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इंटरव्यू

इंटरव्यू (पार्ट-2) : अफसरों को ट्रेनिंग देने वाले फारेंसिक जर्नलिस्ट इंद्रजीत राय की ये बातें अपराधी, मीडियाकर्मी और स्मार्टफोन धारक ध्यान से सुन लें!

इंद्रजीत राय अद्भुत शख्स हैं. अफसर बनते बनते मीडिया में आ गए. फारेंसिक की पढ़ाई की थी और जर्नलिज्म शुरू कर दिया. इनवेस्टीगेटिव जर्नलिज्म. फारेंसिक की पढ़ाई को आगे बढ़ाते रहे. तरह तरह की पढ़ाइयां करते रहे. बनारस में पांच लड़कियों का मर्डर बताकर कई लोगों को जेल में डाल दिया गया. इस केस को साल्व करते हुए इंद्रजीत राय ने बताया कि लड़कियां तो सभी जिंदा हैं और बेकसूर लोग जेल में हैं. फारेंसिक जर्नलिस्ट के नाते वे दुनिया भर में सम्मानित किए गए. उनके कामकाज को वाहवाही मिली. उन्होंने पत्रकारिता में शीर्ष उंचाई धारण करने के बाद रिजाइन देकर अपनी फारेंसिक लैब शुरू कर दी जिसे सरकारी मान्यता प्राप्त है. दर्जन भर से ज्यादा लोगों को रोजगार दिए हुए हैं. वे युवाओं से फारेंसिक की पढ़ाई करने और इस फील्ड में आने का आह्वान कर रहे हैं. भड़ास4मीडिया की तरफ से शिवा कुमारी ने Indrajeet Rai से विस्तार से बातचीत की. ये बातचीत पढ़ने लायक है क्योंकि इससे बहुत कुछ सीखने समझने को मिलता है. आप को पूरा इंटरव्यू पढ़कर अच्छा लगेगा कि आपने कुछ कायदे का पढ़ा. इसका पहला पार्ट प्रकाशित हो चुका है. पेश है दूसरा और आखिरी पार्ट

Two professionals sit at a wood desk in an office, facing the camera; laptop, water bottles, and office supplies are on the desk.

शिवा: आपने अपने करियर में इतने बड़े फैसले लिए—फॉरेंसिक की पढ़ाई, पत्रकारिता, फिर अपना काम शुरू करना और नौकरी छोड़कर एक नए रास्ते पर जाना। इन फैसलों में आपके परिवार, खासकर आपके पिता की क्या भूमिका रही? और जब आपने अपना काम शुरू किया तो इतने बड़े आर्थिक जोखिम को लेकर आपके मन में डर नहीं आया?

इंद्रजीत: इंद्रजीत: मेरे पिता ने ही मुझे कहा था, “यू हैव पोटेंशियल। यू हैव टू डू सम बिग थिंग्स। नॉट बिकॉज़ यू आर माय सन। आई नो यू, बचपन से लेकर अब तक।”

मैंने उनसे कहा, “पिताजी, जिंदगी छोटी है। जिसमें मज़ा आए, वही काम किया जाए।”

मेरे फादर बड़े ओपन माइंडेड थे। जब उनको लगा कि मुझे फॉरेंसिक पढ़ने में मज़ा आ रहा है, उसमें बड़े पद पर जा सकता हूँ और पूरे देश में कहीं भी जा सकता हूँ, तो उन्होंने कहा, “अगर तुझे मज़ा आ रहा है तो कर। अगर तुझे अच्छा लग रहा है तो कर, फिर तो कोई दिक्कत नहीं।”

उन्होंने पहले मुझे समझाया, फिर मुझे परमिशन दी। और मैंने अपने पूरे करियर को बहुत अच्छे से एंजॉय भी किया। मुझे आज मीडिया छोड़ने के बाद कोई रिग्रेट नहीं है। आई लिव्ड माय प्रोफेशन। उसके एक-एक लम्हे को मैंने जिया और उसको एंजॉय किया।

इसके बाद जब मैंने अपना काम शुरू किया तो इसमें पैसों की जरूरत थी। मेरी फैमिली ने मदद की। जहाँ तक रही डर की बात, तो इसमें डेरिंग चाहिए और कैलकुलेटिव रिस्क लेना पड़ता है।

जिंदगी में कभी किसी एक चीज़ के भ्रम में मत चलिएगा—भरोसा रखिए। कुछ नहीं होता। करना है या नहीं करना है, बस इतना तय करना होता है। अगर करना है तो करो। फिर ज़्यादा आगे-पीछे मत सोचो। और नहीं करना है तो मत करो। दो ही चीज़ें होती हैं।

मैंने कहा, करना है तो बात खत्म। और वो मेरे पिताजी का आरबीआई बैंक थोड़े ही था कि उन्होंने छापकर हमें दे दिया था। समाज से कमाया था। डूब जाएगा तो फिर समाज में जाकर कमाएँगे। फिर नौकरी कर लेंगे।

भाई, अब मैं एडिटर से चपरासी तो बन नहीं जाऊँगा। बहुत सारे एडवाइजरी बोर्ड पर मैं हूँ। मैं शारदा की एथिक्स कमेटी का मेंबर हूँ। मैं यूपी स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज का इनवाइटेड एडवाइजर हूँ। तो ऐसा नहीं है कि सब कुछ डूब गया तो मैं कुछ कर ही नहीं पाऊँगा।

लेकिन डूबेगा क्यों? अगर हम पूरी लगन के साथ, पूरा एंजॉय करके अपने इस काम को करेंगे, तो क्यों डूबेगा? और ये बहुत बड़ा मीडियम है लोगों की मदद करने का। एक से एक केस आते हैं।

अब इस काम को करीब डेढ़ साल हो गए हैं और हम ब्रेक-ईवन पर हैं। यानी जितना पैसा लगाया था, उतना पैसा वापस आ चुका है। किसी भी बिजनेस में ब्रेक-ईवन आने में आमतौर पर काफी समय लगता है, लेकिन हमारा डेढ़ साल में ही ब्रेक-ईवन हो गया। सैलरी भी सबकी चल रही है। करीब 12 लोगों का घर मैं चला रहा हूँ और साथ में अपना घर भी चला रहा हूँ।

तो मेरे लिए ये सिर्फ बिजनेस नहीं है। ये एक ऐसा काम है, जिसमें लोगों की मदद करने का मौका मिलता है और साथ-साथ एक पूरी टीम का जीवन भी इससे चल रहा है।

भारत में हम पहली ऐसी प्राइवेट लैबोरेटरी हैं, जिसके पास NABL का एक्रेडिटेशन है। NABL यानी नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज। ये सरकार की तरफ से दिया जाने वाला एक्रेडिटेशन है। इसका मतलब है कि आपकी लैब और उसकी टेस्टिंग प्रक्रिया निर्धारित वैज्ञानिक मानकों पर खरी उतरती है।

हमारी लिखी हुई रिपोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 39 और धारा 63 के तहत कोर्ट ऑफ लॉ में एडमिसिबल है। यानी हमारी रिपोर्ट को कानूनी प्रक्रिया में साक्ष्य के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है।

शिवा: अमर मणि त्रिपाठी वाली जेल स्टिंग स्टोरी का आपके करियर पर क्या असर पड़ा? आपने काठमांडू से कई खुफिया स्टोरीज़ की। उस दौर को आप किस तरह याद करते हैं?

इंद्रजीत: इंद्रजीत: उसी के बाद मेरा प्रमोशन लेटर आया। मैंने उस पर साइन किए। मैं पहले दैनिक रिपोर्टर बनता, फिर रिपोर्टर बनता, फिर करेस्पॉन्डेंट बनता। लेकिन मेरी डायरेक्ट पोस्टिंग करेस्पॉन्डेंट के पद पर हुई। यानी दो प्रमोशन मैंने ज्वाइन करते ही ले लिए।

फिर नौकरी आगे बढ़ती गई। इसी तरह के प्रोजेक्ट बहुत सारे किए। काठमांडू से भी कई स्टोरीज़ कीं। काठमांडू से हमने एक पाकिस्तानी एजेंट से 14 AK-47, 9 AK-56 और 5 ग्रेनेड खुफिया कैमरे पर खरीद लिए। खरीद के बाद डिलीवरी भी हुई। तो ऐसे बहुत सारे खुराफात किए। बहुत सारी चीज़ें कीं। ड्रग्स को लेकर स्टोरीज़ कीं। पूरे भारत के लोगों ने देखा।

उस समय YouTube नहीं था, लेकिन कुछ हिस्से जो लाइब्रेरी में थे, मैंने अपलोड कर रखे हैं। वे YouTube पर हैं। मेरा “इंद्रजीत राय” नाम से एक चैनल है, वहाँ मिल जाएँगी।

तो बहुत समय तक यही काम किया और करियर आगे बढ़ता गया। जिस चैनल में मैंने करेस्पॉन्डेंट के तौर पर ज्वाइन किया था, लगभग छह साल के बाद मैं वहाँ का डिप्टी एडिटर था। डिप्टी एडिटर के डेजिग्नेशन तक मैं पहुँच चुका था।

जब काम में मज़ा आता है तो कई सारी चीज़ें गौण हो जाती हैं। पद भी था, पैसा भी था, लेकिन काम में बहुत मज़ा आ रहा था। काफी एडवेंचर था। पूरा फुल एडवेंचर था। जिंदगी एकदम चकाचक चल रही थी। घर वाले ज़रूर तनाव में रहते थे, लेकिन मैं मौज में था। I was having a good time at that time. Obviously.

