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भारतीय शेयर बाज़ार को लेकर लगातार नेगेटिव ख़बरें आ रही हैं, आगे क्या होगा, निवेशक परेशान!

NDTV news banner with the headline 'India Replaces Indonesia As Asia's Least-Preferred Stock Market In Survey' and a photo of a modern building.

शीतल पी सिंह-

Bank of America की अगस्त 2026 की Fund Manager Survey भारत के शेयर बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी लेकर आई है। सर्वे के मुताबिक भारत इंडोनेशिया से भी पीछे रहकर एशिया में वैश्विक फंड मैनेजरों का सबसे कम पसंद किया जाने वाला शेयर बाजार बन चुका है। करीब 32% fund managers भारत पर net underweight हैं, जबकि इंडोनेशिया के लिए यह आंकड़ा 27% रह गया है। यानी ये निवेशक अपने benchmark की तुलना में भारतीय शेयरों में कम पैसा रखना चाहते हैं। (The Times of India⁠)

यह कोई छोटे निवेशकों की online opinion poll नहीं है। BofA के सर्वे में 7 से 13 अगस्त के बीच 98 fund managers/panellists ने हिस्सा लिया, जो मिलकर करीब $272 billion की assets manage करते हैं। इसलिए इसे भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई अंतिम फैसला तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थागत निवेशकों की बदलती धारणा का महत्वपूर्ण संकेत जरूर माना जाना चाहिए।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि विदेशी निवेशकों की भारत से नाराजगी का पहला कारण कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि AI और semiconductor boom में भारतीय शेयर बाजार की बेहद कमजोर हिस्सेदारी है। इस समय दुनिया का बड़ा investment theme Artificial Intelligence, chips, advanced electronics और hardware है। Taiwan और South Korea जैसे बाजार इसका सीधा फायदा उठा रहे हैं। इसके विपरीत भारत का बड़ा listed corporate sector banks, finance, conventional IT services, consumer companies, energy आदि पर अधिक निर्भर है। BofA survey में Taiwan सबसे पसंदीदा बाजारों में है, जबकि भारत नीचे पहुंच गया है। (look news india⁠)

लेकिन केवल AI से पूरी कहानी नहीं समझी जा सकती। Fund managers ने growth को लेकर चिंता, reforms की रफ्तार और महंगे valuations को भी भारत के प्रति bearish होने के कारणों में गिना है। भारत वर्षों तक दूसरे emerging markets के मुकाबले premium valuation पर ट्रेड करता रहा, क्योंकि निवेशक मानते थे कि तेज आर्थिक विकास अंततः तेज corporate earnings growth में बदलेगा। जब इस अपेक्षा और वास्तविक earnings के बीच दूरी बढ़ती है, तो वही premium valuation कमजोरी बन जाती है। (India IPO⁠)

इसके पीछे एक और गंभीर आंकड़ा है। Reuters के मुताबिक अक्टूबर 2024 से जून 2026 के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय equities से $50 billion से अधिक निकाल लिए। भारतीय शेयरों में foreign ownership अब लगभग 17 साल के निचले स्तर पर है और MSCI Emerging Markets Index में भारत का weight भी 12% से नीचे आ चुका है। (Reuters⁠)

2026 विशेष रूप से कठिन रहा है। जनवरी-जुलाई के बीच FPIs भारतीय equities से करीब ₹2.54 लाख करोड़ net निकाल चुके थे। मार्च में लगभग ₹1.18 लाख करोड़, अप्रैल में ₹60,847 करोड़, मई में ₹32,963 करोड़ और जून में ₹49,340 करोड़ की निकासी हुई। जुलाई में जरूर तस्वीर बदली और FPIs लगभग ₹20,200 करोड़ के net buyers बने। अगस्त के पहले हिस्से में भी करीब ₹16,621 करोड़ की खरीद की खबर आई। इसलिए यह कहना गलत होगा कि विदेशी निवेशक लगातार भारत छोड़ ही रहे हैं; हाल में कुछ वापसी भी हुई है। (India Gazette⁠)

शेयर बाजार के प्रदर्शन में भी कमजोरी साफ दिखाई देती है। 19 अगस्त तक Nifty 50 साल की शुरुआत से करीब 7.9% और Sensex करीब 9.8% नीचे थे, जबकि Taiwan और South Korea जैसे Asian markets ने कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। यानी BofA survey केवल perception नहीं है; इसके पीछे relative market performance का भी आधार है। (Reuters⁠)

लेकिन इसी दौरान भारतीय corporate earnings में हाल में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। जून 2026 quarter में Nifty 50 कंपनियों का औसत profit growth करीब 18% रहा—10 quarters में सबसे तेज। 19 sectors ने expectations को beat किया और earnings upgrades की स्थिति भी सुधरी। यही कारण है कि कुछ market analysts correction के बाद valuations और risk-reward को फिर आकर्षक मान रहे हैं। (Reuters⁠)

और शायद सबसे महत्वपूर्ण यह है कि विदेशी निवेशकों की इतनी बड़ी selling के बावजूद बाजार उस अनुपात में नहीं टूटा क्योंकि mutual funds, SIPs, insurance funds और घरेलू institutional investors लगातार पैसा लगा रहे हैं। मई 2026 में अकेले DIIs ने equities में करीब ₹82,880 करोड़ की net buying की थी। Reuters के अनुसार पिछले करीब 18 महीनों में लगभग $48 billion विदेशी पैसा निकलने के बावजूद घरेलू निवेशकों ने बाजार को काफी हद तक संभाले रखा। (Securities and Exchange Board of India⁠)

इसलिए “India is Asia’s least-preferred stock market” को “भारतीय अर्थव्यवस्था खत्म हो रही है” समझना उतना ही गलत होगा जितना इसे पूरी तरह महत्वहीन बता देना। यह relative preference है—global fund managers के पास Taiwan, Korea, Japan, China, Indonesia और भारत में से पैसा लगाने के विकल्प हैं और फिलहाल उन्हें भारत का risk-return equation कम आकर्षक लग रहा है।

लेकिन राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से यह खबर महत्वपूर्ण जरूर है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के बारे में सबसे बड़ा narrative था—fastest-growing major economy, China+1, manufacturing destination, global capital magnet और दुनिया का अगला बड़ा investment story। यदि उसी समय विदेशी equity ownership 17 साल के निचले स्तर पर पहुंच जाए, दसियों अरब डॉलर विदेशी पूंजी निकल जाए और institutional fund managers भारत को क्षेत्र का least-preferred market बताने लगें, तो सरकार और नीति-निर्माताओं को इसे केवल “market sentiment” कहकर खारिज नहीं करना चाहिए।

असल सवाल यह है कि क्या भारत की ऊंची GDP growth को corporate earnings, manufacturing competitiveness, technological leadership, exports और पर्याप्त private investment में तेजी से बदला जा सकता है? AI और semiconductor revolution में केवल घोषणाएं या subsidies पर्याप्त नहीं होंगी; ऐसी globally competitive कंपनियां भी चाहिए जिनमें दुनिया का institutional capital निवेश करना चाहे।

फिलहाल एक दिलचस्प विरोधाभास सामने है—विदेशी संस्थागत निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है, लेकिन भारतीय घरेलू निवेशक अपने बाजार पर पहले से कहीं ज्यादा भरोसा दिखा रहे हैं। आने वाले महीनों में यही मुकाबला तय करेगा कि BofA का यह survey एक अस्थायी bearish phase साबित होता है या भारत के प्रति global capital की सोच में किसी ज्यादा गहरे बदलाव की शुरुआत।

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