इन्द्रजीत राय देश के पहले फारेन्सिक जर्नलिस्ट हैं। वर्ल्ड बुक आफ रिकार्ड के अवार्डी हैं। ज़ी न्यूज़, न्यूज़ 18, एबीपी न्यूज़ सहित कई न्यूज़ चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। इस वक़्त वे देश की पहली प्राइवेट और एनएबीएल से मान्यता प्राप्त फारेन्सिक लैबोरेट्री के सीईओ हैं।
इन्द्रजीत बताते हैं कि पत्रकारिता का पहला धर्म सच की तलाश है, लेकिन जब किसी पत्रकार के सामने कोई आरोप, दस्तावेज़, तस्वीर या वीडियो आए, तो वह यह कैसे तय करे कि वह सच है या महज़ एक गढ़ी हुई कहानी? लंबे समय तक पत्रकारिता में इस सवाल का जवाब मुख्यतः स्रोतों, दस्तावेज़ों और मानवीय विवेक के भरोसे तलाशा जाता रहा। फॉरेंसिक साइंस को पत्रकारिता से जोड़ने का विचार इसी कमी को दूर करने की कोशिश से पैदा हुआ।
आख़िर फॉरेंसिक साइंस में डबल पोस्टग्रेजुएशन और पीएचडी की डिग्री के बाद जर्नलिज़्म में कैसे आए? इसके जवाब में इन्द्रजीत बताते हैं कि फॉरेंसिक जर्नलिज़्म की शुरुआत का मूल विचार यही था कि पत्रकारिता में वैज्ञानिक सत्यापन की एक अतिरिक्त परत जोड़ी जाए। फॉरेंसिक साइंस को सच और झूठ की वैज्ञानिक पड़ताल का माध्यम मानते हुए इस दृष्टि को पत्रकारिता में इस्तेमाल करने की कोशिश की गई—ताकि किसी आरोप, दस्तावेज़, तस्वीर या डिजिटल सामग्री को केवल दावे के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से भी परखा जा सके।
यह सफ़र ज़ी न्यूज़ में एक रिपोर्टर के रूप में शुरुआत से लेकर खोजी पत्रकारिता, क्राइम रिपोर्टिंग, फॉरेंसिक साइंस, क्रिमिनोलॉजी और साइकोलॉजी की पढ़ाई, अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण और बाद में फॉरेंसिक लैब की स्थापना तक जाता है। पत्रकारिता के साथ लगातार शिक्षा जारी रखने, विशेषज्ञता को रिपोर्टिंग का आधार बनाने और अपराध की जाँच में विज्ञान की भूमिका को समझने की यह कहानी इस इंटरव्यू को केवल एक व्यक्तिगत करियर-कथा नहीं रहने देती।
बातचीत में क्राइम सीन के संरक्षण, Locard’s Exchange Theory, डिजिटल फॉरेंसिक्स, AI और डीपफेक, मीडिया की गिरती विश्वसनीयता, specialized journalism, private forensic laboratories, NABL accreditation, अदालतों में forensic reports की भूमिका, BNS के बाद फॉरेंसिक जाँच की चुनौतियों और युवाओं के लिए पढ़ाई तथा विशेषज्ञता की जरूरत जैसे मुद्दे सामने आते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बातचीत में पत्रकारिता और फॉरेंसिक साइंस को दो अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में नहीं, बल्कि सत्य तक पहुँचने के दो जुड़े हुए माध्यमों के रूप में देखने की कोशिश दिखाई देती है।

शिवा : भारत के सबसे पहले फॉरेंसिक जर्नलिस्ट बनने का विचार कैसे आया और इस सफर की शुरुआत कैसे हुई आपकी?