शिवा: इतनी व्यस्त और एडवेंचर से भरी पत्रकारिता के बीच आपने अपनी पढ़ाई को कभी रुकने नहीं दिया। यह कैसे संभव हुआ?

इंद्रजीत: Yes, I never stopped my education. मैंने simultaneously अपनी पढ़ाई जारी रखी। मैंने एक भी साल waste नहीं किया। मैंने कहा कि ज्ञान एक ऐसी चीज़ है, जिसको रुकना नहीं चाहिए। वो लगातार होते रहना चाहिए।

एक PhD करने के बाद right now मैं second PhD में enrolled हूँ। अभी मैंने अपनी thesis दो-ढाई महीने पहले जमा की है। Technically, convocation में डिग्री मिलेगी, जो दिसंबर-जनवरी में होगा। लेकिन technically, I have two PhDs.

मेरे पास double PG है, double PhD है और सब forensic में ही है—crime और criminal के क्षेत्र में। Criminology कर रहा था, तभी मैं Zee News में चला गया था। उसके बाद forensic science में PG किया, फिर PhD की। ये सब नौकरी के साथ-साथ चलता रहा।

Psychology में MPhil भी किया है। इसके बाद UNODC से मैंने certification courses किए। UNODC यानी United Nations Office on Drugs and Crime। वहाँ से मैंने दो certification courses किए—एक anti-corruption और दूसरा organized crime में।

उसके बाद मैंने specialized cyber-digital forensics का कोर्स किया, National Institute of Computer Science and Management (NIMC) से। वह भारत सरकार की संस्था थी।

तो मतलब, पढ़ता रहा।

शिवा: आज कोई व्यक्ति कहे कि नौकरी के साथ पढ़ाई के लिए समय नहीं मिलता, तो आप उसे क्या कहेंगे?

इंद्रजीत: देखिए, यही मिथ है। आप चाहे जितने बड़े पद पर पहुँच जाएँ, क्या आप ब्रश नहीं करते? जैसे ब्रश करना आपकी हैबिट में आ गया है, अगर 60 मिनट—सिर्फ 60 मिनट—आप पढ़ने को भी ब्रश करने की तरह अपनी हैबिट बना लें, तो आप दुनिया का कोई भी एग्जाम क्रैक कर सकते हैं। सिर्फ 60 मिनट। इससे ज़्यादा चाहिए ही नहीं।

60 मिनट रोज़ के 60 मिनट होने चाहिए। आपको इसको हैबिट बनाना है। होली हो, दिवाली हो, दशहरा हो, आप बीमार हों, अस्पताल में हों—60 मिनट पढ़ना है।

मुझे इस पढ़ाई का रिटर्न भी बहुत मिला। मुझे अपनी स्टोरीज़ को सोचने में, स्टोरीज़ को कन्क्लूड करने में इससे बहुत मदद मिली। दुनिया भर से मुझे सम्मान मिला।

ब्रिटिश पार्लियामेंट ने मुझे वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड दिया। फ्रेंच सीनेट, यानी फ्रांस की संसद, वहाँ से मुझे भारत गौरव अवार्ड मिला। बोस्टन यूनिवर्सिटी, बोस्टन में मुझे स्कॉलरशिप मिली। वहाँ तीन-चार महीने जाकर मैं पढ़ा।

श्रीलंका, फिलीपींस, जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड—दुनिया की अलग-अलग जगहों पर कॉन्फ्रेंस में एज अ स्पीकर गया, कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने गया। लोगों ने बुलाया। तो आधी दुनिया मैं बिना पैसे के घूम आया।

अमेरिका जब मैं गया था, तो पैसा लगाना तो छोड़िए, वहाँ से स्कॉलरशिप के जरिए 5-7 लाख रुपये बचाकर लाया था और होम लोन चुका दिया था।

तो आई गेट अ लॉट ऑफ थिंग्स। मनी इज़ द सेकेंडरी पार्ट। लेकिन वो दुनिया का एक्सपोज़र, वो नॉलेज—वो मुझे नॉलेज ने दिया।

शिवा: आपने अपने ज्ञान को दूसरों तक भी पहुँचाया?

इंद्रजीत: बिल्कुल। मैंने आईएएस और आईपीएसएस को पढ़ाया। मैंने आईआईएम यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में कई बार जाकर वहाँ के लोगों के साथ वर्कशॉप्स कीं। मध्य प्रदेश पुलिस हो या यूपी पुलिस, इनके ऑफिसर्स को मैंने ट्रेनिंग दी। सीबीडीटी के कम से कम 10 बैच को पढ़ाया। मतलब इस देश में जितने भी आईआरएस हैं, उनमें 50 प्रतिशत मुझसे पढ़े हुए होंगे। तो ये सारा कुछ नॉलेज ने ही दिया है।

शिवा: फिक्की के अनुसार ग्लोबल फॉरेंसिक मार्केट लगातार बढ़ रहा है। भारत में इस क्षेत्र में बिजनेस और करियर की क्या संभावना है?

इंद्रजीत: देखिए, ये इकलौता मार्केट है जो लगभग प्रेडिक्टेड 28% की ग्रोथ दे रहा है। जो एसोचैम और फिक्की हैं, ये कह रहे हैं। और दुनिया के किसी और बिजनेस में 28% की ग्रोथ नहीं है। ये फॉरेंसिक में है। फॉरेंसिक में उन्होंने प्रोजेक्शन किया है। वो इसलिए किया है क्योंकि लगातार अपराध बढ़ रहे हैं। मुकदमों की संख्या बढ़ रही है, लोगों के बीच विवाद बढ़ रहे हैं। डिजिटल दुनिया में एक-दूसरे की इज्जत उछाली जा रही है, एक-दूसरे को बदनाम किया जा रहा है।

शिवा: आज के दौर में AI और डीपफेक ने पत्रकारिता के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। किसी वीडियो को पहली नजर में देखकर यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि वह असली है या बनाया गया है। ऐसे में न्यूज़ रूम और पत्रकारों के लिए यह खतरा कितना बड़ा है?

इंद्रजीत: बहुत बड़ी चुनौती है और भविष्य में ये चुनौती और बड़ी बनेगी। क्योंकि डीपफेक को पकड़ना मुश्किल है। एकदम असली लगता है, पहली नजर में। और कितनी वीडियो लैब में आएंगी? सारे तो नहीं आ सकते ना।

शिवा: अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ गलत फोटो या गलत वीडियो का इस्तेमाल किया जा रहा हो, तो क्या फॉरेंसिक के जरिए यह साबित किया जा सकता है कि वह फोटो या वीडियो गलत या manipulated है? और क्या इसी वजह से फॉरेंसिक जर्नलिज्म में भविष्य की संभावनाएँ बढ़ रही हैं?

इंद्रजीत: अगर गलत वीडियो और गलत फोटो लगाकर आपके खिलाफ कोई कुछ कर रहा है, तो उस फोटो को प्रूफ किया जा सकता है कि ये गलत है। इसलिए इसमें ग्रोथ है। क्योंकि बुरी चीजें समाज में बढ़ रही हैं। बुरी चीजें बढ़ रही हैं, इसलिए बुरी चीजों को रोकने की डिमांड भी बढ़ेगी। The simple logic is that. फॉरेंसिक जर्नलिज्म को एक नए कोर्स के रूप में देखा जा रहा है। हमने भी फॉरेंसिक जर्नलिज्म का एक कोर्स यहाँ शुरू किया है।

शिवा :आपको यूनाइटेड नेशंस से ऑफिस ऑफ ड्रग एंड क्राइम से एडवांस सर्टिफिकेट मिला है। भ्रष्टाचार को उजागर करने में इसका क्या फायदा है?

