अभिषेक श्रीवास्तव-
प्रेस क्लब: यह अनर्थ भी अभी ही होना बदा था!
लंबे समय से प्रेस क्लब नियमित जाना छोड़ दिया है मैंने। किसी सुबह ऑमलेट की तलब होती है तो चला जाता हूं, इसलिए वहां की खबरें अब अपने यहां नहीं पहुंचती हैं। अचानक मित्र आवेश ने शाम फोन कर के बताया कि आज ऊपर वाले हॉल में फलाने की चालीसा पढ़ी गई और उनकी पूजा की गई, तो पहली प्रतिक्रिया यही निकली मन से: ये तो होना ही था! फिर अगली पंक्ति सहसा उमड़ी: यह अनर्थ भी अभी ही होना बदा था!

रहे रहे यह क्लब विवाद के निशाने पर आता रहा है बीते दस साल से। एक बार तो मुझे ही निशाना बना कर भाई लोगों ने रगड़ दिया था जब क्लब में मनोज तिवारी को बसंत बहार मनाने बुलाया गया था। उस समय मैं कमेटी का निर्वाचित सदस्य था, तो जाहिर है बाहर जवाब देने का कोई अर्थ नहीं बनता था, लेकिन भीतर रह कर उस आयोजन सहित अन्य विकृतियों को लेकर मैंने जितने सवाल उठाये उतने किसी ने नहीं उठाए होंगे, यह गारंटी है। साल भर में मेरे उठाए किसी भी सवाल या आपत्ति का कोई औपचारिक जवाब नहीं दिया गया, उलटे लठैती जरूर हुई, एक बार आधी रात गाली भी पड़ी।
बहुत से लोग हर बार चौंक जाते हैं ऐसे विवादों पर, जो नहीं जानते कि 2011 से क्लब में एक ही पार्टी का निजाम चल रहा है। चुनाव होते हैं नियमित, लेकिन जीतने वाले लोग वही होते हैं- अगम, अगोचर, मायावी, ब्राह्मण सभा के प्रतिनिधि। मैं भी उनके झांसे में आ गया था एक बार, लड़ गया, जीत गया, और खेत रहा। अधिकतर ‘दिमागी नक्सली’ इस सत्ताधारी पैनल के साथ ही रहते हैं क्योंकि यह पैनल एक ही तर्क के सहारे पंद्रह साल से बना हुआ है सत्ता में- संघ और भाजपाइयों के कब्जे का डर दिखाकर! वाजिब भी है, लेकिन यही पेंच भी है- हर बार सदस्यों को चुनाव के समय संघ का डर दिखाया जाता है और हर बार कोई संघप्रेमी ही इनको डेंट कर जाता है!
जिसने भी आज के प्रोग्राम के लिए हॉल बुक करवाया होगा, क्या उसकी खबर कमेटी को नहीं रही होगी? हर शाम तो एक सिपाही बुकिंग की सूचना लेने के लिए हाजिरी देता है। सब जानते हैं अगले दिन क्या प्रोग्राम होने वाला है। फिर ऐसी गफलत? यह इत्तेफाक नहीं है, डिजाइन है। आपको विश्वास न हो तो प्रशांत टंडन और अनिल चमड़िया से पूछिए, वो लोग हमारे सीनियर हैं और हर बार आखिरी मौके पर तलवार लेकर निकलते हैं चुनाव में, लेकिन नैरेटिव और संख्याबल के आगे खेत रहते हैं। यही वह कथित वाम प्रबंधन है जिसने अपने वरिष्ठ सदस्य रहे मरहूम प्रोफेसर अली जावेद को अंदर भिजवाया, जब तत्कालीन अध्यक्ष राहुल जलाली ने उनसे पल्ला झाड़ लिया था। यही वह क्लब प्रबंधन है जिसने विश्वदीपक के पीछे महाराष्ट्र पुलिस छोड़ दी थी। यही वह प्रबंधन है जिसने एनडीटीवी पर हमले के खिलाफ हुई सभा को न्यूट्रलाइज करने के लिए राय साहब और उनके लोगों को मंच दिया था। यही वह कमेटी है जिसने हर बार खुद को समावेशी दिखाने के लिए एकाध मुसलमान, एक पूर्वोत्तर के पत्रकार को और एकाध सॉफ्ट संघियों को अपने पैनल में शामिल किया, लेकिन कमान उन्हीं अदृश्य लोगों के हाथों में हमेशा रही जिन्होंने राहुल जलाली से लेकर गौतम लाहिड़ी को पदाधिकारी बनवाया। वही गौतम लाहिड़ी, जिन्होंने एक मीटिंग में सबके सामने कहा था- मैं प्रेस क्लब का मोदी हूं! उन्हीं के राज में यशवंत सिंह, अभिषेक उपाध्याय, निर्निमेष जी और अनिल जी को बाहर निकाला गया था क्योंकि ये लोग सवाल उठाते थे। और भी कई नाम हैं इनके शिकार।
इसलिए मोदी चालीसा वाले प्रकरण में किसी पदाधिकारी की कोई व्यक्तिगत गलती नहीं है। किसी का दोष नहीं। मौजूदा अध्यक्ष संगीता जी और मौजूदा महासचिव बड़े भाई अफ़ज़ल जी तो 2011 में शुरू हुई राजनीतिक डिजाइन का केवल विस्तार हैं, टूल हैं। आप देखिए कि पहली महिला अध्यक्ष और मुस्लिम महासचिव के निजाम में ही मोदी पूजा होनी थी यहां! यह संयोग नहीं, लंबे समय से चले आ रहे प्रयोगों का एक निर्णायक दुर्योग है।
इतना लिखना नहीं था। जानता हूं अगले दिन क्लब जाऊंगा तो कोई न कोई फिर से गरियाएगा ये सब करने के लिए, लेकिन क्या करें! आदमी जिसे चाहता है उसी को रगड़ता भी है। आखिर, यह क्लब अपना जो है।
वीडियो के कुछ लिंक-
https://x.com/firozakpathan/status/2090438709489582209?s=46
https://x.com/nijisachiv/status/2090463619469234527?s=46
https://x.com/mukeshbudharwi/status/2090358796501876965?s=46


