देवप्रिय अवस्थी-
इधर मैं 31 मार्च 1991 को चौथा संसार से मुक्त हो गया, उधर प्नक्रिया संबंधी कुछ जटिलताओं के कारण नईदुनिया का विभाजन 1 अप्रैल 1991 को नहीं हो पाया. इस कारण मेरे सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया. संयोग से उसी दौरान रतलाम के नगर सेठ और युवा उद्यमी चेतन जैन इंदौर से एक नया अखबार शुरू करने जा रहे थे. इसके कर्ता-धर्ता दैनिक स्वदेश, इंदौर से जुड़े प्रकाश वोरा थे. उनके परिचित और चौथा संसार के बाल संसार परिशिष्ट के इंचार्ज लोकेंद्र चतुर्वेदी ने वोरा जी से मेरे बारे में बात की. उन्होंने मुझे प्रस्तावित अखबार से जोड़ने की पेशकश की. विकल्प के अभाव में मैंने यह पेशकश मान ली.
एक महीने से कुछ ज्यादा खाली बैठने के बाद मैं मई 1991 के शुरू में प्रस्तावित अखबार के कामचलाऊ दफ्तर जाने लगा. तब अखबार का नाम भी तय नहीं हुआ था. हालांकि संपादकीय विभाग में मेरे अलावा कुछ सहयोगियों की नियुक्ति हो चुकी थी. इनमें से विभूति शर्मा, दिनेश शर्मा और बाबा मायाराम के नाम मुझे याद रह गए हैं. अखबार के नाम के लिए विज्ञापन देकर सुझाव मांगे गए थे. कोई अच्छा नाम मिल जाए, इसके लिए प्रकाश वोरा के साथ मैं एक बार आररएनआई (रजिस्ट्रार आफ न्यूजपेपर्स फार इंडिया) के दिल्ली स्थित मुख्यालय भी गया. वहां से-चेतना- नाम के अखबार के टाइटल की उपलब्धता की जानकारी मिली. इस नाम से अखबार का पंजीकरण तो हुआ था, लेकिन अखबार निकल नहीं पाया था. वोरा जी ने टाइटिल के स्वामी से संपर्क कर उसके स्वामित्व के हस्तांतरण का आग्रह किया. बाद में कुछ कीमत चुकाकर यह टाइटल खरीद लिया गया.
चेतना के कामचलाऊ दफ्तर में कुछ दिन बैठने के बाद वहां के माहौल से मुझे आभास हो गया कि इस अखबार के प्रकाशन में कम से कम चार-छह महीने और लगने हैं. तब तक न तो छपाई मशीन के लिए आर्डर फाइनल हुआ था और न ही कंप्यूटर आदि की व्यवस्था हुई थी. दीगर है कि प्रेस कांप्लेक्स में-अपनी दुनिया-के प्लाट पर निर्माणाधीन बिल्डिंग का एक हिस्सा किराए पर लेने की बात तय हो गई थी.
मैं इतने लंबे समय खाली बैठने की मन:स्थिति में नहीं था. इसलिए नईदुनिया के राजेंद्र तिवारी से संपर्क रखकर उसके विभाजन की प्रक्रिया की प्रगति की जानकारी लेता रहता था. जून 1991 के उत्तरार्ध में यह प्रक्रिया पूरी होने को हुई तब राजेंद्र तिवारी एक दिन नईदुनिया का भ़ोपाल दफ्तर दिखाने और वहां के स्टाफ से परिचय कराने के लिए मुझे अपने साथ भोपाल ले गए. मेरे भोपाल जाने की भनक प्रकाश वोरा को मिल गईं. उन्होंने इस बाबत पूछताछ की तो मुझे बताना पड़ा कि चेतना के निकलने में अभी चार-छह महीने लगने हैं. मेरे लिए इतना लंबा इंतजार करना संभव नहीं है. इसलिए मैं चेतना से तुरंत मुक्त होना चाहूंगा. इस तरह चेतना में मेरी बहुत संक्षिप्त पारी पर विराम लग गया. चेतना 1991 का अंत होने तक नहीं निकल पाया था. उसका प्रकाशन जनवरी 1992 में शुरू हुआ और दो-ढाई साल में बंद भी हो गया. यह अखबार इंदौर के बाद कुछ दिन रतलाम में भी छपा.
उल्लेखनीय है कि मुझसे चेतना से जुड़ने की पेशकश वेदप्रताप वैदिक और बालकवि बैरागी ने भी की थी. दोनों ने एक शाम मुझे इंदौर के एक होटल में डिनर के लिए बुलाकर कहा कि आपको रतलाम चलना है, वहां हमारे एक मित्र अखबार निकाल रहे हैं. उसके संपादन की जिम्मेदारी आपको लेनी है. रतलाम जाने में मेरी जरा भी रुचि नहीं थी इसलिए मैंने इस पेशकश को मानने से विनम्रता से इनकार कर दिया. साथ ही, रतलाम के मूल निवासी देवकृष्ण व्यास को, जो कुछ समय पहले ही हिंदुस्तान, दिल्ली के सहायक संपादक पद से रिटायर हुए थे, वहां संपादक बनाने का सुझाव दिया. वैदिक जी और बैरागी जी दोनों व्यास जी से पहले से परिचित थे. उन्हें यह सुझाव भा गया. बाद में व्यासजी चेतना के संपादक बने भी.
चेतना के मालिक चेतन कश्यप बाद में रतलाम से विधायक और मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल के सदस्य भी बने. हालांकि मैं उनसे कभी भी नहीं मिला. चेतना मेरी 36 साल की पत्रकारिता यात्रा का सबसे छोटा पड़ाव था. यह एक ऐसा क्षेपक है जिसे चाहकर भी भुला नहीं पाता हूं.
जून 1991 के आखिरी सप्ताह में मैं अपनी नई जिम्मेदारी संभालने भोपाल पहुंच गया. स्वामित्व के बंटवारे के बाद अलग पहचान के लिए भोपाल संस्करण के नाम में दैनिक शब्द भी जोड़ दिया गया यानी अब वह दैनिक नईदुनिया था.
पिछला भाग…
मेरी पत्रकारिता यात्रा (9): अखबार के रूप में चौथा संसार की खासी पहचान बन जाने के बावजूद मुझे वहां भविष्य नहीं दिखता था, मैंने प्रभाष जी से नईदुनिया जाने की इच्छा जाहिर की…


