भारत में पत्रकारिता कभी सच की आवाज मानी जाती थी। आज वह एक प्रोडक्ट बन चुकी है, जिसे मात्र 1799 रुपये में खरीदा जा सकता है। फेसबुक पर चल रहे विज्ञापन में “Indian Press Union” नाम का संगठन साफ-साफ लिख रहा है — “No exam. No qualification. Simple registration — instant identity.” यानी न कोई परीक्षा, न कोई योग्यता, न कोई अनुभव। सिर्फ पैसे जमा करो और ‘मीडिया रिप्रेजेंटेटिव कार्ड’ लेकर पत्रकार बन जाओ।यह विज्ञापन न सिर्फ भ्रामक है, बल्कि भारतीय पत्रकारिता के मूल्यों का खुला मजाक है।
क्या कहता है यह संगठन?

संगठन की अपनी वेबसाइट (indianpressunion.com) पर साफ लिखा है कि: यह कोई सरकारी संस्था नहीं है। यह भारत सरकार या किसी मंत्रालय की ओर से प्रेस एक्रेडिटेशन नहीं देता। इसका कार्ड सिर्फ ‘ऑर्गनाइजेशनल मेंबरशिप’ है।
फिर भी विज्ञापन में बड़े-बड़े अक्षरों में “Official IPU ID Card”, “Registered with MCA, Govt. of India” और “Become a Journalist Now” जैसे वाक्य इस्तेमाल किए जा रहे हैं। आम व्यक्ति आसानी से समझ जाता है कि यह कोई सरकारी मान्यता वाला कार्ड है। यह जानबूझकर की गई भ्रामक मार्केटिंग है।
पत्रकारिता का नाश कैसे हो रहा है?
योग्यता का मजाक – असली पत्रकार सालों तक रिपोर्टिंग करते हैं, संपादकीय मानकों का पालन करते हैं और जवाबदेही रखते हैं। यहां सिर्फ पैसे देकर कोई भी ‘पत्रकार’ बन सकता है। इससे पेशे की साख खत्म हो रही है।
फर्जी पहचान का बाजार – ऐसे कार्ड धारक कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस, अस्पताल, कोर्ट या संवेदनशील जगहों पर घुसने की कोशिश करते हैं। कई मामलों में ऐसे कार्ड का इस्तेमाल धमकी, ब्लैकमेल या अवैध गतिविधियों के लिए भी होता रहा है।
असली पत्रकारों पर असर – जब हर कोने में ‘प्रेस’ लिखा कार्ड घूमने लगेगा, तो अधिकारी और आम लोग असली पत्रकारों पर भी शक करने लगेंगे। विश्वास का संकट गहराएगा।
व्यावसायिक मॉडल – “Limited slots”, “Apply before it closes” जैसी भाषा साफ बताती है कि यह पत्रकारिता का प्रमोशन नहीं, बल्कि एक व्यावसायिक प्रोडक्ट बेचने का तरीका है।
कानूनी और नैतिक सवाल
भारत में प्रेस कार्ड की असली वैधता प्रेस रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (PRGI) या राज्य सरकारों द्वारा मान्यता प्राप्त संगठनों/अखबारों से जुड़ी होती है। कोई भी प्राइवेट सेक्शन-8 कंपनी पैसे लेकर ‘आधिकारिक पत्रकार’ का दर्जा नहीं दे सकती। फिर भी ऐसे संगठन फल-फूल रहे हैं क्योंकि लोग आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। नियामक एजेंसियां अभी तक सख्त कार्रवाई नहीं कर पाई हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे विज्ञापन बेरोकटोक चल रहे हैं।
Indian Press Union जैसी संस्थाएं पत्रकारिता को मजबूत नहीं कर रहीं, बल्कि उसे सस्ता और खोखला बना रही हैं। जब ‘पत्रकार’ बनने के लिए डिग्री, अनुभव या नैतिक मानदंड की जरूरत ही न रह जाए, तो पत्रकारिता का भविष्य खतरे में पड़ जाता है। सवाल यह है कि क्या हम पत्रकारिता को एक पेशे के रूप में बचाना चाहते हैं, या इसे 1799 रुपये का प्रोडक्ट बनाकर छोड़ देंगे?


