आज की खबरों में, ” चीनी की महंगाई का एथनॉल उत्पादन से संबंध नहीं, पर्याप्त भंडार” जैसी सरकारी खबर है तो इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, उत्पादन कम हुआ है और स्टॉक नौ साल में सबसे कम है। अर्थव्यवस्था का अंदाजा एक्सप्रेस की दूसरी खबर से लगता है। इसके अनुसार, एफएंडओ * के ज्यादातर खुदरा विक्रेता साल में पांच लाख रुपए से कम कमाते हैं और 30 साल से अंदर हैं। सरकार का हिन्दू-मुसलमान और घुसपैठ जारी है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, “बांग्लादेश से आए हिन्दू, सिख को छह माह में नागरिकता : शाह”। द हिन्दू में एक खबर चंपत राय की भी है। उन्होंने कहा है, राम मंदिर निर्माण में मुख्य अधिकारी नृपेन्द्र मिश्र थे। नौ पेज की यह चिट्ठी चर्चा में है लेकिन पहले पन्ने लायक खबर सिर्फ द हिन्दू को लगी।
संजय कुमार सिंह
आज द टेलीग्राफ ने देश भर में चल रहे आंदोलनों की खबर को एक साथ छापा है। बैनर शीर्षक है, “जादवपुर से दिल्ली तक, विरोध बढ़ रहा है”। अखबार ने इसका कारण भी बताया है जो आरएसएस ने कहा है, आंदोलन सिस्टम की नाकामी उजागर कर रहे हैं। जाहिर है यह बहुत बड़ी बात है और बड़ी खबर होनी चाहिए थी लेकिन प्रचारकों, ट्रोल सेना और हेडलाइन मैनेजमेंट के जमाने में ऐसी कोई खबर मेरे किसी और अखबार में नहीं है। राहुल गांधी की खबर यहां मुख्य शीर्षक के साथ है। इस खबर का शीर्षक है, राहुल के सात घंटे के धरने ने पेलेट एफआईआर के लिए मजबूर किया। कॉक्रोच जनता पार्टी पर हमला भी इन खबरों के साथ हैं। सोशल मीडिया पर सरकार समर्थक सीजेपी से परेशान नजर आ रहे हैं और तरह-तरह के बेसिर-पैर के सवाल दाग रहे हैं।
इनमें एक सवाल है, सीजेपी को यह अधिकार किसने दिया? मुझे लगता है, जवाब ‘संविधान ने’ है और होना चाहिए और सबको पता होना चाहिए। आज यह सवाल तो अखबारों में नहीं दिखा लेकिन द टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में ही सीजेपी टीम की कार की फोटो छापी है जिसका शीशा तोड़ दिया गया है। अगर सीजेपी को स्कूलों के निरीक्षण का अधिकार नहीं है तो उन्हें स्कूल प्रशासन, स्थानीय पुलिस रोक सकती है लेकिन उनके साथ मार-पीट, उनकी कार के शीशे तोड़ने का अधिकार किसने किसे दिया जिसका उपयोग किया गया है? जाहिर है, पुलिस अपना काम नहीं कर रही है और मीडिया वाले अपना काम नहीं कर रहे हैं। खबर या तो नहीं है या है तो ठीक से नहीं है।
कलकत्ता डेटलाइन से शुभंकर चौधुरी की द टेलीग्राफ की लीड की मुख्य खबर का शीर्षक है – छात्रों, शिक्षकों और कलकत्ता के लोगों का विरोध-प्रदर्शन। इसमें कहा गया है, शुक्रवार शाम को जादवपुर यूनिवर्सिटी के 70 साल के पूर्व छात्र ने 20 साल के फर्स्ट ईयर के छात्र के साथ मिलकर मार्च किया। वे कैंपस में आरएसएस के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा किए गए हमले का विरोध कर रहे थे। मलय रॉय ने 1973 में जादवपुर यूनिवर्सिटी से आर्किटेक्चर में ग्रेजुएशन किया था। उन्होंने कहा कि बुधवार रात और गुरुवार दोपहर हुए हमलों ने उन्हें “बहुत परेशान” कर दिया था इसलिए वे घर पर नहीं बैठ सकते थे।
20 साल के सौम्यदीप हलदर ने अंबेडकर की एक किताब दिखाई और कहा, “जादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्र जातिवाद में विश्वास नहीं करते हैं।” अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक नेता ने आरोप लगाया था कि उन्हें वामपंथी छात्रों की ओर से जातिसूचक अपशब्दों का सामना करना पड़ा। आज अमर उजाला में लीड के ऊपर टॉप पर छपी खबर का शीर्षक है, जंतर मंतर पर अब आरक्षण विरोधी जुटे, रात में पुलिस ने हटाया तो राजघाट पहुंचे। आप समझ सकते हैं कि दिल्ली में कॉक्रोच जनता पार्टी का आंदोलन हुआ तो झारखंड में छात्रों का आंदोलन शुरू हो गया। उससे निपटते ही अब यह आरक्षण विरोधी आंदोलन शुरू हो गया।