इंद्रजीत : देखिए, पहले भी जर्नलिज्म में वेरिफिकेशन या साइंटिफिक अप्रोच नहीं थी। और जर्नलिज्म सबसे इम्पॉर्टेंट प्रोफेशन है। यहाँ पर आप किसी की साख और उसकी सबसे इम्पॉर्टेंट चीज़, यानी इज़्ज़त पर एक्ट और रिएक्ट करते हो। लेकिन ऐसा कोई मीडियम आज भी नहीं है कि आप किसी चीज़ को साइंटिफिकली वेरिफाई करो, साइंटिफिकली उसको समझो। हम सिर्फ़ आरोप पर एक्ट करते हैं। यही आइडिया था कि इसमें कुछ इनोवेशन किया जाए। इसी सोच के साथ मैंने फॉरेंसिक जर्नलिज्म की शुरुआत की। मेरा उद्देश्य था कि जर्नलिज्म में साइंस को घुसाया जाए। क्योंकि फॉरेंसिक साइंस सच और झूठ का पता करने का विज्ञान है और जर्नलिज्म भी आखिरकार सच और झूठ के साथ ही डील करता है।
शिवा : लेकिन सच और झूठ तय करना तो लॉ का विषय भी है?
इंद्रजीत : नहीं, जर्नलिज्म का भी है। मान लीजिए मेरे सामने कोई आरोप आता है कि आपने भ्रष्टाचार किया है। अब हो सकता है आरोप लगाने वाले की आपसे दुश्मनी हो, कोई निजी विवाद हो। लेकिन मेरे पास यह जानने का कोई माध्यम नहीं है कि आरोप सही है या गलत। आपने चार बजे कुछ कागज़ दे दिए। हो सकता है वो पेपर भी फेक हों। और कई बार होते भी हैं।
मेरे पूरे जर्नलिज्म करियर में लोग ऐसे-ऐसे कागज़ लेकर आते थे, जो मैनिपुलेटेड होते थे। लेकिन एक बेचारे जर्नलिस्ट के पास कोई साधन ही नहीं होता कि वह सही और गलत को प्रूव कर सके या समझ सके। तब मुझे लगा कि फॉरेंसिक एक ऐसा लेंस है, जो हमें वो दिखा सकता है, जो सामान्य तौर पर दिखाई नहीं देता। बस, उसी लेंस का मैंने 23 साल तक इस्तेमाल किया।
शिवा : लेकिन जर्नलिज्म सिर्फ़ ट्रुथ और फॉल्स तक सीमित तो नहीं है?
इंद्रजीत : बिल्कुल, जर्नलिज्म बहुत वृहद है। लेकिन प्राइमा फेसी, मेरे पास किसी आरोप को समझने के लिए कोई इंस्ट्रूमेंट तो होना चाहिए।
मान लीजिए मुझसे गलती हो गई और किसी ने आप पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। मैंने बिना सही आकलन किए वह स्टोरी चला दी। बाद में पता चला कि आप निर्दोष थे। अब मैं आपकी भरपाई कैसे करूँ? इसलिए शुरुआती स्तर पर ही मेरे पास ऐसा कोई माध्यम होना चाहिए, जिससे मैं आरोप की विश्वसनीयता जाँच सकूँ।
शिवा : तो उसमें आपका फॉरेंसिक तरीका कैसे काम करता है?
इंद्रजीत : देखिए, फॉरेंसिक में एक QD (Questioned Documents) डिवीजन होता है। मान लीजिए किसी ने हमें कोई दस्तावेज़ दिया, चाहे वह फोटोस्टेट हो या प्रिंटेड कॉपी। अगर उसमें कोई मैनिपुलेशन हुआ है, तो उसे डिटेक्ट करने की फॉरेंसिक में बहुत खूबसूरत तकनीकें हैं।
अगर किसी शब्द को बाद में जोड़ा गया है, हटाया गया है, किसी मोहर से छेड़छाड़ हुई है, मोहर बाद में लगी है, गलत लगी है या फर्जी है—इन सबका पता लगाने के लिए साइंस है, उसके प्रिंसिपल्स हैं और कई मशीनें हैं। उनकी मदद से हम यह समझ लेते हैं कि दस्तावेज़ में कोई फर्जीवाड़ा हुआ है या नहीं।
शिवा : यानी इससे जर्नलिस्ट के पास वेरिफिकेशन की एक अतिरिक्त लेयर आ जाती है?
