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मोदी सरकार के निजीकरण और अब मुनाफे की अंधी दौड़ ने ISRO की जड़ों को खोखला करना शुरू कर दिया है!

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

मोदी सरकार ने हाल के वर्षों में निजीकरण की जिस आक्रामक नीति को अंतरिक्ष क्षेत्र में थोपा है, वह धीरे-धीरे भारत के गौरवशाली स्पेस प्रोग्राम का पूरी तरह से ‘दुकानदारीकरण’ कर रही है। जबकि अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा हो या भारत का इसरो, इनके वैज्ञानिक ये काम देश के रणनीतिक दबदबे और विज्ञान के जरिए देश की ताकत बढ़ाने के लिए करते हैं।

मोदी सरकार की निजीकरण की इस नई नीति का इकलौता मकसद है लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में छोटे कमर्शियल सैटेलाइट, टेलीकॉम और अर्थ इमेजिंग उपकरण भेजना, क्योंकि वहां अरबों डॉलर का सीधा मुनाफा छिपा है। यह अंतरिक्ष विज्ञान नहीं है, यह अंतरिक्ष के रास्ते कोरियर सर्विस चलाना है।

अब फोकस इस बात पर नहीं है कि हम चांद या मंगल पर क्या नई खोज कर रहे हैं, बल्कि इस बात पर आ टिका है कि कौन सी प्राइवेट कंपनी कितने सस्ते में विदेशी सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजकर कितना मुनाफा कमा सकती है।

इस दुकानदारीकरण की असल हकीकत को समझने के लिए हमें स्पेस साइंस और स्पेस बिजनेस के बीच का फर्क समझना होगा। गगनयान के तहत अंतरिक्ष में इंसान भेजना हो, 2035 तक अपना स्पेस स्टेशन बनाना हो, या चांद के दक्षिणी ध्रुव पर रिसर्च करनी हो, इन कामों में कई हजार करोड़ रुपये लगते हैं। गगनयान मिशन का ही बजट 9,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का है। इन डीप स्पेस मिशन में जोखिम सौ प्रतिशत होता है और इनसे अगले दिन कोई कमाई या ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ (ROI) नहीं मिलता। फिर भी अगर ये मिशन किए जाते हैं तो महज इसीलिए क्योंकि दुनिया में देश की ताकत और सैन्य तथा अनुसंधान क्षेत्र में भारत की तरक्की इसी से रफ्तार पकड़ती है।

दूसरी तरफ, 2020 के स्पेस रिफॉर्म्स और 2023 की नई स्पेस पॉलिसी के बाद भारत में जो 300 से ज्यादा प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप्स कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं, उनका देश के दबदबे या विज्ञान के जरिए देश की ताकत बढ़ाने से कोई लेना-देना नहीं होता है।

एक वक्त था जब भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम दुनिया के दिग्गजों की आंखों में आंखें डालकर बात करता था और हमारी तुलना सीधे अमेरिका की नासा (NASA) से होती थी। यह वह दौर था जब इसरो ने महज 450 करोड़ रुपये में मंगलयान को लाल ग्रह की कक्षा में स्थापित कर दिया था, जो हॉलीवुड की फिल्म ‘ग्रेविटी’ के बजट से भी सस्ता था।

साल 2017 में एक ही रॉकेट से 104 सैटेलाइट लॉन्च करके हमने रूस और अमेरिका जैसे देशों के भी पसीने छुड़ा दिए थे। तब इसरो का मकसद विज्ञान की सीमाएं लांघना और ब्रह्मांड के रहस्य सुलझाना था।

लेकिन मोदी सरकार ने निजीकरण कर दिया और अब मुनाफे की अंधी दौड़ ने इसरो की जड़ों को खोखला करना शुरू कर दिया है। करोड़ों डॉलर की फंडिंग से लदी प्राइवेट कंपनियां, जैसे स्काईरूट और अग्निकुल, अब इसरो के भीतर सेंध लगा रही हैं। सरकारी आंकड़ों और हालिया रिपोर्ट्स की मानें तो पिछले कुछ ही समय में इसरो के 100 से ज्यादा अनुभवी वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दे दिया है या वीआरएस ले लिया है।

एक सरकारी ढांचे में इसरो का टॉप वैज्ञानिक महीने के दो-ढाई लाख रुपये कमाता है, जबकि यही प्राइवेट कंपनियां उन्हें तीन से चार गुना ज्यादा सैलरी और करोड़ों के स्टॉक ऑप्शंस (ESOPs) का लालच दे रही हैं।

नतीजा यह हो रहा है कि क्रायोजेनिक इंजन बनाने वाले या गगनयान के क्रू एस्केप सिस्टम पर दिन-रात खपने वाले तेजतर्रार दिमाग अब प्राइवेट कंपनियों के लिए छोटे रॉकेट डिजाइन कर रहे हैं, ताकि किसी विदेशी क्लाइंट का सैटेलाइट सस्ते में लॉन्च करके बैलेंस शीट चमकाई जा सके।

इस टैलेंट ड्रेन के कारण ही आज गगनयान जैसे हमारे सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मिशनों की टाइमलाइन खिसक रही है और सरकार को मजबूरन वैज्ञानिकों के नौकरी छोड़ने के नियमों को सख्त करना पड़ा है।

अक्सर लोग अमेरिका की प्राइवेट कंपनी ‘स्पेसएक्स’ का उदाहरण देकर इस नीति को सही ठहराने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि स्पेसएक्स ने जो भी हासिल किया, वह नासा के अरबों डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट और दशकों की मुफ्त तकनीकी मदद से किया। नासा ने स्पेसएक्स को खड़ा किया ताकि वह अपनी ऊर्जा डीप स्पेस में लगा सके।

लेकिन भारत में इसका बिल्कुल उल्टा हो रहा है। यहां सरकार अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को 2033 तक 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने का सपना तो दिखा रही है, लेकिन इसकी कीमत इसरो को चुकानी पड़ रही है।

प्राइवेट कंपनियां इसरो का टैलेंट खींच रही हैं और देश का सबसे प्रतिष्ठित संस्थान अब इन स्टार्टअप्स को अपनी लॉन्च पैड और टेस्टिंग सुविधाएं किराए पर देने वाले एक ‘फैसिलिटेटर’ या सुविधा प्रदाता में बदलता जा रहा है।

अगर निजीकरण की यह अंधी लहर इसी तरह चलती रही और सरकारी वैज्ञानिकों को बेहतर माहौल और वित्तीय सुरक्षा नहीं दी गई, तो एक भयानक स्थिति पैदा होगी।

हमारे पास दुनिया की बेहतरीन स्पेस डिलीवरी कंपनियां तो होंगी जो ग्लोबल मार्केट का बड़ा हिस्सा कब्जा लेंगी, लेकिन हम नासा और चीन की स्पेस एजेंसी (CNSA) की उस एलीट लीग से बाहर हो जाएंगे जो मंगल पर बस्तियां बसाने या चांद पर माइनिंग करने की तकनीक विकसित कर रहे हैं। वह महाशक्ति बनने की तरफ बढ़ रहे हैं और हम दुकानदार बनने की तरफ.

विज्ञान के नाम पर शुरू हुआ हमारा सफर अगर सिर्फ बैलेंस शीट और मुनाफे के दुकानदारीकरण तक सिमट कर रह गया, तो यह भारत के अंतरिक्ष इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी होगी।

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