जयपुर। निर्भीकता और खोजपूर्ण पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले राजस्थान के वरिष्ठ एवं राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त पत्रकार महेश झालानी की रोकी गई ‘वरिष्ठ पत्रकार सम्मान निधि’ के मामले ने अब एक बड़ा कानूनी एवं प्रशासनिक मोड़ ले लिया है।
लगभग पांच दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय 71 वर्षीय महेश झालानी ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के सचिव डॉ. जितेंद्र सोनी और आयुक्त राकेश शर्मा को अपने अधिवक्ता रामनिरंजन गुप्ता के माध्यम से एक विस्तृत, तर्कयुक्त एवं कड़ा अंतिम विधिक नोटिस प्रेषित किया है। इस नोटिस में अधिकारियों को स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि नोटिस प्राप्ति के 7 दिवस के भीतर बकाया सम्मान निधि का अविलंब भुगतान नहीं किया गया, तो दोनों अधिकारियों के विरुद्ध बिना किसी अग्रिम सूचना के राजस्थान उच्च न्यायालय में संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत याचिका दायर की जाएगी।
इसके साथ ही, अधिकारियों के व्यक्तिगत एवं दुर्भावनापूर्ण आचरण के चलते 5 लाख की प्रतिपूरक क्षतिपूर्ति तथा 2 करोड़ की पृथक दीवानी व आपराधिक मानहानि का वाद भी सक्षम न्यायालय में दायर किया जाएगा। विधिक नोटिस में मामले के संपूर्ण घटनाक्रम और कानूनी तथ्यों को क्रमबद्ध तरीके से सामने रखा गया है। अधिवक्ता रामनिरंजन गुप्ता ने स्पष्ट किया कि थाना अशोक नगर, जयपुर में महेश झालानी के विरुद्ध दर्ज एफआईआर संख्या 153/2026 सोशल मीडिया पर प्रकाशित एक पोस्ट के संदर्भ में राज्य के मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास द्वारा दर्ज कराई गई थी।
बाद की परिस्थितियों में मुख्य सचिव ने स्वयं उच्च प्रशासनिक संवेदनशीलता का परिचय देते हुए इस विवाद को अनावश्यक रूप से आगे न बढ़ाने और समाप्त करने की भावना प्रदर्शित की। तत्पश्चात, पुलिस अनुसंधान अधिकारी द्वारा प्रकरण में गहन व विस्तृत जांच पूर्ण करते हुए न्यायालय के समक्ष Final Report No. 74/2026 (दिनांक 28.07.2026) प्रस्तुत कर दी गई। कानूनी रूप से जब मूल शिकायतकर्ता ने प्रकरण समाप्त करने की मंशा जताई और पुलिस ने न्यायालय में एफआर पेश कर दी, तो एफआईआर को आधार बनाकर सम्मान निधि रोके रखने का संपूर्ण औचित्य पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
नोटिस में विभाग की अपनी कार्यप्रणाली और कथनी-करनी के अंतर को उजागर किया गया है। दिनांक 03 जुलाई 2026 को आयुक्त राकेश शर्मा द्वारा महेश झालानी से एफआर की प्रति मांगी गई थी और आश्वासन दिया गया था कि दस्तावेज मिलते ही सम्मान निधि जारी कर दी जाएगी। इस निर्देश का पालन करते हुए महेश झालानी ने 04 अगस्त 2026 को ई-मेल एवं व्हाट्सएप के जरिए एफआर की प्रति आयुक्त व सचिव दोनों को उपलब्ध करा दी थी। इसके बावजूद, आज तक न तो सम्मान निधि जारी की गई, न कोई कारणयुक्त लिखित आदेश दिया गया और न ही कोई स्पष्ट वैधानिक रोक बताई गई।
यहां तक कि दूरभाष पर मौखिक रूप से मुख्य सचिव या मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) स्तर की “क्लियरेन्स” लंबित होने का अनधिकृत बहाना बनाया जा रहा है, जबकि ऐसा कोई लिखित आदेश अस्तित्व में ही नहीं है। नोटिस में आरोप लगाया गया है कि अधिकारी मुख्य सचिव की विशुद्ध एवं सदाशयतापूर्ण भावना को निष्प्रभावी बनाकर उनके नाम का सहारा ले रहे हैं, जो मुख्य सचिव के पद और गरिमा का मखौल उड़ाने के समान है। अधिवक्ता ने नोटिस में स्पष्ट किया कि यह विवाद पूरे सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से न होकर उन विशिष्ट अधिकारियों के व्यक्तिगत निर्णय और आचरण से है, जिन्होंने एफआर उपलब्ध होने के बाद भी सम्मान निधि रोकी हुई है।
सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय Lucknow Development Authority v. M.K. Gupta [(1994) 1 SCC 243] का हवाला देते हुए चेताया गया है कि यदि कोई लोकसेवक दुर्भावनापूर्वक, मनमाने ढंग से या अपने पद का दुरुपयोग कर किसी नागरिक को प्रताड़ित करता है, तो सरकारी पद का कवच उसे सुरक्षा प्रदान नहीं करता। ऐसी स्थिति में क्षतिपूर्ति की राशि राज्य के खजाने से नहीं, बल्कि संबंधित अधिकारियों के व्यक्तिगत वेतन और निजी संपत्ति से वसूल की जाएगी। इसके अतिरिक्त, जानबूझकर असत्य एवं मनगढ़ंत आधारों पर एक वरिष्ठ पत्रकार की सामाजिक व पेशेवर प्रतिष्ठा को धूमिल करने हेतु भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सुसंगत धाराओं के तहत अधिकारियों के खिलाफ व्यक्तिगत हैसियत में आपराधिक मुकदमा भी चलाया जाएगा।
नोटिस में समानता के संवैधानिक सिद्धांत को रेखांकित करते हुए सवाल उठाया गया है कि देश में गंभीर आपराधिक मामलों और एफआईआर का सामना कर रहे अनेक निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने पदों और सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, क्योंकि कानून का मूल सिद्धांत है कि जब तक दोषसिद्धि न हो, किसी को दोषी नहीं माना जा सकता। ऐसे में एक वरिष्ठ पत्रकार के खिलाफ केवल एफआईआर (जिसमें एफआर भी लग चुकी है) को आधार बनाकर सम्मान निधि रोकना पूरी तरह असंगत, दंडात्मक और मनमाना कृत्य है। ‘सम्मान निधि’ केवल एक आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि पांच दशकों के योगदान की संस्थागत स्वीकृति और पत्रकार के सम्मान से जुड़ा अधिकार है।
झालानी का आरोप है कि इसे बिना किसी वैधानिक आधार के रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता एवं मनमानेपन पर रोक), अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति व प्रेस की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन एवं प्रतिष्ठा) का सीधा उल्लंघन है, जो E.P. Royappa, Maneka Gandhi और Ajay Hasia जैसे प्रकरणों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के विपरीत है। विधिक नोटिस के माध्यम से अधिकारियों से 07 दिवस के भीतर निम्नलिखित बिंदुओं पर त्वरित कार्रवाई की मांग की गई है:
- संपूर्ण लंबित वरिष्ठ पत्रकार सम्मान निधि का अविलंब भुगतान और विलंब की अवधि का लागू नियमों अनुसार ब्याज/प्रतिपूरक राशि का भुगतान।
- सम्मान निधि रोकने के आधारभूत नियम, शासनादेश, नोटशीट, पत्राचार अथवा मुख्य सचिव/CMO के किसी लिखित निर्देश की प्रमाणित प्रतियां।
- एफआर प्राप्त होने के बावजूद भुगतान न करने और व्हाट्सएप ब्लॉक किए जाने का कारणयुक्त लिखित स्पष्टीकरण।
- प्रशासनिक उत्पीड़न, सामाजिक अपमान और मानसिक संताप हेतु ₹5,00,000 (पांच लाख रुपये) की क्षतिपूर्ति का भुगतान।
- प्रकरण से संबंधित संपूर्ण मूल फाइल, नोटशीट व निर्णय अभिलेखों को सुरक्षित रखा जाना।
अधिवक्ता रामनिरंजन गुप्ता ने बताया कि यदि निर्धारित 7 दिवस की अवधि में इन मांगों का न्यायसंगत और दस्तावेजी निस्तारण नहीं किया गया, तो उच्च न्यायालय में याचिका और 2 करोड़ रुपये के मानहानि के मुकदमे के साथ-साथ इस पूरे प्रशासनिक घटनाक्रम से प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, एडिटर्स गिल्ड, राष्ट्रीय मीडिया संगठनों तथा समाचार पत्रों, टीवी एवं डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अवगत कराकर इस प्रशासनिक मनमानी का पर्दाफाश किया जाएगा।