इंद्रजीत : बिल्कुल। जर्नलिज्म खुद कहता है कि आप वेरिफाई करो। अब आप किस माध्यम से वेरिफाई करते हैं, यह जर्नलिस्ट पर निर्भर करता है। लेकिन वेरिफिकेशन तो करना ही है। और वेरिफिकेशन का मतलब यही है कि कोई चीज़ सही है या गलत।
इसलिए उसे परखने के लिए कोई इंस्ट्रूमेंट होना चाहिए। साइंस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह बायस नहीं होता। साइंस ब्लैक एंड व्हाइट होता है—या तो कोई चीज़ है या नहीं है।
इसी वजह से आप देखिए कि जस्टिस सिस्टम भी फॉरेंसिक रिपोर्ट को आसानी से खारिज नहीं करता। अगर फॉरेंसिक कह रही है कि तथ्य यही हैं, तो उसे एक ठोस वैज्ञानिक आधार माना जाता है।
शिवा : ज़ी न्यूज़ में आपकी शुरुआत कैसे हुई? पत्रकारिता में पहला मौका आपको कैसे मिला?
इंद्रजीत : ज़ी न्यूज़ से ही मेरी पहली शुरुआत हुई। मुझे सीधे रिपोर्टर के तौर पर नौकरी मिली। मैंने कभी ट्रेनी या उस तरह की कोई पोज़िशन नहीं की। ज़ी न्यूज़ ने मुझे सीधे रिपोर्टर रखा।
मैं उस समय दिल्ली आया हुआ था। सोचा कि यूपीएससी का एक अटेम्प्ट दे देते हैं। एग्जाम दिया और एग्जाम के ठीक बाद मैं फिल्म सिटी घूमने चला गया। वहीं मैंने ज़ी न्यूज़ के तत्कालीन संपादक राजीव शांथानम से मिलने की कोशिश की। वे उस समय बहुत प्रख्यात संपादक थे।
मैंने उनसे कहा, “सर, आई एम इंटरेस्टेड इन मीडिया।”
उन्होंने पूछा, “कैसे करोगे? क्या कर सकते हो?”
मैंने उनके सामने एक लाइन कही, जो आज भी मुझे याद है। मैंने कहा, “सर, ये जो भी दिखाया जा रहा है न, ये कुछ है ही नहीं। बेकार है।”
वो थोड़ा चौंक गए। बोले, “यार, तुम अजीब आदमी हो। नौकरी तुम्हें मिली नहीं और तुम कह रहे हो कि सब बेकार है।”
फिर उन्होंने पूछा, “अच्छा, तुम क्या कर सकते हो?”
उसी समय मधुमिता शुक्ला हत्याकांड की खबरें चल रही थीं। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन कैबिनेट मंत्री अमरमणि त्रिपाठी इस मामले में गिरफ्तार होकर लखनऊ जेल में थे। दोनों तरफ़ से आरोप-प्रत्यारोप चल रहे थे।
मैंने कहा, “सर, ये क्या है? ये तो बेवकूफी है।”
उन्होंने पूछा, “अरे भाई, क्या बेवकूफी है? तुम बताओ, क्या करोगे?”
मैंने कहा, “देखिए सर, स्टोरी तब बनेगी जब अमरमणि अपने मुँह से कहे कि मैंने हत्या की है। सिर्फ़ इतना ही नहीं, वो ये भी बताए कि कैसे की। तभी लोगों को सच पता चलेगा।”
उन्होंने कहा, “तुम पागल हो क्या? ऐसे कैसे हो सकता है?”
मुझे आज भी वो बातचीत बहुत अच्छी तरह याद है। मैंने उनसे कहा, “देखिए सर, कैसे होगा, ये मैं नहीं कहता। लेकिन मैं क्रिमिनोलॉजी और फॉरेंसिक साइंस का स्टूडेंट हूँ और मुझे लगता है कि स्टोरी यही होनी चाहिए।”
दरअसल, मैं उनके पूरे सिस्टम को चुनौती दे रहा था। कह रहा था कि आपके पास सच तक पहुँचने का तरीका ही नहीं है।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि शायद उस समय मैं थोड़ा ज़्यादा आक्रामक था। लेकिन उस समय मेरे अंदर अदम्य विश्वास था।
उन्होंने फिर पूछा, “अच्छा, कैसे करोगे?”