इंद्रजीत: कहीं भी जब संस्थागत, इंस्टीट्यूशनल भ्रष्टाचार होता है—तो वो ऑर्गेनाइज्ड क्राइम होता है। अब एक उदाहरण के तौर पे। एक स्टोरी ऐसे ही नहीं रुक जाती है, ऐसे ही नहीं चल जाती है। ऑर्गेनाइज्ड है ना वो? रिपोर्टर लाया। रिपोर्टर को कहा गया होगा कि इसका—इसके कपड़े फाड़ो। वो गया, लाया। डेस्क वाला शामिल है, एडिटर शामिल है। अगर भ्रष्टाचार होता है, तो ये ऑर्गेनाइज्ड भ्रष्टाचार है। ऑर्गेनाइज्ड भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए,क्योंकि ये जो पढ़ाई हमने की है, जो सर्टिफिकेशन हमने लिया है ये ऑर्गेनाइज्ड क्राइम का लिया है। उसकी इन्वेस्टिगेशन कैसे होनी चाहिए!तो ये बहुत मददगार है। इसी ऑर्गेनाइज्ड क्राइम को पकड़ना।

शिवा:तो किस प्रकार आप अपराधी को पकड़ लेते हैं।

इंद्रजीत:बहुत आसान है अपराधी को पकड़ना। अगर आपने अपराध को समझ लिया तो ये उतना ही आसान है जितना खाना खाना। इससे ज्यादा मुश्किल नहीं। अगर आप अपराध को समझ रहे हैं और आपको फॉरेंसिक साइंस पता है, तो कपड़ा कोई दूसरा फाड़ेगा, उसके फटने, उसके फाइबर का डाइमेंशन अलग होगा। आप खुद फाड़ोगे तो अलग होगा।

शिवा: आपने फॉरेंसिक साइंस में मास्टर और पीएचडी करने के बाद लैब में जाने के बजाय मीडिया को क्यों चुना?

इंद्रजीत: देखिए, मीडिया में हम ज्यादा लोगों की सेवा कर सकते थे। हम अपनी बात, अपनी नॉलेज और वेरिफाइड चीजों को ज्यादा बड़ी आबादी तक ले जा सकते थे। इसलिए हमने लैब के बजाय मीडिया को चुना। और मीडिया में मेरा आना भी, जैसा मैंने आपको बताया, एक तरह से एक्सीडेंट था। मैं संपादक से मिलने गया और मैंने उनसे कह दिया कि आप लोग जो कर रहे हैं, वो बेकार है, आप लोग गधे हैं। उसके बाद जो हुआ, वो आपने सुना ही है। तो मैं बाय चॉइस मीडिया में नहीं आया था। ये डेस्टिनी थी, जो मुझे मीडिया में लेकर आई। ऐसा नहीं था कि मैं बहुत पैशनेट था कि मुझे मीडिया में ही आना है और यही करना है। ये एक तरह से डेस्टिनी थी।

शिवा: आप एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के सदस्य भी रहे हैं। उस दौरान मीडिया की साख बचाने और पत्रकारिता में जरूरी बदलावों को लेकर आपने क्या बातें उठाईं?

इंद्रजीत: एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया में जितने भी संपादक हैं, उनका एक संगठन है। उसकी मीटिंग होती थी, छह महीने, आठ महीने में। अलग-अलग मीटिंग होती थीं,। उस समय मैं अपनी बात कहता था कि भाई, देखो, साख बचानी है तो हम लोगों को कुछ कदम उठाने पड़ेंगे। क्योंकि मैं तब एबीपी में संपादक बन चुका था। मैं कहता था कि अगर पत्रकारिता की साख बचानी है, तो हम लोगों को सिस्टम में बदलाव करना पड़ेगा।

शिवा: अक्सर देखा जाता है कि मीडिया या पुलिस की जल्दबाजी के कारण क्राइम सीन पर मौजूद सबूत नष्ट या दूषित हो जाते हैं। एक फॉरेंसिक विशेषज्ञ के तौर पर आप इसे कितना गंभीर मानते हैं और इससे बचने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

इंद्रजीत: इसके लिए अवेयरनेस होनी चाहिए। मीडिया को भी ये समझना चाहिए कि क्राइम सीन न्याय दिलाने का सबसे बड़ा इंस्ट्रूमेंट है। अगर आपने उसको कंटैमिनेट कर दिया, उसे दूषित कर दिया, उसे खराब कर दिया, तो कभी भी सच बाहर नहीं आएगा।

आरुषी केस इसका जीता-जागता उदाहरण है। वहाँ क्राइम सीन इतना पॉल्यूट हो चुका था कि बाद में बहुत सारी चीज़ों का वैज्ञानिक तरीके से पता लगाना मुश्किल हो गया। वहाँ लोग आ रहे थे, मीडिया आ रही थी। अब आप फुटप्रिंट किसके पहचानोगे? वहाँ तो भीड़ जा रही है। किसी का सलाइवा गिरा होगा, कितने लोगों को छींक आई होगी, कितने लोगों के बाल गिरे होंगे—आप कैसे तय करेंगे कि इनमें से कौन-सा सबूत अपराधी का है?

इसलिए क्राइम सीन को कंटैमिनेट नहीं होना चाहिए। इसके लिए अवेयरनेस भी होनी चाहिए और कानून तथा प्रोटोकॉल भी होने चाहिए। जब तक इन्वेस्टिगेशन चलेगी, तब तक एक तय प्रोटोकॉल होना चाहिए।

इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर भी फॉरेंसिक कलेक्शन के बाद ही अंदर जाए। पुलिस भी अनावश्यक रूप से अंदर नहीं जा सकती। पहले फॉरेंसिक टीम सारे एविडेंस को सिक्योर करे, उसके बाद दूसरे लोग वहाँ जाएँ।

मीडिया को भी ये समझना चाहिए कि क्राइम सीन ही वह साधन है, जो दोषी तक पहुँचने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकता है।

क्राइम सीन से जुड़ी एक बहुत महत्वपूर्ण थ्योरी है, जिसे लोकार्ड की एक्सचेंज प्रिंसिपल (Locard’s Exchange Principle) कहते हैं। इसका मूल सिद्धांत है कि जब भी कोई व्यक्ति किसी क्राइम सीन के संपर्क में आता है, तो वह अपने साथ कुछ लेकर आता है और वहाँ से जाते समय कुछ न कुछ पीछे छोड़ जाता है। इसी तरह के सूक्ष्म भौतिक साक्ष्यों की तलाश फॉरेंसिक टीम करती है।

अब वहाँ जितने ज़्यादा लोग आएँगे, उतनी ही ज़्यादा चीज़ें वे अपने साथ लेकर आएँगे और वहाँ छोड़कर जाएँगे। चाहे वो धूल के कण हों, सलाइवा हो, बाल हों या फिंगरप्रिंट। इस तरह क्राइम सीन कंटैमिनेट हो जाता है।

इसलिए क्राइम सीन का प्रोटेक्शन बहुत ज़रूरी है। अगर क्राइम सीन खराब हो गया, तो फिर यह पता लगाना भी मुश्किल हो सकता है कि वास्तव में वहाँ क्या हुआ था और अपराध किसने किया। इसलिए क्राइम सीन का संरक्षण सबसे बेसिक और सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है।

शिवा: जब आप किसी हाई-प्रोफाइल मर्डर या गंभीर अपराध के क्राइम सीन पर फॉरेंसिक एक्सपर्ट के तौर पर पहुँचते हैं, तो आपकी शुरुआती नजर किन चीजों पर जाती है?

इंद्रजीत: सबसे पहले ये समझने की कोशिश की जाती है कि क्राइम कैसे हुआ होगा। एक तरह का हाइपोथेसिस क्रिएट किया जाता है—कि अपराधी इधर से आया होगा, इधर से गया होगा, यहाँ ये हुआ होगा, यहाँ ये चीज गिरी होगी। क्राइम सीन पर जो भी चीजें मौजूद हैं, उनको देखकर संभावित घटनाक्रम समझने की कोशिश की जाती है। लेकिन ये सिर्फ शुरुआत होती है। उसके बाद हर चीज को वैज्ञानिक तरीके से एग्जामिन और वेरिफाई किया जाता है।

शिवा: आपने लंबे समय तक पत्रकारिता की है और फॉरेंसिक को पत्रकारिता से जोड़ने का काम भी किया। आपको क्या लगता है कि आज पत्रकारिता में सबसे बड़ी कमी कहाँ है?

