दिलीप सिंह राजपुरोहित-
कल पुणे में हुआ “छात्रों की गूँज” कार्यक्रम शानदार हुआ। मैं स्वयं वहां मौजूद था तो एक एक चीज को नजदीक से देखा। 15-15,16-16 साल वाली उम्र की लड़कियों को वहां देखना हैरानी भरा था मेरे लिए। मैंने कइयों से हंसते हुए बात की कि घर वालों ने आने दिया? हैरानी की बात ये थी कि मोस्टली सबका जवाब हां में आया। मैं किसी भी राजनीतिक इवेंट/रैली में आई हुई भीड़ का विश्लेषण मेरे हिसाब से करता हूं। मैंने उन सब लड़कियों से उनका “पूरा” नाम पूछा, जवाब में गुप्ता, सिंह, चतुर्वेदी, शर्मा जैसे उपनाम बहुत मिले।
मैं यही देखता हूं कि जिस पार्टी का प्रोग्राम है वहां आने वाला वर्ग कौन है। अगर किसी भी पार्टी का पारंपरिक वोटर ही आ रहा है तो कोई बड़ी बात नहीं होती है, उनको आना ही होता है या उनको लाने के लिए व्यवस्था की जाती है। कल यहां जो लड़कियां आई थी उनमें से किसी को भी “लाया” नहीं गया था क्योंकि लड़कियों ने स्कैनर के थ्रू अपनी डिटेल भरी थी खुद।
मैंने उन छोटी छोटी लड़कियों से पूछा कि आप सब यहां आई हो, क्या घर वाले कांग्रेस सपोर्टर है? 90% का जवाब उल्टा आया, यानी कि बीजेपी सपोर्टर थे उनके पेरेंट्स। मैंने अलग-अलग लड़कियों से राजनीति से जुड़े कई सवाल पूछे जिनके बारे में लगभग सबके जवाब गोल गोल थे, उनको उतना पता नहीं था राजनीति के बारे में लेकिन सब एक बात पर सहमत थी कि उन्हें राहुल जेन्युइन लगता है। उनको राहुल में सच्चाई लगती है।
ये सारी लड़कियां whatsapp यूनिवर्सिटी वाले ज्ञान का 1 सेकेंड से कम समय में कचूमर निकाल रही थी। मैंने एक लड़की जो शायद 19-20 के आस पास थी और राहुल को लेकर बहुत ज्यादा एक्साइटेड थी उससे कहा कि तुमको पता है राहुल आलू से सोना बना रहे थे? भाई साहब उसने कुछ ही सेकंड में या यूं कहे कि 10 सेकंड के अंदर अंदर यू ट्यूब से ओरिजिनल वीडियो निकाला और मुझे अपनी मध्यमा उंगली दिखाते हुए बोली कि Fuck your self and watch this मैंने गाली तो खाई लेकिन इतनी तेजी से फैक्ट चेक होता देखकर अच्छा लगा, उसके बाद मैंने उसे बताया कि मैं कौन हूं और ये सवाल क्यों पूछा तो उसके जवाब में उसने सॉरी भी कहा, वो जैन थी।
मोटा मोटी सार ये है कि मुझे निजी रूप से ऐसी फिलिंग आ रही है कि ये वर्ग (लड़कियां) अगर अपनी मर्जी से वोट देगा तो बहुत ज्यादा चांस है कि राहुल को दे (उन्हें कांग्रेस से कोई लेना देना नहीं है ऐसा मैं कइयों से बात करने के बाद कह रहा हूं)। हां अगर इनके घर वालों के इन्फ्लुएंस में आकर (जो कि भारत में होता ही है) किसी और को दे दे तो बात अलग है।
पर जिस तरह के इनके तेवर, राहुल को लेकर स्पष्टता दिखी उसे देखकर लगता नहीं है ये किसी की बात मानेंगी। प्रोग्राम समाप्त होने के बाद महिलाओं का झुकाव शायद राहुल की तरफ ज्यादा ही होगा क्योंकि मुद्दे चुन चुन कर उठाए थे राहुल ने।
जब राहुल ने कहा कि लड़के गाली दे तो चलता है, लड़की दे तो कल्चरल शॉक लगता है ऐसा क्यों? तो मेरे आगे खड़ी लड़की जोर से चिल्लाकर बोलती है मा***द है साले कसम से मोदी जी पर बहुत दया आई।