मैंने कहा, “ये मुझे नहीं पता। आपने पूछा कि इस स्टोरी में क्या होना चाहिए, तो मैंने बता दिया। उस समय टीवी पर यही स्टोरी चल रही थी। कैसे करूँगा, इसका जवाब मेरे पास नहीं था। लेकिन मुझे लगता था कि मैं कर दूँगा।”
इसके बाद उन्होंने कहा, “एक बात बताओ, तुम सीधे गार्ड के पास गए और कहा कि मुझे यहाँ के एडिटर से मिलना है?”
गार्ड ने मुझसे पूछा था, “क्यों मिलना है? क्या काम है? ऐसे तो नहीं मिल सकते।”
मैंने उससे कहा, “मैं तुम्हें क्यों बताऊँ? जिससे मिलना है, मैं उसी को बताऊँगा।”
आख़िर में उसने कहा, “ठीक है, एक पर्ची लिखकर दे दो, मैं अंदर भिजवा देता हूँ।”
मैंने पर्ची लिखी और वही मेरी ज़िंदगी की सबसे अहम मुलाकातों में से एक साबित हुई।
शिवा : लखनऊ पहुँचने के बाद इस स्टोरी को आगे बढ़ाने के लिए आपने क्या किया? और साइंस को इसमें किस तरह इन्वॉल्व किया?
इंद्रजीत : तो लखनऊ आए हम लोग और मैंने कहा, “एक काम करेंगे।” अब यहाँ देखो, साइंस इन्वॉल्व हो गई। देख भाई, हमको पता नहीं है, लेकिन साइंस इन्वॉल्व करना है। उन्होंने कहा, “हम लोग रोज़ जेल के गेट के सामने जाएँगे।”
जेल के गेट के सामने जाएँगे और जेल के गेट को देखेंगे। ब्रेन अपने आप रास्ता निकालेगा।
हम लोग रोज़ सुबह लखनऊ जेल जाते थे। लखनऊ जेल के गेट के ठीक सामने एक चाय की दुकान थी। वहाँ बैठ जाते थे। 8-8:30 बजे चले जाते थे और रात के 7-7:30 तक वहीं रहते थे, जब तक वो दुकान खुली रहती थी। हमने कहा, “देखा जाएगा”, खाली।
बाद में हमको पता चला कि वो कैमरामैन अपने बॉस से कहता था, “सर, कहाँ फँसा दिया?” वो कहते थे, “पागल आदमी। बैठो, इसको देखो।”
आफ्टर 5-7 डेज़, वी गेट द सॉल्यूशन। हाउ टू गेट इंटू द जेल, व्हाट कवर शुड बी टेकन, एंड देयर इज़ अ वन वे, ओनली वन वे, टू कंडक्ट अ स्टिंग ऑपरेशन इनसाइड द जेल प्रिमाइसेज़, ऑन अमरमणि त्रिपाठी।
शिवा : और जेल के अंदर जाने का तरीका कैसे निकाला?