इंद्रजीत: Mis­information is fatal. अगर आपने देश के लोगों को वैज्ञानिक रूप से गलत तथ्य बता दिए, तो उसका नुकसान बहुत बड़ा हो सकता है। फॉरेंसिक जनरल लॉजिक नहीं है, ये साइंटिफिक अप्रोच है।

मैंने जिस भी चैनल में काम किया, वहाँ फॉरेंसिक को पत्रकारिता में इस्तेमाल करने की कोशिश की। एबीबी न्यूज़ ने देश की पहली फॉरेंसिक सीरीज बनाई थी—”फॉरेंसिक फाइल्स”। करीब 20-22 एपिसोड की ये एक हाई-वैल्यू सीरीज थी। हम लोग बहुत सारी स्टोरीज़ में फॉरेंसिक का इस्तेमाल करते थे और उसके इंटरप्रिटेशन को दर्शकों को समझाते थे।

लेकिन एक बात समझनी होगी कि जनरल लॉजिक और फॉरेंसिक साइंस में बहुत अंतर है। कई बार जनरल लॉजिक के हिसाब से कोई बात पूरी आवाम को सही लग सकती है, लेकिन वह वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होती। अगर जनरल लॉजिक ही फॉरेंसिक साइंस होता, तो फॉरेंसिक पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती। सारे लोग फॉरेंसिक एक्सपर्ट होते।

इसलिए जनरल रिपोर्टिंग और स्पेशलाइज्ड रिपोर्टिंग में बहुत अंतर है। मेरा मानना है कि जो स्पोर्ट्स को कवर करे, उसे खेल की अच्छी समझ होनी चाहिए। जो पॉलिटिक्स कवर करे, उसे पॉलिटिकल साइंस की जानकारी होनी चाहिए। जो क्राइम को कवर करे, उसे फॉरेंसिक और क्रिमिनलिस्टिक्स की समझ होनी चाहिए। जो साइंस को कवर करे, उसकी साइंस में पढ़ाई होनी चाहिए।

ये क्या बना रखा है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी विषय को कवर कर रहा है? फैशन को कवर करने वाला व्यक्ति फैशन के बारे में जानता हो, डिफेंस कवर करने वाला व्यक्ति डिफेंस को समझता हो।

आप सोचिए, इससे लोगों को कितना बड़ा पर्सपेक्टिव मिलेगा। क्योंकि लोग आपकी बात सुनते हैं और उस पर भरोसा करते हैं। आज समस्या यही है कि एक्सपर्टाइज नहीं है। जिस क्षेत्र को कवर करने वाला व्यक्ति है, उसे उस क्षेत्र की अच्छी जानकारी होनी चाहिए। तभी वह सही बात दर्शकों तक पहुँचा पाएगा।

मान लीजिए किसी को लॉ कवर करना है, तो लॉ की पढ़ाई किए हुए व्यक्ति को रखिए। जरूरी नहीं कि उसने प्रैक्टिस की हो, लेकिन उसे बेसिक नॉलेज तो होगी। वह उस विषय की रिपोर्टिंग ज्यादा अच्छे से कर पाएगा।

मेरा पॉइंट यही है कि जिस क्षेत्र का आदमी है, जिस क्षेत्र को रिपोर्ट करना है, उसे उस क्षेत्र की समझ भी होनी चाहिए।

शिवा: मीडिया की साख लगातार गिर रही है। पत्रकारिता पर लोगों का भरोसा वापस लाने का रास्ता क्या है? क्या आपको लगता है कि मीडिया को अपनी साख बचाने के लिए सबसे पहले इस विशेषज्ञता की समस्या को दूर करना होगा?

इंद्रजीत: मीडिया ने अपना कबाड़ा खुद किया है। सबसे पहले काबिल लोग चाहिए। जिस क्षेत्र की रिपोर्टिंग कर रहे हैं, उस क्षेत्र की जानकारी होनी चाहिए। आप साइंस कवर कर रहे हैं तो साइंस पढ़िए। क्राइम कवर कर रहे हैं तो फॉरेंसिक पढ़िए। कानून कवर कर रहे हैं तो कानून की जानकारी रखिए।

सिर्फ पत्रकार होने से आप उस विषय के एक्सपर्ट नहीं हो जाते। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि जिस क्षेत्र की रिपोर्टिंग करनी है, उस क्षेत्र की अच्छी जानकारी रिपोर्टर को होनी चाहिए। तभी वह सही बात दर्शकों तक पहुँचा पाएगा।

आज जरूरत स्पेशलाइज्ड जर्नलिज्म की है। लोग आपकी बात सुनते हैं, आप पर भरोसा करते हैं। अगर आपके पास खुद उस विषय की जानकारी नहीं है और आप लोगों को ज्ञान बाँट रहे हैं, तो समस्या वहीं से शुरू होती है।

मीडिया को अपनी साख बचानी है तो काबिल और विशेषज्ञ लोगों को आगे लाना होगा। वरना उसने अपना भरोसा जिस तरह खुद खत्म किया है, उसे वापस पाना मुश्किल होगा।

मीडिया के पास अपनी साख बचाने का यही एक तरीका है कि वह स्पेशलाइज्ड लोगों को लाए। स्पोर्ट्स के लिए स्पोर्ट्समैन को रखिए। साइंस के लिए साइंस में पोस्टग्रेजुएट या डॉक्टरेट लोगों को रखिए। डिफेंस कवर करना है तो एक्स-आर्मी या डिफेंस स्टडीज़ की समझ रखने वाले व्यक्ति को रखिए।

आज जर्नलिस्टों की साख जिस तरह पानी में गिर चुकी है, उसकी एक वजह ये भी है कि आपने विशेषज्ञता को महत्व नहीं दिया।

लेकिन एक व्यक्ति अकेले इस पूरे सिस्टम को नहीं बदल सकता।

शिवा: आपने खुद इस बदलाव के लिए क्या प्रयास किए?

इंद्रजीत: जितना मैं कर सकता था, उतना मैंने कंट्रीब्यूट किया। मैं एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का मेंबर रहा हूँ और वहाँ भी मैंने इन मुद्दों को उठाया है। और उस कंट्रीब्यूशन के बदले सोसाइटी ने मुझे बहुत कुछ दिया है। भाई, दुनिया में लंबे समय तक सर्व करने वाले फॉरेंसिक जर्नलिस्ट और भारत के पहले फॉरेंसिक जर्नलिस्ट के तौर पर जो सम्मान मुझे मिला, वह ब्रिटिश पार्लियामेंट में मिला। इस प्रोफेशन ने भी मुझे बहुत कुछ दिया है। लेकिन अब एक आदमी एक चैनल में जाकर या दो चैनलों में रहकर कितना बदलाव कर सकता है? एक सिस्टम बदलना पड़ेगा। एक व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता। संस्थागत स्तर पर बदलाव जरूरी है।

शिवा: जब आप कहते हैं कि सामान्य पत्रकारिता और विशेषज्ञ पत्रकारिता में अंतर है, तो वह अंतर किस तरह का है?

इंद्रजीत: देयर इज़ अ लॉट ऑफ डिफरेंस बिटवीन जनरल रिपोर्टिंग एंड स्पेशलाइज्ड रिपोर्टिंग। मैंने कई फोरम पर ये बात कही है कि जिस क्षेत्र की रिपोर्टिंग करनी है, उसमें रिपोर्टर की पर्याप्त विशेषज्ञता और समझ होनी चाहिए।

जो स्पोर्ट्स कवर करे, उसे खेल की अच्छी समझ होनी चाहिए। जो पॉलिटिक्स कवर करे, उसे पॉलिटिकल साइंस और राजनीति की समझ होनी चाहिए। जो क्राइम कवर करे, उसे फॉरेंसिक और क्रिमिनलिस्टिक्स की जानकारी होनी चाहिए। जो साइंस कवर करे, उसकी साइंस में पढ़ाई होनी चाहिए। फैशन कवर करने वाले व्यक्ति को फैशन की अच्छी समझ होनी चाहिए।

आप सोचिए, इससे लोगों को कितना बड़ा पर्सपेक्टिव मिलेगा। लोग आपकी बात सुनते हैं और आप पर भरोसा करते हैं। लेकिन ये क्या बेवकूफी है कि किसी भी विषय की विशेषज्ञता न हो और फिर भी उसी विषय पर ज्ञान बाँटते रहें? कोई तो वजह है, जिसकी वजह से आज जर्नलिस्टों की साख पानी में गिर चुकी है।

मेरा मानना है कि जिस क्षेत्र की रिपोर्टिंग के लिए जो मैनपावर लगाया जा रहा है, उसे उस क्षेत्र की अच्छी जानकारी होनी चाहिए। तभी वह सही बात दर्शकों तक पहुँचा पाएगा।

अगर आप अपने चैनल में भर्ती कर रहे हैं और किसी व्यक्ति को किसी खास विषय की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी दे रहे हैं, तो उसे उस विषय में एक्सपर्टाइज विकसित करने का मौका भी दीजिए। क्योंकि वह व्यक्ति सामान्य पढ़ाई करके आया हो सकता है—बीए, बीएससी या कुछ और करके। लेकिन उससे मंगलयान पर विशेषज्ञ की तरह ज्ञान बाँटने की उम्मीद करना कितना तर्कसंगत है?

स्पोर्ट्स के लिए स्पोर्ट्स की समझ रखने वाले लोगों को रखिए। साइंस के लिए साइंस में पोस्टग्रेजुएट या डॉक्टरेट लोगों को मौका दीजिए। आर्मी या डिफेंस कवर करने के लिए एक्स-आर्मी या डिफेंस स्टडीज़ की समझ रखने वाले व्यक्ति को रखिए।

यही स्पेशलाइज्ड जर्नलिज्म है और आज मीडिया को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

शिवा: आपके 24 साल के करियर में फॉरेंसिक की मदद से सुलझाया गया सबसे चुनौतीपूर्ण और उलझा हुआ केस कौन-सा रहा?

