अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल में भारत की छवि को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। पत्रकार सदानंद धुमे ने प्यू रिसर्च सेंटर के जरिए तैयार इस रिपोर्ट में लिखा है कि- “सड़ते हुए कचरे के ढेर, यात्रियों से खचाखच भरी ट्रेनें और जलभराव वाली सड़कों पर आधी डूबी स्कूल बसें—सोशल मीडिया के दौर ने भारत की वैश्विक छवि के लिए बेहद मुश्किल हालात पैदा कर दिए हैं।”
नीचे पूरी रिपोर्ट हिंदी में पढ़ें-
नई दिल्ली। भारत की वैश्विक छवि को लेकर एक नए सर्वे ने चिंता बढ़ा दी है। प्यू रिसर्च सेंटर के ताजा सर्वे के मुताबिक 36 देशों में भारत को औसतन 45 फीसदी लोगों ने सकारात्मक नजरिए से देखा, जबकि 41 फीसदी लोगों की राय भारत के प्रति नकारात्मक रही। तीन साल पहले 23 देशों में हुए प्यू सर्वे में भारत के पक्ष में राय रखने वालों का प्रतिशत 46 था, जबकि नकारात्मक राय रखने वाले 34 फीसदी थे। यानी इस दौरान भारत के प्रति सकारात्मक और नकारात्मक राय के बीच का अंतर काफी कम हुआ है।
अमेरिका में भारत की लोकप्रियता में बड़ी गिरावट
अमेरिका में भारत की छवि को लेकर स्थिति और चिंताजनक नजर आती है। मौजूदा सर्वे में केवल 45 फीसदी अमेरिकी भारत के बारे में सकारात्मक राय रखते हैं, जबकि 50 फीसदी की राय नकारात्मक है। प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक ये आंकड़े 2008 के बाद भारत के प्रति अमेरिकियों की सबसे कमजोर रेटिंग में शामिल हैं। वर्ष 2008 में करीब दो-तिहाई अमेरिकी भारत को सकारात्मक नजरिए से देखते थे।
युवा अमेरिकियों में भारत के प्रति नकारात्मक राय और ज्यादा है। 18 से 29 वर्ष की उम्र के 56 फीसदी अमेरिकी भारत के बारे में नकारात्मक राय रखते हैं।
रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स में भी अंतर
सर्वे में भारत को लेकर अमेरिका की राजनीतिक सोच में भी अंतर सामने आया है। रिपब्लिकन और रिपब्लिकन की ओर झुकाव रखने वाले 55 फीसदी अमेरिकी भारत को नकारात्मक नजरिए से देखते हैं, जबकि 42 फीसदी की राय सकारात्मक है।
वहीं डेमोक्रेट्स और डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर झुकाव रखने वालों में 50 फीसदी भारत को सकारात्मक नजरिए से देखते हैं, जबकि 47 फीसदी की राय नकारात्मक है।
शिकागो विश्वविद्यालय के राजनीतिक वैज्ञानिक पॉल स्टैनिलैंड का कहना है कि जनमत सर्वेक्षणों के प्रभाव को अमेरिकी विदेश नीति पर जरूरत से ज्यादा नहीं आंकना चाहिए। हालांकि, किसी देश के प्रति जनता की धारणा मायने रखती है। उनके मुताबिक किसी नेता या अधिकारी के सामने यह सवाल हो सकता है कि वह किसी खास देश के पक्ष में राजनीतिक जोखिम उठाना चाहता है या नहीं।
भारत की छवि का असर अमेरिका-भारत रिश्तों पर पड़ सकता है
भारत की लगातार कमजोर होती छवि का असर अमेरिका और भारत के रिश्तों पर भी पड़ सकता है। लंबे समय से पश्चिमी यूरोप, पूर्वी एशिया और कनाडा जैसे पारंपरिक अमेरिकी सहयोगी देशों के साथ मजबूत रिश्तों के पीछे वहां की सकारात्मक जनभावना भी एक आधार रही है।
अगर भारत की वैश्विक छवि में गिरावट जारी रहती है तो अमेरिकी संसद में भारत के साथ संबंध मजबूत करने को लेकर मौजूद द्विदलीय सहमति भी कमजोर हो सकती है। इससे विकासशील देशों के बीच अमेरिका-भारत सहयोग बढ़ाने की दलीलों को भी नुकसान पहुंच सकता है।
क्वाड पर भी पड़ सकता है असर
भारत की छवि में गिरावट का असर क्वाड जैसे रणनीतिक समूह के प्रति जनसमर्थन पर भी पड़ सकता है। क्वाड में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।
ऑस्ट्रेलिया में भारत के प्रति सकारात्मक राय 2008 के 71 फीसदी से घटकर अब 44 फीसदी रह गई है, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। जापान क्वाड का एकमात्र ऐसा देश है जहां अभी भी भारत के प्रति स्पष्ट बहुमत सकारात्मक है। जापान में 55 फीसदी लोग भारत को सकारात्मक नजरिए से देखते हैं, हालांकि यह आंकड़ा भी 2012 के 70 फीसदी के उच्च स्तर से काफी नीचे है।
