संजय श्रीवास्तव-
कल की शाम अच्छी गुजरी. प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में इतिहासकार और पर्यावरण विचारक रामचंद्र गुहा को सुनने का मौका मिला. गुहा उन लेखकों में हैं. जिन्हें हमेशा पढ़कर अच्छा लगता है. लेखकों के बीच उनका लीजेंड जैसा कद और छवि. मौका था पेंग्विन स्वदेश द्वारा आयोजित कार्यक्रम लेखक – अनुवाद संवाद का.
हृदयेश जोशी और आशुतोष भारद्वाज के साथ उनका संवाद और सवाल जवाब का सिलसिला चला. दोनों लेखक भी हैं और अनुवादक भी. दोनों ने गुहा की कुछ किताबों का हिन्दी अनुवाद उसकी आत्मा, भाव और प्रवाह बरकरार रखते हुए किया है. बहुत कुछ सुनने और जानने को मिला. यूं भी गुहा को सुनना हमेशा अच्छा होता है.

जब श्रोताओं को सवाल करने का मौका मिला, तो एक सवाल पूछने से मैं खुद को रोक नहीं पाया , मौजूदा दौर में जिन अखबारों में आप कॉलम लिख रहे हैं. वो लिखना आपके लिए कितना चुनौतीपूर्ण हुआ है और उन अखबारों के लिए भी, जो आपको छाप रहे हैं. गुहा मुस्कुराए, बोले, मेरे कॉलम देश में कई भाषा के अखबारों में नियमित छपते हैं, यहां तक कि गुजरात के भी एक अखबार में, जो मोदी का राज्य है. हिंदी में छपे अनुवाद को कभी कभार पढ़ता हूं, अनुवाद तो वो उसी तरह छापते हैं लेकिन हेडिंग अक्सर बदल देते हैं. अलग अर्थ देने वाली हेडिंग्स. उन्होंने इसके कई रोचक उदाहरण भी दिए. ठहाका लगा….
प्रोग्राम खत्म हुआ तो बाहर मेजों पर सजी पेंग्विन स्वदेश और सेतु के स्टाल्स से गुहा की ताजातरीन दो तीन किताबें खरीदीं. किताब पर उनका ऑटोग्राफ लिया. कई मित्रों से मुलाकात हुई. पेंग्विन स्वदेश के संपादक संजीव मिश्र, सहज सरल श्रीराम शर्मा. प्रोग्राम के बाद प्रेस क्लब में पंकज श्रीवास्तव ने कुछ गला तर कराया, हल्का फुल्का स्नैक्स लिया. रात में प्रेस क्लब का बाहरी हिस्सा चहगोइयों से भरा होता है. टेबल पर हमारे साथ मेजबान पंकज जी के साथ संजीव जी और छोटे भाई जैसे समीरात्मज मिश्र का सान्निध्य मिला. निकलते निकलते सहारा टीवी में पूर्व बॉस रहे संजय कॉव मिल गये. सो एक शाम अच्छी गुजरी.