Man with glasses in a light striped shirt stands in front of shelves filled with trophies, plaques, and books.
इंद्रजीत राय

इंद्रजीत: एक केस था वाराणसी का संभाषणी कांड। बनारस में एक प्रसिद्ध कांड हुआ था, संभाषणी कांड। इसमें पाँच-छह अबला लड़कियों का मर्डर हुआ था और जिनके मर्डर के आरोप में 12-13 लोगों को कन्विक्शन हो गया था। इस केस को हम लोगों ने उठाया और पता चला कि जिन 12-13 लोगों पर मर्डर का आरोप था, वो मर्डर वाली सारी लड़कियाँ जिंदा हैं। पुलिस ने दिखाया कि इनको पहले मारा, फिर इनको जलाया और राख गंगा में बहा दी। गवाह सारे थे, गवाह तैयार कर लिए गए। लेकिन जब हमने इस केस को इन्वेस्टिगेट किया तो पता चला कि वो लड़कियाँ मरी ही नहीं थीं। किसी को पाँच साल, किसी को आठ साल, किसी को दस साल की सजा हुई थी। ये एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण और अनोखा केस था। ये साला कोई मरा ही नहीं और उसके मरने के आरोप में इतने लोग जेल में हैं और ट्रायल में सजा भी हो गई है। इस केस की पूरी स्टोरी बहुत फेमस हुई थी और वो यूट्यूब पर भी पड़ी है।

शिवा: डिजिटल फॉरेंसिक पारंपरिक फॉरेंसिक से कितनी अलग और कितनी चुनौतीपूर्ण है? क्योंकि आजकल साइबर क्राइम और डिजिटल फ्रॉड बहुत बढ़ गए हैं।

इंद्रजीत: डिजिटल फॉरेंसिक इस समय सबसे बड़ा हथियार है। डिजिटल दुनिया में आप कुछ भी मिटा नहीं सकते। हर अपराध का गुनाह किसी न किसी फॉर्म में डिजिटल दुनिया में रहेगा। आज दुनिया की जितनी भी पॉपुलेशन है, उसके लगभग 70 प्रतिशत लोगों के हाथ में मोबाइल फोन है। वो डिजिटली कनेक्टेड हैं। इसलिए अपराध को ढूंढने में ये डिजिटल मीडियम बहुत इंपॉर्टेंट होते हैं। डिजिटल मीडियम का प्रिंसिपल ये है कि डिजिटल दुनिया में आप पूरी तरह से कंप्लीट कुछ नहीं मिटा सकते। आप फिंगरप्रिंट तो ग्लव्स पहनकर मिटा लोगे, लेकिन डिजिटल दुनिया से आप नहीं मिटा पाओगे।

शिवा: आज फॉरेंसिक जर्नलिज्म के सामने डीपफेक जैसी नई तकनीकों से किस तरह की चुनौतियाँ पैदा हो रही हैं?

इंद्रजीत: डीपफेक में जैसे फोटो एआई से जनरेट की जाती है, वैसे ही वीडियो भी जनरेट हो रही है। अब मान लीजिए कल को किसी ने सीसीटीवी का वीडियो जनरेट कर दिया और उसमें आपको किसी की हत्या करते हुए दिखा दिया। ऐसा भी हो सकता है, क्योंकि टेक्नोलॉजी बढ़ रही है। अब अगर ऐसा वीडियो किसी टीवी चैनल को भेज दिया गया तो टीवी चैनल वाले कितने काबिल हैं, आप जानती हैं। रिपोर्टर कहेगा, “ओए सर, सीसीटीवी मिल गया!” डेस्क पर जो बैठा है, कहेगा, “लगाओ ब्रेकिंग!” और ब्रेकिंग चलने लगेगी। तो ये बहुत बड़ी चुनौती है और भविष्य में ये चुनौती और बड़ी बनेगी। क्योंकि डीपफेक को पकड़ना मुश्किल है। पहली नजर में एकदम असली लगता है। और कितने वीडियो लैब में आएंगे? सारे तो चेक होने नहीं आ सकते। तो मतलब ये तबाही है। अगर इसका गलत इस्तेमाल हुआ, तो ये ऐसी तबाही होगी जिसे रोकना मुश्किल होगा।

शिवा: फॉरेंसिक जर्नलिज्म को नए कोर्स के रूप में देखा जा रहा है। इस फील्ड में आने वाले युवा पत्रकारों को आप क्या सलाह देंगे?

इंद्रजीत: हमने भी फॉरेंसिक जर्नलिज्म का एक कोर्स यहाँ शुरू किया है। एडवांस डिप्लोमा है। फीस हमने रीजनेबल रखी हैं। युवा पत्रकारों को मैं यही सलाह दूँगा कि आप पढ़िए। आपने भले कोर्स न किया हो, आपके पास किताबें उपलब्ध हैं, इंटरनेट पर साधन उपलब्ध हैं। आप कोई भी चीज कहने से पहले उसकी रीजनिंग को देखिए। अगर आप क्राइम कवर कर रहे हैं, तो फॉरेंसिक साइंस को पढ़िए। अब आपको पढ़ने के लिए कहीं एडमिशन लेने की जरूरत नहीं है। आपके मोबाइल में ही सब कुछ है। लेकिन दिक्कत ये है कि आप पूरा दिन तो रील में गुजार देते हैं। फटे हुए कपड़े की फाइबर एनालिसिस होती है। उससे पता लगाया जा सकता है कि कपड़ा कैसे फटा—खींचने से, संघर्ष में या किसी और तरीके से। यानी अपराध को समझिए और फिर उसके पीछे मौजूद वैज्ञानिक साक्ष्यों को देखिए। तब अपराधी को पकड़ना मुश्किल नहीं रहता।

शिवा :अंडरवर्ल्ड, टेरर फंडिंग या नारकोटिक्स से जुड़े मामलों की फॉरेंसिक जांच या रिपोर्टिंग करते समय एक पत्रकार को किस तरह के खतरे और दबाव का सामना करना पड़ता है?

इंद्रजीत: दबाव एक हाइपोथेटिकल शब्द है। अगर आपने किसी को यह एक्सेस ही नहीं दिया कि वह आपको फोन करके कह सके कि यह स्टोरी करो या यह मत करो, तो वह ऐसा कैसे करेगा?

मेरे पूरे मीडिया करियर में आज तक किसी ने मुझे दबाव में लेने की कोशिश नहीं की। किसी ने मुझे नहीं कहा कि यह स्टोरी करो या यह मत करो।

अपराधी अक्सर आपको मनोवैज्ञानिक तौर पर डराने की कोशिश करता है। वह आपको यह महसूस कराता है कि आपको खतरा है। लेकिन अगर आप अपना काम सही तरीके से कर रहे हैं, तो यह डर आप पर हावी नहीं होना चाहिए।

मेरा मानना है कि अगर आप यह काम कर रहे हैं और ‘दबाव’ या ‘खतरा’ जैसे शब्द आप पर हावी होने लगे हैं, तो आप मनोवैज्ञानिक तौर पर पहले ही हार चुके हैं। अगर आपको लगता है कि आप उस व्यक्ति से डर गए हैं, तो आपको तुरंत यह काम छोड़ देना चाहिए।

यही चीज़ पुलिस, जज और वकील के साथ भी होती है। जज को भी खतरा हो सकता है, वकील को भी हो सकता है और पुलिस को भी हो सकता है। लेकिन यह डर आपके काम को तय नहीं कर सकता।

मैंने बहुत सारे केस किए हैं, बहुत सारे स्टिंग ऑपरेशन किए हैं—कई मंत्रियों के खिलाफ और कई गैंगस्टर्स के खिलाफ भी। मुझे कभी कोई फोन नहीं आया, क्योंकि मैंने अपना काम ईमानदारी से किया।

अगर आप किसी के साथ गलत करेंगे, उसके खिलाफ झूठे सबूत प्लांट करेंगे या जानबूझकर उसे फँसाने की कोशिश करेंगे, तो खतरा पैदा हो सकता है। लेकिन अगर आप फेयर हैं और अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं, तो कोई आपका दुश्मन क्यों बनेगा?

जिंदगी कितने दिन की है, यह अपराधी तय नहीं करेगा। यह हमारे हाथ में नहीं है। इंसान को अपना काम ईमानदारी और निर्भीकता से करना चाहिए।

शिवा: लाइ डिटेक्टर टेस्ट और नार्को एनालिसिस की विश्वसनीयता पर अक्सर सवाल उठते हैं। एक एक्सपर्ट के तौर पर आप इन्हें किस नजर से देखते हैं?

इंद्रजीत:नार्को और लाइ डिटेक्टर एविडेंस नहीं हैं। ये इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी को इंफॉर्मेशन लेने के साधन हैं। ये न पहले एविडेंस थे, न अब एविडेंस हैं और न आगे एविडेंस बनेंगे। ये सबूत नहीं बन सकते। हाँ, ये इन्वेस्टिगेटर को कुछ जानकारी दे सकते हैं। लेकिन उस जानकारी को बाकी चीजों के साथ मैच कराना होता है। उसके बाद दूसरे साक्ष्यों से उसकी पुष्टि करनी होती है। इसलिए नार्को या लाइ डिटेक्टर को अपने आप में सबूत नहीं माना जा सकता।

शिवा: कॉर्पोरेट जगत में डेटा चोरी, वित्तीय धोखाधड़ी और इंटरनेशनल फ्रॉड जैसे मामलों में प्राइवेट फॉरेंसिक लैब्स की मांग कितनी बढ़ रही है?

इंद्रजीत: बहुत ज्यादा बढ़ी हुई है। हमारे पास लगातार केस आ रहे हैं। रोज केस आते हैं। जिस समय हम लोग बैठे हैं, कम से कम दस केस पर काम हो रहा है। तो डिमांड बहुत बढ़ी है।

शिवा: सालों तक मर्डर, सुसाइड और डार्क क्राइम सीन को करीब से देखते रहने का मानसिक असर नहीं होता? आप खुद को इस नेगेटिविटी से कैसे बचाते हैं?

इंद्रजीत: जब कोई भी बुरी चीज या अच्छी चीज आपका काम बन जाती है, तो उस काम को लेकर आपकी सेंसिटिविटी बदल जाती है। जैसे किसी आम आदमी को कह दिया जाए कि यहां किसी को काटना है, तो वह नहीं कर पाएगा। लेकिन डॉक्टर के लिए वही उसका काम है। वह आराम से कट करता है, नली डालता है, टांका लगाता है और अपना काम करता है। उसी तरह मेरे लिए भी क्राइम सीन देखना मेरे काम का हिस्सा है। इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे बुरा नहीं लगता। बुरा लगता है। किसी आदमी का भाई मारा गया हो, किसी का बेटा मारा गया हो, किसी बुजुर्ग की जिंदगी भर की कमाई साइबर क्रिमिनल उड़ा ले गया हो और उसकी बेटी की शादी होनी हो—तो बुरा तो लगेगा ही। मैं भी इंसान हूं। लेकिन क्रिमिनल के लिए कोई सहानुभूति नहीं रहती। आपने अपराध किया है तो उसकी जिम्मेदारी आपको लेनी होगी। आपने किस मजबूरी में किया, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपके पास और रास्ते थे। अपराध करना ही रास्ता नहीं था।

शिवा: लेकिन कानून यह भी कहता है कि एक अपराधी को भी अपने बचाव का अधिकार है। उसे वकील करने और अपनी बात रखने का अधिकार है। इसे आप कैसे देखते हैं?

इंद्रजीत: बिल्कुल मिलना चाहिए। मान लीजिए उसने अपराध किया है, लेकिन पहले यह साबित तो करना होगा कि अपराध उसने ही किया है। बियॉन्ड रीजनेबल डाउट साबित होना चाहिए। अब मान लीजिए किसी निर्दोष आदमी को गलत फंसा दिया गया। पुलिस को पैसे देकर या किसी और तरीके से उसके खिलाफ सबूत तैयार कर दिए और आपने उसे सजा दे दी। सोचिए, ह्यूमैनिटी का क्या होगा। इसलिए जरूरी है कि उसको भी मौका दिया जाए, वह अपनी बात रखे। यही लॉ है और यही जस्टिस है। मैं किसी को चोरी करते हुए पकड़ भी लूं और सामने दिख रहा हो कि वह चोरी कर रहा है, फिर भी मैं उसे ऐसे ही सजा नहीं दूंगा। उसको भी अपनी बात रखने का मौका दूंगा। अदालत उसकी बात सुनेगी, सबूत देखेगी और उसके बाद फैसला होगा। अगर आप फेयर तरीके से नहीं चलते तो आप भी अपराधी हैं। अगर आपने किसी के साथ न्यायपूर्ण तरीके से व्यवहार नहीं किया तो फिर आप और अपराधी में अंतर क्या रह गया?

शिवा: अपराधियों की सोच को समझने में फॉरेंसिक साइंस एक इन्वेस्टिगेटर की किस तरह मदद करती है?

इंद्रजीत: फॉरेंसिक साइंस वो बताती है जो दिखता नहीं है। इन्वेस्टिगेटर को जो दिख रहा है, वह तो उसने देख लिया। अब जो नहीं दिख रहा है, उसको फॉरेंसिक दिखाती है। मान लीजिए मोबाइल में किसी ने कुछ डिलीट कर दिया, हार्ड डिस्क फॉर्मेट कर दी या अपनी ब्राउजिंग हिस्ट्री उड़ा दी। उसने सोचा कि अब कुछ बचा ही नहीं। फॉरेंसिक कहती है—ये देखो, ये था। जो चीज दिखाई नहीं देती, फॉरेंसिक उसको सामने लाती है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। और आज की डेट में जस्टिस सिस्टम के जितने एलिमेंट्स हैं—पुलिस हो, वकील हों या दूसरे जांच से जुड़े लोग—सबको फॉरेंसिक की जरूरत पड़ेगी। जज खुद जांच करने नहीं जाएगा। जांच इन्हीं माध्यमों से होगी। फॉरेंसिक आज जस्टिस सिस्टम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। इसलिए बचने का एक ही तरीका है—अपराध मत करो। नहीं तो बचना मुश्किल है। और युवाओं को भी यह समझना चाहिए कि एक अपराध से सिर्फ एक घर बर्बाद नहीं होता। एक अपराध होता है तो दो घर बर्बाद होते हैं। एक उस व्यक्ति का जिसके साथ अपराध हुआ और दूसरा उस अपराधी का, जिसने अपराध किया। अपराधी का परिवार भी उसकी कीमत चुकाता है।

शिवा: अगर किसी नागरिक को लगता है कि उसे गलत फंसाया गया है, पुलिस उसकी बात नहीं सुन रही है या उसके सबूतों को नजरअंदाज किया जा रहा है, तो क्या वह खुद अपने सबूतों की फॉरेंसिक जांच करा सकता है? क्या कानून उसे इसकी इजाजत देता है?

इंद्रजीत : बिल्कुल। आज देश में आपके पास यह सुविधा है कि आप एक नागरिक के तौर पर अपने किसी भी सबूत की फॉरेंसिक जांच करा सकते हैं। मान लीजिए आपने एफआईआर दर्ज कराई है, तो पुलिस आपकी तरफ से मिले सबूतों को सीएफएसएल या एफएसएल भेजकर सरकारी लैब से जांच करा सकती है। लेकिन अगर पुलिस आपकी बात नहीं सुन रही है, आपको लगता है कि आपको गलत फंसाया गया है, आप निर्दोष हैं, आपकी रिपोर्ट दर्ज नहीं हो रही है या आपके सबूतों को गलत बताया जा रहा है, तो आपके पास अपने सबूत की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच कराने का रास्ता है।

शिवा: यानी एक आम आदमी सीधे किसी प्राइवेट फॉरेंसिक लैब में जाकर अपने सबूत की जांच करा सकता है?

इंद्रजीत: बिल्कुल। लैबोरेटरी के जरिए। एक आम आदमी अपने एविडेंस को लेकर आ सकता है। उसका टेस्ट होगा और उसे फॉरेंसिक रिपोर्ट दी जाएगी। अब सवाल यह है कि रिपोर्ट मिल गई तो इससे केस कैसे जीतेगा? तो देखिए, अगर फॉरेंसिक रिपोर्ट आ गई, तो कोई यह कह सकता है कि रिपोर्ट गलत है या झूठी है। लेकिन जब फॉरेंसिक रिपोर्ट वैज्ञानिक तरीके से तैयार हुई है, तो उसे अदालत के सामने रखा जा सकता है। आप अदालत में जाकर कह सकते हैं—साहब, यह एविडेंस है और इसकी फॉरेंसिक रिपोर्ट यह है। कानून में इसका प्रावधान है। इसलिए एक कॉमन मैन के पास भी अपने बचाव का एक वैज्ञानिक रास्ता है। और इसका सबसे बड़ा फायदा निर्दोष आदमी को है। जो गलत है, वह तो फॉरेंसिक जांच कराने आएगा ही नहीं। अगर किसी ने अपराध किया है और उसे पता है कि फॉरेंसिक जांच हुई तो वह खुद फंस जाएगा, तो वह क्यों आएगा? लेकिन जो निर्दोष है, उसके लिए यह बहुत महत्वपूर्ण सुविधा है। आज चाहे कोई डोमेस्टिक वायलेंस से जूझ रहा हो, किसी तरह की प्रताड़ना का शिकार हो, या कोई प्रभावशाली व्यक्ति पुलिस पर दबाव डालकर किसी गरीब को परेशान कर रहा हो—ऐसे मामलों में फॉरेंसिक साइंस बहुत मदद कर सकती है। देश में अब ऐसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। लक्सर लैब के अलावा बेंगलुरु में ट्रुथ लैब और पुणे में भी फॉरेंसिक लैब जैसी सुविधाएं हैं। मेरा कहना यह है कि फॉरेंसिक जांच अब सिर्फ पुलिस या सरकारी एजेंसियों तक सीमित नहीं रह गई है। एक नागरिक भी कानून के मुताबिक अपने बचाव के लिए इसका इस्तेमाल कर सकता है।

शिवा: क्या कानून में ऐसा स्पष्ट प्रावधान है कि कोई व्यक्ति अपने बचाव के लिए सीधे फॉरेंसिक जांच करा सकता है?