इसकी मांग है कि जातिगत आरक्षण खत्म करके आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाए। कहने की जरूरत नहीं है कि जातिगत आरक्षण का मकसद बिल्कुल अलग है और इसकी जरूरत पूरी हुई या नहीं – तय हुए बगैर इसे हटाकर आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग बिल्कुल अलग है। इसकी जरूरत हो तो इसकी व्यवस्था भी की जाए लेकिन जातिगत आरक्षण तभी खत्म किया जाना चाहिए जब उसकी जरूरत पूरी हो गई हो। मुझे अभी ऐसा नहीं लगता है। दूसरी ओर, खबर थी कि आर्थिक आधार पर आरक्षण का लाभ लेकर लोग करोड़ों की फीस वाले पाठ्यक्रम में दाखिला ले रहे हैं। एआई का कहना है, आर्थिक आधार पर आरक्षण के तहत कम आय वाले परिवारों के छात्रों को शिक्षण संस्थानों में 10% आरक्षण मिलता है। यदि कोई योग्य छात्र पात्रता मानदंडों को पूरा करता है, तो वह महंगे पाठ्यक्रमों में भी इसका लाभ ले सकता है। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य गरीब मेधावी छात्रों को उच्च शिक्षा दिलाना है। (भले इसका लाभ करोड़ों में फीस देने वाले गरीब को भी मिलता रहे)।
आज अमर उजाला, दैनिक भास्कर, देशबन्धु के साथ दि एशियन एज की लीड राहुल गांधी की खबर है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा – राहुल गांधी के धरने के बाद पुलिस ने पेलेट फायरिंग मामले में एफआईआर दर्ज की। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, राहुल गांधी के 6 घंटे धरने के बाद पहली एफआईआर दर्ज। दैनिक भास्कर की लीड का शीर्षक है, राहुल 7 घंटे थाने में धरने पर बैठे, तब दर्ज हुई 200 पैलेट से घायल युवक की एफआईआर। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, पैलेट गन मामले में एफआईआर। फ्लैग शीर्षक है, राहुल गांधी के धरने के बाद झुकी सरकार। इसके अलावा और भी कई अखबारों में आज यह खबर सेकेंड लीड है, पहले पन्ने पर तो है ही।
नवोदय टाइम्स की लीड तीन कॉलम की है लेकिन राहुल गांधी की खबर बराबर में चार कॉलम की सेकेंड लीड है। शीर्षक है – राहुल का थाने पर धरना, एफआईआर कराकर ही माने। इसके साथ भाजपा का मुंह छिपाने वाला शीर्षक भी है, वंदे मातरम पर आलोचना से बचने का प्रयास। इस पर यही कहा जा सकता है कि दोनों पार्टियों का अंतर स्पष्ट हो गया है। भाजपा के पास अपनी नालायकियों को ढंकने के लिए वंदेमातरम के अलावा कुछ और नहीं है। कांग्रेस ने तो वंदेमातरम पर 1937 में ही फैसला कर लिया था। उसी पर कायम है। भाजपा को बताना है कि अब क्यों बदलना चाहती है और बदलना ही था तो अब क्यों? पहले क्यों नहीं या 1937 में 100 साल होने पर क्यों नहीं खासकर तब जब 50 दिन और 100 दिन के काम के लिए अब 2047 का इंतजार चल रहा है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सेकेंड लीड है। शीर्षक है, राहुल के विरोध के बाद पेलेट से जख्म की एफआईआर हुई। द हिन्दू में भी यह सेकेंड लीड है। शीर्षक है, कांग्रेस के आंदोलन के बाद, पेलेट गन के इस्तेमाल पर एफआईआर दर्ज हुई। टाइम्स ऑफ इंडिया और दि इंडियन एक्सप्रेस में भी यह खबर पहले पन्ने पर है। जाहिर है, जनहित में की गई राहुल गांधी की यह कार्रवाई और उसपर सरकार (या दिल्ली पुलिस) का रवैया पहले पन्ने की खबर बन गया। इसे राहुल गांधी के राजनीतिक लाभ के रूप में देखा जा सकता है लेकिन मुझे लगता है कि यह काम विपक्ष के नेता के स्तर का नहीं था और इसमें विपक्ष के नेता को सात घंटे लगाने पड़े – बताता है कि भाजपा की सरकार और सत्ता कैसी है।