प्रधानमंत्री मोदी की छवि भी हुई कमजोर
प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के प्रमुख लेखक जैकब पाउश्टर के मुताबिक अमेरिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि में भी समय के साथ गिरावट आई है।
2018 में करीब 40 फीसदी अमेरिकियों को मोदी पर भरोसा था। इसके पांच साल बाद, मोदी के बारे में जानकारी रखने वाले अमेरिकियों में केवल करीब 20 फीसदी ने उन पर भरोसा जताया। वहीं करीब 40 फीसदी अमेरिकी ऐसे थे जिन्होंने कहा कि उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री के बारे में सुना ही नहीं है।
वामपंथ से लेकर MAGA समर्थकों तक आलोचना
अमेरिका में भारत को लेकर आलोचना राजनीतिक स्पेक्ट्रम के दोनों छोरों से सामने आ रही है। दक्षिणपंथी और MAGA समर्थक समूहों का एक हिस्सा भारत को अमेरिका में बड़ी संख्या में आने वाले प्रवासियों के स्रोत के तौर पर देखता है। अवैध प्रवास, अमेरिकी नौकरियों पर असर और सांस्कृतिक बदलाव जैसे मुद्दों को लेकर भारत की आलोचना की जाती है।
वहीं भारत में हिंदू राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव को लेकर अमेरिकी वामपंथी समूहों में भी असंतोष है। मुस्लिमों के साथ भेदभाव, इंटरनेट बंद किए जाने और सरकार के आलोचकों पर कार्रवाई जैसे मुद्दों को लेकर भारत की आलोचना होती रही है। भारतीय-अमेरिकी न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी भी हिंदू राष्ट्रवाद और प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना कर चुके हैं।
सोशल मीडिया ने भी बिगाड़ी भारत की तस्वीर
सर्वे के विश्लेषण में सोशल मीडिया को भी भारत की छवि के लिए एक चुनौती के तौर पर देखा गया है। भारत में ऑनलाइन ट्रोलिंग और आलोचकों के खिलाफ आक्रामक व्यवहार से देश की नकारात्मक छवि बनने की बात कही गई है।
इसके अलावा भारत के शहरों से जुड़े प्रदूषण, कचरे, भीड़भाड़, ओवरलोडेड ट्रेनों और बारिश में जलभराव जैसे वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होते हैं। ऐसे वीडियो भी विदेशों में भारत की शहरी व्यवस्था की नकारात्मक तस्वीर पेश करते हैं।
फिर भी यूरोप से भारत के लिए अच्छी खबर
हालांकि भारत की वैश्विक छवि को लेकर पूरी तस्वीर नकारात्मक नहीं है। ब्रिटेन में 71 फीसदी लोग भारत को सकारात्मक नजरिए से देखते हैं। 2023 में यह आंकड़ा 66 फीसदी था। जर्मनी में भी करीब दो-तिहाई लोग भारत को सकारात्मक रूप से देखते हैं, जबकि 2023 में यह आंकड़ा 47 फीसदी था।
फ्रांस में भी भारत के प्रति सकारात्मक राय बढ़ी है और पिछले तीन वर्षों में यह 11 अंक बढ़कर 50 फीसदी हो गई है। भारत और ब्रिटेन तथा यूरोपीय संघ के बीच हाल में हुए मुक्त व्यापार समझौतों का भी इस सकारात्मक बदलाव से संबंध हो सकता है।
सर्वे के मुताबिक भारत की वैश्विक छवि में गिरावट जरूर आई है, लेकिन इसे बदला जा सकता है। इसके लिए भारत को देश में रोजगार के अवसर बढ़ाने, शहरों की स्थिति सुधारने और वैश्विक स्तर पर अपनी छवि को बेहतर बनाने की दिशा में काम करना होगा। सबसे अहम सवाल यह है कि भारत की छवि में गिरावट क्यों आई और इसे पलटने के लिए क्या कदम उठाए जाएं।
हमारी सरकारों ने असली भारत की तस्वीरें छिपा रखी थीं। वे चमचमाते भारत की तस्वीरें दुनिया को दिखा रहे थे। लेकिन सोशल मीडिया के ज़रिए वे अब दुनिया के सामने हैं इसलिए भारत की ग्लोबल इमेज को बड़ा झटका लगा है।
अब लोग देख रहे हैं कि हमारी ट्रेन कैसी खचाखच भरी हुई हैं, गंदी हैं, जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे हैं और स्कूलों की हालत कितनी बदतर है।
अगर ये सरकार धांधलियों के ज़रिए चुनाव जीतती रही तो देश की हालत कभी नहीं सुधरेगी क्योंकि वह जवाबदेही को मानती नहीं है और हिंदू-मुसलमान करके सभी समस्याओं से ध्यान हटाने में लगी रहती है।
-मुकेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार


