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वेब-सिनेमा

नेहा का जादू नौजवानों के सिर चढ़कर बोल रहा है!

Woman in red blouse with glasses speaking at a podium, raising her index finger into the air beside a microphone.

अविनाश दास-

अभी वाईबी चव्हाण ऑडिटोरियम [नरीमन प्वाइंट] से लौट रहा हूं। नेहा बोरा को सुनने गया था। क्या बोलती है यह लड़की! ऑडिटोरियम में हज़ार से ज़्यादा लोग थे। नेहा का हर वाक्य जैसे उनके भीतर दबे किसी तार को छू रहा था। कभी तालियां, कभी नारे। कई बार शोर इतना बढ़ जाता कि नेहा को अपनी परिचित स्मित मुस्कान के साथ रुकना पड़ता। वह कुछ पल सांस लेतीं और पूरा ऑडिटोरियम अगली बात सुनने के लिए फिर एक साथ ख़ामोश हो जाता।

उत्तराखंड की यह बहादुर लड़की आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष है। जंतर मंतर के ऐतिहासिक जेन ज़ी आंदोलन को जिन नौजवान आवाज़ों ने वैचारिक धार दी है, उनमें नेहा की आवाज़ सबसे साफ़ और असरदार है। मैं आज ख़ास तौर पर उसी आवाज़ को सुनने गया था।

मैंने कम्युनिस्ट पार्टियों और आंदोलनों से जुड़े बहुत से लोगों के भाषण सुने हैं। उनसे प्रभावित भी हुआ हूं। लेकिन नेहा का जादू आज के नौजवानों के सिर चढ़कर इसलिए बोल रहा है कि वह आज की ज़बान जानती है। पारंपरिक जनवादी सिद्धांतों से अलग उनके पास हमारे आस-पड़ोस, घर, कॉलेज, हॉस्टल, बेरोज़गारी, दोस्ती, डर और अपमान से निकले हुए ऐसे रेफ़रेंस हैं, जिनमें सामान्य आदमी अपना चेहरा देख लेता है। दुनिया और इतिहास की बात भी वह इस तरह करती हैं कि इतिहास कोई पुराना बंद कमरा नहीं, हमारे आज के घर की खुली हुई खिड़की लगने लगता है।

बीस जुलाई को दिल्ली पुलिस की बर्बरता के बाद नौजवानों का जो ग़ुस्सा फूटा, नेहा उसे सिर्फ़ उस दिन का ग़ुस्सा नहीं मानतीं। वह उसे पिछले कई वर्षों के दमन, अन्याय, बेरोज़गारी, संस्थाओं की बर्बादी और लगातार किये गये अपमान से जोड़ती हैं। जैसे हर चुप्पी भीतर ही भीतर जमा होती रही हो और बीस जुलाई को नौजवानों ने उसकी पूरी गठरी सत्ता के सामने खोलकर रख दी हो।

पिछले कुछ वर्षों में हममें से बहुतों को लगने लगा था कि सरकार की चालाकियां इतनी संगठित और उसकी ताक़त इतनी बड़ी हो चुकी है कि शायद अब कई दशकों तक हम लोकतंत्र का ख़याल भी अपने दिल में लाने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे। जेन ज़ी आंदोलन ने हम सबके भीतर बैठी इसी निराशा पर पहला पत्थर मारा है। उसने सरकार की मृग-मरीचिका से परदा हटा दिया है। उसने बता दिया है कि सत्ता चाहे जितनी विशाल दिखाई दे, उसका इक़बाल जनता के डर पर टिका होता है। जिस दिन नौजवान डरना बंद कर देते हैं, उसी दिन सत्ता का क़द छोटा होने लगता है।

आज नेहा को सुनते हुए लगा कि हर दौर अपने भगत सिंह की तलाश करता है। कभी वह जेल की कोठरी में लिखता हुआ मिलता है, कभी किसी विश्वविद्यालय के गेट पर नारा लगाता हुआ और कभी हज़ार नौजवानों के सामने खड़ी एक लड़की की आवाज़ में बोलता हुआ। नेहा बोरा हमारे समय की भगत सिंह हैं। नेहा बोरा को लाल सलाम। जय भीम।

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