
देवप्रिय अवस्थी-
दैनिक नईदुनिया में पहला दिन ही यानी 1 जुलाई 1991 कड़ी परीक्षा का दिन बन गया. उस दिन संपादक मदनमोहन जोशी के अलावा केवल पांच-संपादकीय सहयोगी दफ्तर आए. बाकी ने छजलानी -सेठिया के स्वामित्व वाले नईदुनिया, इंदौर से जुड़ने को तरजीह दी.
हालांकि बंटवारे की शर्तों के मुताबिक भोपाल काम कर रहे सहयोगियों में से उमेश त्रिवेदी के अलावा सभी को तिवारी बंधुओं के स्वामित्व वाले दैनिक नईदुनिया में रहना था. तिवारी बंधुओं-राजेंद्र और सुरेंद्र तथा संपादक जोशी जी ने सहयोगियों के इस व्यवहार की कल्पना नहीं की थी.
आनन-फानन में नए सहयोगियों की तलाश शुरू हुई. कुछ घंटों में पूरा स्टाफ मिलना संभव नहीं था, फिर भी इतने साथी मिल गए कि अखबार निकाला जा सके. यह सभी पेजों पर काम करने के मेरे अनुभव की परीक्षा की घड़ी भी थी. दो-तीन साथियों की मदद से मुख्य डेस्क, खेल और व्यापार पेजों की खबरें तैयार करने की कमान मैंने संभाली. जिला संस्करणों की डेस्क पर ज्यादा समस्या नहीं थी क्योंकि उस पर तीन साथी -सरिता अरगरे, जयमंगल सिंह और साकेत दुबे बचे थे. संकट रिपोर्टिंग डेस्क पर था. वहां सिर्फ दो साथी- पूर्णेंदु शुक्ल और कृष्ण दत्त शर्मा थे. एक और रिपोर्टर रवींद्र कैलासिया उसी दिन अखबार से जुड़े थे. गनीमत थी कि नगर/प्रदेश पेज के लिए जन संपर्क विभाग और दूसरे संगठनों की ढेरों विज्ञप्तियां उपलब्ध थीं. फोटो कंपोजिंग और प्रिंटिंग विभागों का भी पूरा स्टाफ था. आखिरकार दैनिक नईदुनिया ने पहली सुबह देख ही ली.
बंटवारे के पहले सभी साप्ताहिक परिशिष्ट और संपादकीय पेज इंदौर में तैयार होते थे. राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, खेल और कारोबार पेजों की ज्यादातर सामग्री मोडम के जरिए इंदौर से आती थीं. यह सामग्री अब भोपाल में तैयार होनी थी. संपादक जोशी जी ने यह सामग्री तैयार करने के लिए कुछ अंशकालीन सहयोगियों/अनुवादकों को अखबार से जोड़ा था. इनमें रमेश दवे, इंदु प्रकाश कानूनगो, घनश्याम सक्सेना, ध्रुव शुक्ल प्रमुख थे. वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और बाद में सांसद रहे भगीरथ प्रसाद की लेखिका पत्नी मेहरुन्निसा परवेज महिला परिशिष्ट की और अहद प्रकाश बच्चों के परिशिष्ट के प्रभारी थे..
दो-तीन दिन में सभी पेजों के लिए जरूरी सहयोगियों की नियुक्ति हो गई. रिपोर्टिंग टीम में दिनेश जोशी की वापसी बड़ी उपलब्धि थी. उनके अलावा सिद्धार्थ खरे, चंदा बारगल, राघवेंद्र सिंह, पुष्पेंद्र सोलंकी, संजय रायजादा, आरिफ मिर्जा भी इस टीम में जुड़े. सिंधी बहुल बैरागढ़ की खबरें गोपी बलवानी लिखते थे. जिला संस्करणों की डेस्क पर नरेंद्र गौड़ और साधना सिंह/पाठक नए साथी थे.
प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात राजेश बादल और मुकेश कुमार बहुत थोड़े समय के लिए दैनिक नईदुनिया से जुड़े थे. यही स्थिति ब्रजेश राजपूत (विस्तार न्यूज के समूह संपादक) और विजय मनोहर तिवारी (माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के मौजूदा कुलगुरु) की भी रही.
मुख्य समाचार डेस्क के प्रमुख सर्वदमन पाठक और उनके मुख्य सहयोगी राधेश्याम धामू और नवल पांडे थे. खेल पेज सुनील चिंचोलकर और दो अंशकालीन सहयोगियों-आशुतोष देशमुख व मास्साब के और कारोबार पेज राजकुमार जायसवाल के जिम्मे था. गोपाल जोशी और विवेक सावरीकर मृदुल हरफनमौला सहयोगी थे. वे किसी भी डेस्क का काम संभाल सकते थे. वंदना शर्मा आर्टिस्ट और चंद्रशेखर हाड़ा कार्टूनिस्ट के रूप में टीम का हिस्सा थे. जितेंद्र रिछारिया, रामकृष्ण उपाध्याय, अमिताभ श्रीवास्तव और परितोष दीक्षित भी कुछ-कुछ दिन हमारे साथ रहे. इसी तरह दिनकर जोशी और कुमार राकेश ने कुछ समय के लिए रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी संभाली.