एक वीडियो लगा रहा हूं उसे देखे आप, ये वीडियो आयोजन स्थल के जस्ट बाहर का है, भाई साहब लड़कियों और महिलाओं की सुनामी आई हुई थी, मैंने किसी भी राजनीतिक प्रोग्राम या रैली में इतनी महिला की भीड़ नहीं देखी, यह अपनी तरह का अनूठा प्रोग्राम था जो उम्मीद से ज्यादा कामयाब हुआ।
भीड़ ज्यादा होने के कारण वाहनों का आवागमन पूरी तरह से रोक दिया गया और उस रोड को सिर्फ चलने की जगह बना दी गई, यह वह भीड़ है जो अंदर आ ही नहीं पाई क्योंकि जगह अंदर ऑलरेडी भर चुकी थी।
सरकार ने इस प्रोग्राम को फेल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, शायद मेट्रो भी बंद कर दी थी घंटे भर के लिए। शायद इसलिए कह रहा हूं कि आयोजन स्थल एग्जेक्ट मेट्रो स्टेशन के पास था और मुझे हर 5 मिनट बाद मेट्रो आते जाते दिख रही थी लेकिन कुछ समय बाद बिल्कुल दिखना बंद हो गई। ये भीड़ आपको मेट्रो स्टेशन के नीचे ही दिख रही है। आयोजन स्थल के आसपास इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी गई थी अब यह सरकार ने की है या राहुल की सुरक्षा के लिए जैमर लगाए थे मैं नहीं जानता क्योंकि 4:00 से लेकर के रात को 9:00 तक जो लोग अंदर थे उनका नेट ही नहीं चल रहा था।
महाराष्ट्र सरकार ने इस प्रोग्राम को फेल करने के लिए चार से अधिक लोगों के एक जगह उपस्थित होने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। ड्रोन शूट पर भी प्रतिबंध था, इस तरह की कई छोटी-मोटी दिक्कतें सरकार ने जानबूझकर के पैदा की लेकिन उसके बावजूद प्रोग्राम ऐतिहासिक रूप से सफल रहा।
मैं सिर्फ शब्द लिख रहा हूं यकीन मानिए जो उन लड़कियों को देखकर महसूस हुआ वो तो मुझे लिखना ही नहीं आता। क्या माहौल था, लड़कियों में क्या दीवानगी थी, किस कदर वे अपने आप को एक्सप्रेस कर रही थी ये तो शब्दों में बयां करना मुझे आता ही नहीं।
और एक बात, पुरुषों की संख्या महिलाओं से डबल थी लेकिन वो कवर नहीं हुई क्योंकि वो आयोजन स्थल के दूसरे हिस्से में थे और बीच में बैरीकेड लगे थे।
सौमित्र राय-
18वीं सदी में पेशवाओं की राजधानी रहे पुणे को समूचे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी बताया जाता है। उसी शहर में राहुल गांधी ने ढाई से 3 लाख जेन ज़ी लड़कियों की रैली में आकर उन सवालों को छेड़ दिया, जो बीजेपी की रिश्वतखोर लाडली बहिन योजना से कहीं नहीं जुड़ते।
ये असहज करने वाले सवाल हैं, क्योंकि ये हमारे वज़ूद को हिलाते, झिंझोड़ते हैं।
मूल सवाल था–औरत पर हमारे समाज का नियंत्रण कैसे होता है? 4 तरीके हैं–हिंसा, बेइज़्ज़ती, समय और मर्यादा की जंजीरें।
राहुल गांधी ने पहली बार यह साफ़ कर दिया कि भारतीय समाज आज भी 2 हज़ार साल पहले के मनुस्मृति काल में जी रहा है।
संयोग देखिए–जिस वक्त राहुल यह कह रहे थे, बीजिंग में दूसरा विश्व रोबोटिक गेम्स चल रहा था। इसमें एक रोबोट ने उसैन बोल्ट के 100 मीटर दौड़ का रिकॉर्ड तोड़ दिया। इंसान की ताकत को हरा दिया।
जी हां। दुनिया अब रोबोट्स के साथ जीने की तैयारी कर रही है। इंसानों का भावनाशून्य मशीनों के साथ रिश्ता बन रहा है। लेकिन आरएसएस के इशारे पर बीजेपी की सत्ता मुंबई की रिया अहीर को गाली देती है। जंतर–मंतर पर प्रोटेस्ट करने वाली लड़कियों की बेइज्ज़ती करती है।