इंद्रजीत : समझ में आ गया कि जेल में कैसे जाना है। जेल के अंदर किया था। उस ऑपरेशन का नाम था “ऑपरेशन मनी”। ज़ी न्यूज़ ने इसको प्रसारित किया था। ये लगभग 5-6 घंटे की प्रोग्रामिंग थी और उस दिन टीवी पर इसके अलावा कुछ चला नहीं था।
हमें ये समझ में आया कि देखो, जेल में तो जाने का एक ही तरीका है कि किसी तरह उसमें बंद हो जाओ। किसी सेल में बंद हो जाओ। कोई छोटा-मोटा जुर्म कर दो, बंद हो जाओ।
फिर कैमरामैन को भी कॉन्फिडेंस में लेना था, क्योंकि उसका भी एक जीवन है। हमने कहा कि देख यार, हम लोग पढ़े-लिखे थे ही। हमने कहा कि 151 एक सेक्शन है। लड़ाई-झगड़ा कर लो। क्या कर देगा? लड़ाई-झगड़ा करेगा और वो अपने आप डिसॉल्व हो जाता है।
अगर पुलिस रिक्वेस्ट कर दे कि ये बड़े खच्चर हैं, वैसे तो कोर्ट से ही मतलब बेल हो जाती है। अगर पुलिस कह दे कि इनको अंदर भेजिए, ये सब ठीक नहीं हैं, बड़े बदमाश हैं, तो अंदर आ जाएँगे।
अब ये सारा करने के लिए एक पुलिस का कॉन्टैक्ट चाहिए था, जो आराम से बंद कर दे, मारे-वारें न।
एक ऑफिसर थे, उनका भी नाम नहीं लूँगा। उनसे कहा। उन्होंने कहा, “यार, तुम ये क्या कर रहे हो? मत करो, मत करो। वो क्रिमिनल आदमी है, क्रिमिनल मंत्री है। मत करो।”
हमने कहा, “देखो, दोस्त ही थे वो।” यूनिवर्सिटी में हमारे सीनियर भी थे। उन्होंने हम लोगों को बहुत गाइड किया था। हम लोग यूनिवर्सिटी में अपने किसी भी सीनियर को “सर” बोलते थे। हमने कहा, “सर, ज्ञान मत दो। ये करना है, बताओ, करोगे?”
जब उन्होंने देखा कि मैं डिटरमिन हूँ, तो उन्होंने कहा, “ठीक है। मैं 5 बजे ऑफिस से अपनी…” उन्होंने कहा, “मैं अपने ऑफिस से गाड़ी से निकलूँगा, तो तुम लोग आपस में झगड़ा कर लेना, मेरे निकलते ही। और मैं बोलूँगा, ‘बंद करो सालों को।’”
तो इस प्रकार हम जेल पहुँचे।
शिवा : यानी आपने उस पुलिस अधिकारी को कॉन्फिडेंस में लिया, लेकिन उन्हें यह नहीं बताया कि जेल के अंदर जाकर असल में करना क्या है?
इंद्रजीत : हाँ, लेकिन उनको ये नहीं बताया कि हमें अंदर करना क्या है। वो बार-बार पूछते थे, “करोगे क्या?” हमने कहा, “ये आम खाओ, कुछ भी मत करना।” ये नहीं बताया था। उन्होंने बोला कि चलो ठीक है, यही उनको करना है।
जब वो निकले, तो हम लोगों ने झगड़ा किया। मैं और कैमरामैन। कैमरामैन वाज़ एक्चुअली वेरी गुड। आफ्टर 7-8 डेज़, ही न्यू दैट आई एम नॉट द रॉन्ग पर्सन। जब भी किसी आदमी को ये बिलीव हो जाता है, तो वो आपके साथ, आपके पेज पर आ जाता है।
मैंने कहा कि जिंदगी में पता नहीं कब मौका आए किसी को न्याय दिलाने का, या किसी को वो करने का। मौका है, लगाते हैं चौका। तुम लोग शायद कुछ इतिहास बना दो।
शिवा : जेल के अंदर रहने के दौरान आपने अमरमणि त्रिपाठी से बातचीत कैसे शुरू की और उनसे क्या-क्या पता चला? आपकी नज़र में वह जुर्म था या मर्डर था?
इंद्रजीत : उससे पूछना शुरू किया। उसने अपनी वाहवाही में सब बताया, सब बताना शुरू किया।
शिवा : बातचीत किस तरह शुरू हुई? तब तक आप दोनों के बीच कंफर्ट लेवल भी बन गया था?
