति वर्मा नौकरी में नहीं हैं, जो हुआ उसकी सजा मिल चुकी। विचार करना है तो इसपर करना चाहिए कि सजा सही मिली या नहीं। वैसे भी हमारे यहां नियम है कि अपराधी छूट जाएं पर निर्दोष को सजा न मिले। सुनिश्चित यह किया जाना चाहिए कि वे निर्दोष तो नहीं हैं। पर उन्हें बदनाम किया जा रहा है। ठीक है कि रिपोर्ट जरूरत या औपचारिकता होगी और है तो खबर भी होगी ही। लेकिन पहले पन्ने पर लीड से लेकर पहले पन्ने पर नहीं रखने तक का कोई नियम होना चाहिए। ठीक है कि खबर है तो छपेगी लेकिन लीड बनाने का मकसद दूसरे तथ्यों के आलोक में संदिग्ध लगता है और समग्रता में देखें तो मुझे यह खबर बकवास लगती है। फिर भी यह खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है और खबर के साथ अखबार ने यह बताया है कि न्यायमूर्ति वर्मा के घर नकदी का जखीरा होने की खबर सबसे पहले यहीं छपी थी।
इस लिहाज से यहां लीड होना समझ में आता है। वैसे भी, यहां आरोप साबित सिंगल कोट है। वैसे तो यह तकनीकी मामला है लेकिन अखबार ने अपनी ओर से ईमानदारी बरती है जो अमर उजाला में नहीं है। सिंगल कोट में होने का मतलब है कि यह अखबार की खबर या उसका निष्कर्ष नहीं है, किसी ने कहा या दावा किया है। मुझे लगता है कि ऐसी हालत में खबर को वही महत्व मिलना चाहिए जैसा दावा है। लेकिन अमर उजाला सरकार का प्रचार करता लगता है। कल पायलट के गांजा के नशे में होने की खबर के साथ भी ऐसा ही था और कल मैंने उसपर भी लिखा है। आज अमर उजाला की खबर पढ़ने का बाद मैंने सबसे पहले द टेलीग्राफ देखा। यहां यह खबर सिंगल कॉलम में है और शब्द विशेष को सिंगल कोट में रखा गया है। यहां जो शीर्षक है, वह हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, नकदी को लेकर जज की चूक (का दोष) ‘स्थापित’। यहां स्थापित शब्द सिंगल कोट में होना बताता है कि वह स्थापित नहीं है, स्थापित होने का दवा किया जा रहा है। अखबार अपनी सहमति असहमति के बारे में कुछ भी नहीं कह रहा है। खबर जैसी आई वैसी परोसी गई। खबरों के मामले में ऐसा ही करना ठीक रहता है और यही किया जाना चाहिए। लेकिन अखबार प्रचारक हो गए हैं और सत्ता जो चाहती है उसका प्रचार करते हैं। इसमें जज लोया की मौत की जांच नहीं होने देना या उसकी जरूरत नहीं होने का प्रचार शामिल है। मुख्य न्यायाधीश के मामले में खबर नहीं देना भी अखबारों का विशेषाधिकार है। वह अवमानना का मामला नहीं है क्योंकि पुराना है और अवमानना हो रही है तो उसकी होगी जिसने आरोपों के बावजूद न्यायमूर्ति सूर्यकांत को भारत का न्यायाधीश बनाया, बनने दिया। जाहिर है वह भारत के मुख्य न्यायाधीश खुद नहीं हो सकते हैं। अवमानना के मामलों में भारत के मुख्य न्यायाधीशों के बड़प्पन के कई उदाहरण हैं। लेकिन समस्या उनके साथ भी है। कई बार ऐसा लगता है कि यह सरकार और सरकार के समर्थकों द्वारा किया जा रहा है। मीडिया का काम इसका पर्दाफाश करना है लेकिन वह इसमें शामिल दिख रहा है। कहा जा सकता है कि भोला लग रहा है पर मैं ऐसा नहीं मानता। मीडिया में कोई इतना भोला नहीं है और ऐसे भोले लोग मीडिया का काम कर रहे हैं तो मीडिया की पूरी संरचना और व्यवस्था को ठीक करने की जरूरत है, जो अलग मुद्दा है।
देशबन्धु में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा से संबंधित आज की खबर पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है। यहां भी खबर वैसे ही हैं। कोट नहीं किया गया है लेकिन शब्द दूसरे हैं और प्रस्तुति ऐसी है जो बता रही है कि खबर लोकसभा में पेश रिपोर्ट के आधार पर है। तमाम कारणों से आज के समय में मैं इसे पहले पन्ने की खबर नहीं मानता हूं। तीन कॉलम की तो बिल्कुल नहीं। इस खबर के साथ दो कॉलम का शीर्षक है, स्पष्टता, पारदर्शिता तथा संस्थागत जवाबदेही का अभाव था। पूरी खबर पढ़ने और शुरू से फॉलो करते रहने के कारण मुझे लगता है कि न्यायमूर्ति वर्मा को फंसाया गया है और पैसे उनके थे, यही साबित नहीं हुआ है। जले हुए नोट नकली थे या असली यह भी कैसे साबित होगा अगर बैंक से निकालने या नकली नोट खरीदने की पुष्टि नहीं हो। मैं नहीं जानता कि मामला क्या है लेकिन जज के खिलाफ ठोस सबूत नहीं हैं – इसमें कोई दो राय नहीं हैं। यहां जज को पैसे देने या किस मामले में लिया उसका कोई उदाहरण नहीं है। फिर भी सजा हो चुकी है। दूसरी ओर भारत के मुख्य न्यायाधीश के मामले में आरोप बहुत साफ और स्पष्ट हैं लेकिन उसे संतोषजनक नहीं माना गया। यहां इस बात की संभावना है कि न्यायमूर्ति वर्मा