इंद्रजीत: बिल्कुल। यह आपके बचाव का संवैधानिक अधिकार है। यह कोई आज का नया अधिकार नहीं है। अधिकार पहले से था, लेकिन पहले फॉरेंसिक इंफ्रास्ट्रक्चर इतना मजबूत नहीं था। आज हमारे पास ज्यादा टेस्ट की सुविधाएं हैं और ज्यादा विशेषज्ञता उपलब्ध है। हमारे पास मल्टीडिसिप्लिनरी एक्रेडेशन है और 21 अलग-अलग डोमेन में जांच की सुविधा है।

शिवा: 21 डोमेन यानी किस-किस तरह के सबूतों की जांच?

इंद्रजीत : जैसे कपड़े की जांच अलग डोमेन है, मोबाइल अलग है, ईमेल अलग है, फोन अलग है, राइटिंग अलग है। अलग-अलग तरह के एविडेंस के लिए अलग-अलग वैज्ञानिक जांच होती है।

शिवा: मानसिक प्रताड़ना के मामलों में भी क्या फॉरेंसिक जांच संभव है? मसलन, अगर कोई व्यक्ति लगातार मानसिक प्रताड़ना झेल रहा है तो क्या उसके भी फॉरेंसिक एविडेंस हो सकते हैं?

इंद्रजीत: बिल्कुल होते हैं। मेंटल प्रताड़ना होगी तो वह किसी न किसी तरीके से, किसी न किसी माध्यम या मोड से की जा रही होगी। फोन के जरिए हो सकती है, बातचीत के जरिए हो सकती है, किसी दूसरे डिजिटल माध्यम से हो सकती है। एविडेंस यह होगा कि प्रताड़ना किस तरीके से की गई, किस माध्यम से की गई और उसके क्या रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। अगर किसी व्यक्ति ने किसी घटना का वीडियो रिकॉर्ड किया है, कोई मैसेज है, फोन रिकॉर्ड है या कोई डिजिटल सामग्री है, तो उसका भी वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सकता है। यानी मानसिक प्रताड़ना दिखाई नहीं देती, इसका मतलब यह नहीं है कि उसके पीछे कोई एविडेंस नहीं हो सकता। सवाल यह है कि उस प्रताड़ना को किस माध्यम से किया गया और उस माध्यम में कौन-से वैज्ञानिक सबूत मौजूद हैं।

शिवा: प्राइवेट और सरकारी फॉरेंसिक लैब में काम करने के तरीके और टेक्नोलॉजी के स्तर पर क्या बड़ा अंतर है?

इंद्रजीत: फॉरेंसिक प्राइवेट लैब में भी अगर एक्रेडिटेशन है तो उसके लिए कुछ नियम होते हैं। सरकारी लैब भी अगर एक्रेडिटेड है तो उसके लिए भी वही नियम होते हैं। एक्रेडिटेशन के कुछ नियम होते हैं—आप इस टेस्ट को ऐसे करेंगे, इसकी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर ये होगी, इसमें इन प्रिंसिपल्स का इस्तेमाल करेंगे। हर चीज डिफाइंड होती है। और ये मेथड्स अथॉरिटीज द्वारा उनके वैलिडेशन के बाद डिफाइंड किए जाते हैं। जब भी आप किसी नियम-कायदे के फ्रेम में रहते हैं, तो आप ट्रांसपेरेंट रहते हैं और इफेक्टिव रहते हैं। इसलिए सरकारी या प्राइवेट—जो भी लैब एक्रेडिटेड है, वह बेहतर और ज्यादा भरोसेमंद रिजल्ट देती है। क्यों? क्योंकि वह एक निर्धारित नियम और प्रक्रिया के दायरे में काम करती है। यानी फर्क सरकारी या प्राइवेट होने से नहीं, बल्कि एक्रेडिटेशन से पड़ता है। सरकारी हो या प्राइवेट, अगर एक्रेडिटेड है तो वह एक नियम के दायरे में काम करेगी। नियम के दायरे में रहने वाली चीज भरोसेमंद और इफेक्टिव होती है। जो प्राइवेट लैब एक्रेडिटेड नहीं हैं, उनकी विश्वसनीयता पर शिवा उठता है।

शिवा: क्या भारत में प्राइवेट फॉरेंसिक रिपोर्ट्स को अदालतों में कानूनी सबूत के तौर पर स्वीकार किया जाता है।

इंद्रजीत: बिल्कुल। भारतीय साक्ष्य अधिनियम यानी बीएसए में इसका प्रावधान है। सेक्शन 39 और सेक्शन 63 में प्रावधान दिए गए हैं। अगर आप एक्सपर्ट कैटेगरी में हैं और प्राइवेट फॉरेंसिक लैबोरेटरी है, या आप एक्सपर्ट हैं और एक्सपर्ट की डेफिनेशन के क्राइटेरिया पर खरे उतरते हैं, तो कानून प्राइवेट और सरकारी में कोई फर्क नहीं करता। बशर्ते आपके पास वह योग्यता होनी चाहिए। अगर सरकारी लैब के पास भी वह योग्यता नहीं है, तो उसकी रिपोर्ट भी सिर्फ सरकारी होने के कारण स्वीकार नहीं होगी। सिंपल है। कानून इस मामले में स्पष्ट है।

शिवा: बीएनएस में हाल में हुए बदलाव के बाद गंभीर अपराधों में फॉरेंसिक जांच को अनिवार्य किया गया है। इसे आप ग्राउंड लेवल पर कितना व्यावहारिक मानते हैं?

इंद्रजीत: देखिए, देश में पूरा फॉरेंसिक इकोसिस्टम बनने में अभी समय लगेगा। हम पहली लैबोरेटरी हैं। पहली लैबोरेटरी मतलब, एक्रेडिटेड लैबोरेटरी हमारे अलावा कोई नहीं है। पूरे भारत में, मल्टी डिसिप्लिन में दूसरी कोई लैबोरेट्री नहीं है। हम लोगों से अपील करते हैं कि जो फॉरेंसिक के काम करने वाले प्रोफेशनल्स हैं, वे ज्यादा से ज्यादा लैबोरेटरीज खोलें और इस क्षेत्र में आएं। गंभीर अपराधों के करोड़ों केस दर्ज होते हैं और सरकारी लैबों की पेंडेंसी डेढ़-दो साल तक रहती है। इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करना होगा। अकेले सरकार यह नहीं कर सकती। प्राइवेट सेक्टर को भी इसमें आना होगा। नए कानून आने के बाद अभी दिक्कत है, क्योंकि उसके हिसाब से जितना इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, वह अभी हमारे पास नहीं है। लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना पड़ेगा।

शिवा: क्या हमारे देश में पुलिस बल को फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाने की आधुनिक ट्रेनिंग पर्याप्त मात्रा में मिल रही है, या अभी भी हम पारंपरिक तरीकों पर निर्भर हैं? फिंगरप्रिंट और डीएनए के अलावा ऐसी कौन-सी नई फॉरेंसिक तकनीकें हैं, जो आने वाले समय में अपराधियों को पकड़ने में गेम चेंजर साबित होंगी?