इसका एक उदाहरण आज द हिन्दू और इंडियन एक्सप्रेस की लीड से भी मिलता है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, स्कूल का निरीक्षण करने की कोशिश में सीजेपी टीम पर हमला। इस खबर का उपशीर्षक है, टीम ने राजस्थान के एक गाँव में सरकारी प्राइमरी स्कूल का निरीक्षण करने की कोशिश की, जहाँ मवेशियों के बाड़े में क्लास चल रही हैं; सीजेपी ने बीजेपी पर आरोप लगाया और स्कूल की मरम्मत न होने पर आंदोलन की चेतावनी दी। इस खबर के साथ छपी पीटीआई की तस्वीर का कैप्शन है, शुक्रवार को राजस्थान के जयपुर ज़िले के बगरू गाँव में ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के दौरान सीजेपी कार्यकर्ताओं की कुछ लोगों से भिड़ंत हुई।
आप समझ सकते हैं कि स्कूल का निरीक्षण करने से कोई सीजेपी को क्यों रोकेगा और रोकने वाले कौन होंगे। पर मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा यह है कि पुलिस कहां है और अगर आप कहें कि पुलिस हर समय हर जगह नहीं हो सकती है तो सवाल उठेगा कि एफआईआर हुई या नहीं और पुलिस का डर क्यों नहीं है। जाहिर है यह राजनीति मामला है और राजनीतिक ढंग से निपटा जाएगा। तब खबर भी छपेगी और तब भी देखा जाएगा कि बचाव में सत्तारूढ़ पार्टी क्या कह रही है।
कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा की सरकारें जहां हैं, जैसी हैं, एक जैसी हैं। राहुल गांधी के कल के धरने से यह साबित हो गया कि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के कहने में है या उसके कहे बिना एफआईआर भी नहीं लिखती। भले विपक्ष के नेता को भी 6-7 घंटे लगाने पड़ें। यह विचारधारा का मामला है और इसमें सवाल किया जाता है कि सीजेपी स्कूल का निरीक्षण क्यों कर रही है, राहुल गांधी एफआईआर क्यों दर्ज करवाना चाहते हैं आदि। यह विचारधारा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है और आप जानते हैं कि कॉक्रोच जनता पार्टी कब और कैसे बनी।
आज इंडियन एक्सप्रेस की खबर से लग रहा है कि यही हालत राष्ट्रपति भवन की हो चुकी है। इससे पहले पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के कथित इस्तीफे और उससे संबंधित औपचारिकताओं, आरटीआई की रिपोर्ट और बाद में जो सब हुआ उससे भी ऐसा लगा था और आज यह दोबारा हो न हो, पहली बार तो नहीं ही है। इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड का शीर्षक है, राष्ट्रपति भवन ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के दौरे की घोषणा की और फिर संबंधित बयान वापस लिया। खबर के अनुसार विदेश मंत्रालय ने कहा है, अभी कहने के लिए कुछ नहीं है। बांग्लादेश ने भी कहा कि दौरे को लेकर कोई निर्णय नहीं हुआ है।
संभव है कि राहुल गांधी की खबर को दबाने के लिए उससे बड़ी खबर गढ़ने की कोशिश की गई होगी और जल्दबाजी में की गई घोषणा में कुछ कमी रह जाने से उसे बाद में वापस लेना पड़ा हो। अभी हाल में ई-20 मामले में सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) ने सरकार को एक पत्र लिखा था। इसके आधार पर कुछ खबरें छपीं, कुछ दावे किए गए लेकिन बाद में एसआईएएम ने उस पत्र को वापस ले लिया। एसआईएएम के बाद अब ऐसा राष्ट्रपति भवन के साथ हुआ है। आप समझ सकते हैं कि देश में सरकार के काम और दबाव की स्थिति क्या है। आज यह अखबारों में बहुत साफ दिख रहा है।
*एफएंडओ (F&O) का मतलब फ्यूचर्स और ऑप्शंस (Futures and Options) है। यह शेयर बाजार में डेरिवेटिव ट्रेडिंग का एक रूप है, जिसमें दो पक्ष भविष्य की एक तय तारीख पर तय कीमत पर शेयर या इंडेक्स का सौदा करते हैं। इसमें पूरी रकम चुकाए बिना बहुत कम मार्जिन या प्रीमियम देकर बड़ा जोखिम या व्यापार किया जाता है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