की अनुपस्थिति में उनके किसी कर्मचारी के सहयोग से नकदी रख दी गई हो और उन्हें फंसाया गया हो। भ्रष्टाचार के तमाम मामलों में जिसके घर नकदी मिली उसे सजा नहीं हुई, जज के मामले में सजा हो चुकी है अब उन्हें बदनाम किया जा रहा है और यह पता ही नहीं है कि नकदी उन्हें किसलिए, किस मामले में मिली होगी। चढ़ावा चोरी के मामले में कहा जा रहा है कि वही बोले जिसने चंदा दिया हो। यहां ऐसा कोई मामला नहीं है। सजा होने के बाद भी बदनाम किया जा रहा है। मुझे सजा उचित और जरूरी होने पर भी शक है। जबकि चंदा चोरी तो हुई है और जिसकी जिम्मेदारी थी उसपर कोई आरोप नहीं है। यहां आउट हाउस की जिम्मेदारी के लिए ही सजा हो गई, जज को। यह विचित्र मामला है जो खबरों में नहीं दिख रहा है।
नवोदय टाइम्स में यह खबर दो कॉलम में है। शीर्षक है, नकदी मिलने के मामले में जस्टिस वर्मा को दोषी माना। उपशीर्षक है, संसदीय जांच समिति ने कहा, आरोप साबित हुए वह संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाए। दैनिक भास्कर में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। आइए, मैं बताऊं कि यह खबर पहले पन्ने के लायक क्यों नहीं है। या बड़ी खबर क्यों नहीं है। संसदीय समिति की रिपोर्ट है इसलिए खबर जरूर है लेकिन इसमें जो कहा गया है वह भी संतोषजनक नहीं है। आरोप ही संतोषजनक नहीं है। ध्यान दीजिए कि पैसा आउट हाउस में खुले में रखा था जहां परिवार के बाहर के लोगों की भी पहुंच थी। अगर ऐसा नहीं था तो ऐसी कोई खबर नहीं छपी है। ऐसी जगह पर कोई भी नकदी रखेगा तो खुले में क्यों रखेगा। छिपा कर रखेगा, ज्यादा होगी तो एक अलमारी क्यों नहीं मंगा लेगा। आजकल फायर प्रूफ, वाटर प्रूफ अलमारी मिलती है और पैसों की कमी न हो, पैसे ही रखने हों, आउट हाउस में छिपाना हो तो यह सब किया जाना चाहिए था। पर ऐसी कोई खबर नहीं है। खबर यह भी है कि इस्तीफे के बाद महाभियोग का औचित्य नहीं है। मुझे लगता है कि जस्टिस वर्मा को रास्ते से हटाया गया है और यह जज लोया की तरह भी हो सकता है। वह पुराना तरीका था यह नया है। अगर जज लोया की मौत के मामले में साथी जजों की बात मानी गई तो यहां जज साहब की बात क्यों नहीं मानी गई? अगर मुख्य न्यायाधीश के मामले में दोषी न होने की बात मान ली गई होगी या उनपर आरोप लगाने वाले की बात नहीं मानी गई। इस मामले में आरोपों को मान लिया गया लगता है और उसके समर्थन में कोई तर्क नहीं है। मीडिया का काम है कि जस्टिस वर्मा के फैसलों, आदेशों और जो मामले उन्होंने देखे हैं उनके आधार पर बताता कि आरोपों में कितना दम है। लेकिन मीडिया ने वह भी नहीं किया है। मीडिया भी उन्हें भ्रष्ट नहीं साबित कर पाया है लेकिन तमाम रिपोर्ट को प्रमुखता से छाप रहा है।
दैनिक भास्कर में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं होने का कारण तो होगा उसे बाकी ने क्यों नहीं माना। अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ और दि एशियन एज में यह पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर है। दि एशियन एज का पूरा पहला पन्ना बगैर विज्ञापन का है फिर भी यह खबर पेज तीन पर है। पहले पन्ने पर इसकी सूचना भर है। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर तीन कॉलम में है जबकि हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू में यह दो कॉलम में है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह हो सकता है, पैनल के अनुसार, जली नकदी पर न्यायमूर्ति वर्मा का जवाब ‘गलत’ है, ‘गंभीर शंका’ बढ़ गई है। द हिन्दू की खबर का शीर्षक है, पैनल ने कहा, न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोप ‘साबित’। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे लोकसभा पैनल के हवाले से छापा है और प्रूव्ड यानी साबित को भी कोट नहीं किया है। पहले पन्ने पर दो कॉलम की खबर है। मुझे लगता है कि इस मामले में पक्षपात हुआ है, न्यायमूर्ति वर्मा को दोषी साबित करने का दबाव होगा या दो मामलों में एक जैसी कार्रवाई नहीं हुई है और यह डर के माहौल में हो ही नहीं सकता है। (जारी)
अगली किस्त पढ़ें : आज के अखबार (दो) : न्यायमूर्ति वर्मा पर लगे आरोपों के मुकाबले मुख्य न्यायाधीश पर आरोप AI से सवाल-जवाब
यह रहा लिंक : https://www.bhadas4media.com/nyayamurti-verma-ke-khilaaf-aaropon-ke-mukable-cji-par-aarop/
प्रस्तुतकर्ता संजय कुमार सिंह से [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।