इंद्रजीत : हाँ। करीब 10वाँ-11वाँ दिन था। तब तक तो हम कंफर्टेबल हो गए थे। उसको भी कंफर्टेबल करा लिया था। फिर मस्ती-मज़ाक में जो भी है, बात शुरू हुई और उसने बोल दिया।
उसने सबको ही बोला था कि मैंने मरवाया। जो शूटर था, उसको भी कहा था। उसने कहा कि मैंने मरवा दिया। उसने सब बताया।
शिवा : सिर्फ़ हत्या की स्वीकारोक्ति से बात खत्म नहीं हुई। इसके बाद आपने क्या किया?
इंद्रजीत : हमने कहा, इतने से और मज़ा नहीं आ रहा। इसका पूरा दरबार दिखाते हैं।
उसने जेल को मज़ाक समझ रखा था। टीवी लगा रखा है, सोफा लगा रखा है। मिलने वाले खुले आ रहे हैं। खाना बनाया जा रहा है। उसकी अपनी रसोई सजी हुई है। सब दिखाते हैं। सब रिकॉर्ड किया।
अगले तीन दिन तक रिकॉर्ड किया। हर दिन 33 मिनट रिकॉर्ड किया। पूरा रिकॉर्ड किया।
शिवा : रिकॉर्डिंग को जेल से बाहर कैसे निकाला?
इंद्रजीत : रिकॉर्ड करने के बाद हमने कहा कि अंदर रहते ही ये डिवाइस बाहर भिजवा देते हैं, ताकि वो सेफ रहे। लेकिन डिवाइस बाहर नहीं जा पाई।
शिवा : फिर आपने क्या किया?
इंद्रजीत : उस समय मेमोरी चिप नहीं होती थी। कैसेट होते थे। हमने कैसेट निकाला और कैसेट अपने पास रख लिया।
जेल में बागवानी होती थी। तो एक दिन बागवानी में ड्यूटी लगवाई। बागवानी करते समय खोदकर कैमरा उसी में गाड़ दिया।
शिवा : यानी जो चीज़ बाहर नहीं ले जा सकते थे, उसे वहीं डिस्ट्रॉय कर दिया?
इंद्रजीत : हाँ। हमने कहा, जो चीज़ लेकर नहीं जा सकते, उसको खत्म करो। तो कैमरा वगैरह वहीं छोड़ दिया। कैसेट हमारे पास था।
कैमरे को एक साथ पूरा नहीं छोड़ा। तार तोड़े, कैमरा कूंच दिया। थोड़ा पार्ट एक गमले में, थोड़ा कुछ और जगह। ऐसा नहीं था कि पूरा कैमरा लेकर गए और सजा के गाड़ दिया।
शिवा : इस तरह की पूरी योजना बनाना और उसे अंजाम देना—क्या आपको लगता है कि इसके लिए एक अलग तरह की सोच चाहिए?
इंद्रजीत : टॉप लेवल के क्रिमिनल के लिए अलग तरह की सोच होती है। क्रिमिनल का—क्राइम करने वाले इंसान का—अलग कैरेक्टरिस्टिक होता है। वो हम लोगों ने पढ़ा है।
बचपन में ही डिटेक्ट किया जा सकता है कि इस आदमी को रोक दीजिए, नहीं तो ये क्रिमिनल बन जाएगा।
शिवा : यानी क्रिमिनल बिहेवियर को समझने के लिए बाकायदा कुछ अलग तरह की समझ और ट्रेनिंग चाहिए?
इंद्रजीत : हाँ। जिसने पढ़ा है, उसको ही पता चलता है।
खैर, वो सब कर-कर के हम रिलीज़ हुए और वहीं से सीधे लखनऊ एयरपोर्ट गए। हम लोग फ्लाइट पकड़कर दिल्ली आए।
एडिटर साहब फिर सामने बैठे। बोले, “क्या?”
हमने कहा, “टेप देखिए।”
उन्होंने पूछा, “क्या है?”
मैंने कहा, “सब बताया उसने।”
चौंककर बोले, “क्या बात कर रहे हो?”
उन्हें सब बताया!
फिर टेप देखा तो उनकी भी हालत खराब हो गई।
….जारी….