इंद्रजीत: अभी हम पारंपरिक तरीकों पर ही ज्यादा निर्भर हैं। बहुत काम करने की जरूरत है। पहले भी बहुत सारी तकनीकें थीं। डीएनए है, फिंगरप्रिंट है, फाइबर एनालिसिस है, हेयर एनालिसिस है, ब्लड स्पैटर एनालिसिस है, डिजिटल फॉरेंसिक्स है, मोबाइल फॉरेंसिक्स है, क्लाउड फॉरेंसिक्स है, ईमेल फॉरेंसिक्स है। इंक एनालिसिस है, कलर एनालिसिस है। रोड एक्सीडेंट फॉरेंसिक्स है, साइको फॉरेंसिक्स है, न्यूरो फॉरेंसिक्स है। तो पहले भी थीं और अब भी हैं। सब अपनी-अपनी जगह गेम चेंजर हैं। जहां फिंगरप्रिंट का इस्तेमाल होगा, वहां फिंगरप्रिंट होगा। जहां पॉलीग्राफ की जरूरत होगी, वहां पॉलीग्राफ होगा। जहां कोई फाइबर या धागा मिला है, वहां यह पता करना होगा कि वह धागा किस कपड़े का है। वहां फिंगरप्रिंट थोड़ी लगाएंगे। उसके लिए फाइबर एनालिसिस होगा। तो विज्ञान के पास हर चीज के लिए अपने साधन हैं। विज्ञान के पास हर चीज को साबित करने का तरीका है। पहले भी था, अब भी है और लगातार उसमें एडवांसमेंट हो रहा है। तकनीक लगातार और ज्यादा शार्प हो रही है और अपराधियों के लिए मेरा एक मैसेज जरूर दीजिएगा— अपराध करके बचने का एक ही तरीका है—अपराध ही मत करें। नहीं तो विज्ञान से आप बच नहीं पाओगे। कोई तरीका आपके पास नहीं बचेगा। चाहे जितना दिमाग लगा लो, जितनी जुगत लगा लो, कुछ भी कर लो—पता चल ही जाएगा। विज्ञान आपको पकड़ लेगा।

शिवा: लेकिन क्या कानून हमेशा अपराधी तक पहुंच पाता है?

इंद्रजीत: कानून के हाथ हैं। चाहे पुलिस हो, चाहे फॉरेंसिक साइंटिस्ट हो, चाहे वकील हों—ये सब लॉ के इंस्ट्रूमेंट्स हैं। लॉ जो भी करेगा, इन्हीं के जरिए करेगा। जज थोड़ी न खुद जांच करने जाएगा। जस्टिस सिस्टम के ये सारे एलिमेंट्स मिलकर काम करते हैं और उसमें फॉरेंसिक आज की तारीख में एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा हो चुका है। इसलिए बच नहीं पाओगे। बचने का सबसे आसान तरीका यही है—अपराध मत करो।

शिवा: आपके भीतर कहीं न कहीं मीडिया में आने की इच्छा रही होगी, तभी तो आप ज़ी न्यूज़ के संपादक से मिलने गए, क्या इसे आप डेस्टिनी कहेंगे?

इंद्रजीत: कहीं न कहीं आपके दिमाग में कुछ तो होता ही है। वरना मैं ज़ी न्यूज़ के एडिटर से मिलने क्यों गया था? कोई मुझे जबरदस्ती तो नहीं भेज रहा था। लेकिन आदमी बहुत जगह जाता है और बहुत लोगों से मिलता है, मगर कहीं एक जगह जाकर मामला फँस जाता है। वो जो भी है, डेस्टिनी होती है। बहुत सारे लोग साइंस में भी डेस्टिनी के कारण आते हैं। वो कहते हैं कि यार, डेस्टिनी में यही लिखा था।

शिवा: एक वैज्ञानिक और तर्कशील व्यक्ति के लिए अध्यात्म का क्या अर्थ है? क्या विज्ञान की अपनी सीमाओं के बाद किसी अनजानी शक्ति में विश्वास की गुंजाइश बचती है?

इंद्रजीत: Spirituality is not about God, Allah or Jesus. It is about the unknown power that knows everything।

वह पावर अस्तित्व में है या नहीं, आप नहीं जानते। लेकिन आप नहीं जानते, इसका मतलब यह थोड़ी है कि वह है ही नहीं। मैं अपनी 70-80 साल की जिंदगी में कितना जान लूँगा? मुझसे पहले जो लोग आए, उन्होंने भी अपनी 70-80 साल की जिंदगी में उतना ही जाना होगा। तो जो हम नहीं जानते, उसे कोई तो जानता होगा। हम उससे रिक्वेस्ट कर सकते हैं।

मौत होती है, सबकी होती है। अब क्यों होती है, इसका पूरा जवाब साइंस के पास भी नहीं है। साइंस शरीर के स्तर पर उसकी व्याख्या करती है—सेल्स, ऑर्गन्स और शरीर में होने वाली दूसरी प्रक्रियाओं के स्तर पर। लेकिन उसके आगे भी सवाल हैं। क्या आत्मा जैसी कोई चीज़ होती है? क्या जीवन सिर्फ शरीर तक सीमित है?

एक बच्चा जब माँ के गर्भ में होता है, तब वह उसी तरह सांस नहीं ले रहा होता, जैसे जन्म के बाद लेता है। उस समय उसके फेफड़े उसी तरह काम नहीं कर रहे होते जैसे जन्म के बाद करते हैं। उसका हार्ट काम कर रहा होता है, लेकिन ऑक्सीजन उसे अलग तरीके से मिल रही होती है। जैसे ही वह माँ के गर्भ से बाहर आता है, उसके शरीर की श्वसन प्रक्रिया एक नए तरीके से शुरू होती है।

तो जीवन और चेतना को लेकर अभी भी बहुत से ऐसे सवाल हैं, जिन्हें विज्ञान समझने और जानने की कोशिश कर रही है। साइंस भी एक सीमा तक ही जानती है। उससे पहले भी बहुत कुछ है और उसके बाद भी बहुत कुछ हो सकता है।

मेरा पॉइंट यह है कि इंटेलेक्चुअल व्यक्ति उस अनजान शक्ति के सामने एक तरह से रिक्वेस्ट करता है—देखो, मैंने अपना काम कर दिया है। बाकी अगर कुछ ऐसा है, जो तुम कर सकते हो, तो कर लो। I have done my job.

क्योंकि मेरे पास हर चीज़ करने की पावर नहीं है। अगर मैं किसी मरीज का हार्ट खोल रहा हूँ, तो मैं अपना काम पूरी ईमानदारी से करूँगा। लेकिन उसके बाद भी कुछ ऐसी चीज़ें हैं, जो मेरे हाथ में नहीं हैं। वहाँ मैं प्रे करूँगा कि देखो, मैंने अपना काम कर दिया है, अब बाकी तुम देख लो।

मेरे लिए स्पिरिचुअलिटी इसी तरह काम करती है। भगवान हो या कोई और शक्ति—जो भी हो। अगर कोई पावर है, भले ही उसकी संभावना आधे प्रतिशत की ही क्यों न हो, तो हम उससे रिक्वेस्ट करेंगे।

हम अपने सीनियर से भी तो कहते हैं—सर, मैंने यह काम कर दिया है, आप एक बार देख लीजिए। कोई गलती हो तो ठीक कर दीजिए। क्योंकि हमें लगता है कि वह हमसे ज्यादा जानता है।

उसी तरह, अगर कोई हमसे भी ज्यादा पावरफुल है, हमसे ज्यादा जानता है, तो उससे भी कह सकते हैं—भाई, मैंने अपनी तरफ से कर दिया, अब तुम देख लो।

यही मेरे लिए स्पिरिचुअलिटी है।

शिवा: मौत के बाद क्या है? क्या आत्मा या किसी दूसरी तरह के जीवन के अस्तित्व को आप मानते हैं?

इंद्रजीत: कोई तो इसे साबित करके दिखाता। आप 70-80 साल की जिंदगी में इसे पूरी तरह नहीं जान पाए। मौत होती है, सबकी होती है। अब क्यों होती है, इसका पूरा जवाब तो साइंस के पास भी नहीं है।

शरीर है, सेल्स हैं, नए सेल्स बन रहे हैं या नहीं बन पा रहे हैं—उसके पीछे भी तो कोई रीजन है। साइंस अपनी तरफ से जो कहती है, वह अपनी जगह है। लेकिन डेथ होती है, मौत तो होती ही है। आदमी मरता है।

मेरा पॉइंट यही है कि इंटेलेक्चुअल लोग उस अननोन पावर से एक रिक्वेस्ट करते हैं—देखो, मैंने अपना काम कर दिया है। अब बाकी जो कुछ आप कर सकते हो, कर लो। I have done my job, because I don’t have the power to do everything.

जब हम अपने से ज्यादा पावरफुल किसी इंसान से रिक्वेस्ट कर सकते हैं, तो यह क्यों नहीं मान सकते कि शायद हमसे भी ज्यादा पावरफुल कोई और शक्ति हो? उससे भी कह सकते हैं—देख लेना यार, मैंने अपनी तरफ से कर दिया है। अब बाकी तुम देखो।

शिवा : धन्यवाद सर!आपने इस दो घंटों के इंटव्यू के जरिए मुझे जो इंलाइटमेंट दी, उसे किसी कीमत पर खरीदा नहीं जा सकता है। साथ ही, विशेषज्ञ पत्रकारिता का कांसेप्ट भी अच्छे से समझ में आया। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

इंद्रजीत राय से 9450009011 या [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

इस इंटरव्यू का पहला पार्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें-

इंटरव्यू (पार्ट-एक) : जेल में घुसकर अमरमणि त्रिपाठी का स्टिंग करने वाले इंद्रजीत राय आजकल देश की पहली प्राइवेट फ़ारेंसिक लैब चला रहे हैं!

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