उनकी भाषा, देर रात तक सड़कों पर घूमने, उनके पहनावे पर सवाल उठाती है, जज करती है। संसद में, संसद के बाहर और अपने बयानों में।
यह सस्ता घिनौनापन समाज के लिए औरत को बांधने का बेहतरीन औजार है। यह आज भगवा ब्रिगेड का राजनीतिक हथियार है।
राहुल गांधी ने इसे तोड़ने की पहली बार कोशिश की है और पुणे की लड़कियों ने इसे भरपूर सपोर्ट किया है। राहुल वहां भाषण देने नहीं, जेन ज़ी का दर्द सुनने गए थे। उस महानगर में, जहां विकास तो है, पर ट्रेन, बस, सड़क, हॉस्टल, स्कूल, होटल, घर–कहीं भी औरत के लिए थोड़ा भी स्पेस नहीं।
औरत गोरी हो, सुंदर हो, शरीर आर्य कन्या जैसा हो, सुसंस्कृत हो, आज्ञाकारी हो और पलट कर जवाब न दे–औरत की यही परिभाषा हमारे समाज ने गढ़ी है।
जब राहुल ने एक लड़की से कहा–तुम खूबसूरत हो। तुम्हारी अपनी आइडेंटिटी है। एक वजूद है, जो सबसे अलग है–तो बीजेपी और हमारे समाज का पूरा तानाबाना एक झटके में बिखर गया।
यही मूल रूप से जेन ज़ी का डिस्कोर्स, यानी विमर्श है। जंतर–मंतर पर लड़के–लड़कियां रात भर साथ रहे, लेकिन सेफ़ रहे। यह सुरक्षा पुणे, मुंबई में क्यों नहीं दिखती?
औरत एक बेटी, बहन, बहू, मां और सास के रूप में पुरुषों की बपौती नहीं, बल्कि अपना वजूद है–स्वतंत्र। अपने काम से, सोच से।
राहुल ने बता दिया कि नेहरू की बहन, सोनिया गांधी, इंदिरा से लेकर ममता बनर्जी तक–तमाम औरतों को गाली देकर बीजेपी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने जेन ज़ी को भी बेइज्ज़त किया है।
चौबीसों घंटे की इस बेइज़्ज़ती के एवज में बीजेपी की डबल, ट्रिपल इंजन सत्ता औरतों को चुनाव से पहले कुछ हज़ार में खरीद लेती है। ठीक वैसे–जैसे पति साल भर बीवी को पीटने के बाद करवा चौथ में उसके लिए गहने लेकर आता है।
राहुल ने कल साफ़ कर दिया कि जेन ज़ी मनुस्मृति से आज़ाद है। उसका अलग वज़ूद है, अलग सोच है, जो 2000 साल पुराने नहीं, नई रोबोटिक दुनिया के हिसाब से है।
हमारी पीढ़ी ने मटके में पत्थर डालकर पानी पीते कौवों को देखा है। आज वे नल खोलकर पानी पीते हैं और नल बंद भी करते हैं।
पशु–पक्षियों तक ने इंसानों से सीखा, खुद को ढाला–यही जीवन विकास है। लेकिन भारत का समाज सड़ रहा है। उसने नए ज़माने के हिसाब से खुद को नहीं ढाला।
नतीजतन, आरएसएस आज सत्ता में है। समाज की सड़ांध और बदबू लपेटे। नई पीढ़ी की सोच से अलग। कैसे निपट पाएगी बीजेपी अब इस जेन ज़ी से? नामुमकिन सा है। कैसे अपने बच्चों से नज़र मिला पाएंगे वे दकियानूसी मां–बाप? उसी पुणे के एक भगवा पत्रकार की बिटिया कल घर से बगावत कर राहुल की रैली में चली गई। डरी हुई मां आखिर पति से बगावत कर बेटी का हाथ थामने रैली में जा पहुंची। घर में अकेला रह गया पति।
हम कितने भी गैर राजनीतिक बनें, लेकिन राहुल की सभा में निकले सवाल राजनीतिक हैं। आप इनसे बच नहीं सकते, क्योंकि समाज ने इन सवालों को हल नहीं किया।
लिहाज़ा, भारत प्रगतिशील नहीं है। वह पिछड़ा है। 2047 में भी पिछड़ा रहेगा, जब तक समाज खुद को विकसित न करे, नई तकनीकी दुनिया के हिसाब से खुद को न ढाले।
इसके लिए वंदे मातरम् पूरा गाने की जरूरत नहीं, बल्कि इसके पीछे के मनुवाद को छोड़ने की है। राहुल की सभा कुछ यही कहना चाहती है।