प्रबंध संचालक राजेंद्र तिवारी भले आदमी थे. पेशे से इंजीनियर राजेंद्र जी ने लंबे समय तक भिलाई स्टील प्लांट में काम किया था. उनके पास स्वतंत्र रूप से अखबार चलाने का अनुभव नहीं था. बंटवारे के पहले वे विज्ञापन विभाग का काम देखते थे. उनके छोटे भाई डाक्टर सुरेंद्र तिवारी मध्यप्रदेश सरकार के स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त संचालक पद से वीआरएस लेकर अखबार से जुड़े थे. दोनों भाइयों के पास अखबार के भविष्य के लिए कोई विजन, कोई ब्लू प्रिंट नहीं था. उनकी प्राथमिकता छपाई के सरकारी ठेके थे. मीडिया के बदलते परिदृश्य में नईदुनिया की पुरानी साख ज्यादा दिन काम नहीं आने वाली थी. नतीजतन, अखबार का सर्कुलेशन और विज्ञापन रेवेन्यू क्रमशः घटता गया.
संपादक जोशी जी मूलतः रिपोर्टर और स्वभाव से ब्यूरोक्रेट थे. वे अफसरशाहों को राजनेताओं पर तरजीह देते थे. वे कहते थे कि बड़े पदों पर राजनेताओं का कार्यकाल 10-15 साल से ज्यादा नहीं होता, लेकिन आईएएस का कार्यकाल 30-35 साल होता है. उनमें से ज्यादातर सचिव या समकक्ष पद पर पहुंचकर रिटायर होते हैं. राजकाज की अंदरूनी और ठोस खबरें भी उन्हीं से मिलती हैं.
जोशी जी मध्यप्रदेश कैंसर चिकित्सा एवं सेवा समिति नामक एक एनजीओ भी चलाते थे. वे इस एनजीओ के लिए अखबार के जिला प्रतिनिधियों के जरिए चंदा उगाही करते थे. उनके लिए यह काम अखबार से ज्यादा महत्व का था. बाद में इस एनजीओ ने भोपाल में जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल भी खोला जो कई बड़े घपलों की वजह से विवादों से घिरा रहा.
कुल मिलाकर दैनिक नईदुनिया ढर्रे पर चलनेवाला अखबार बन गया था. उसके शीर्ष नेतृत्व में नई सोच, नई दिशा का अभाव था. यह स्थिति मेरे मिजाज के ठीक उलट थी, लेकिन बार-बार अखबार बदलने की अपनी छवि तोड़ने की गरज से मुझे कुछ दिन वहां टिके रहना जरूरी लगा. उस दौरान दैनिक भास्कर (दो बार) और दैनिक जागरण में काम करने के प्रस्ताव मिले भी, लेकिन मैंने मना कर दिया.
मेरे दैनिक नईदुनिया में रहने के दौरान सोवियत संघ का विघटन, शंकर गुहा नियोगी की हत्या, न्यूयार्क में 9/11 की घटना, राजीव गांधी की हत्या, 10वीं लोकसभा के चुनाव, कांग्रेस का तिरुपति अधिवेशन, अयोध्या में बाबरी ढांचे का ध्वंस, मध्यप्रदेश सहित कई विधानसभाओं के चुनाव आदि प्रमुख घटनाएं हुईं. अखबार में हड़ताल की एक नाकाम कोशिश भी हुई.
इस पड़ाव का वृत्तांत पूरा करने से पहले 1994 के शुरुआती महीनों की एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा. एक दिन शाम मैं पहले पेज की खबरों को अंतिम रूप दे रहा था, तभी एक सज्जन मेरे पास आ धमके. वे विदिशा में स्थित सोम डिस्टीलरी के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की खबर नहीं छापने का आग्रह कर रहे थे. जिला प्रशासन ने नागरिकों की शिकायत पर डिस्टीलरी का विषैला पानी बेतवा नदी में छोड़े जाने पर डिस्टीलरी बंद करने और उस पर भारी जुर्माना लगाने का आदेश दिया था. रिपोर्टिंग टीम के पास यह खबर थी ही नहीं. मैंने उन सज्जन को रिपोर्टर राघवेंद्र सिंह के पास भेजकर कहा कि उनके पास जो जानकारी है, उन्हें बता दें. उन्होंने राघवेंद्र को सारी जानकारी दे दी और आग्रह दोहराते रहे कि खबर छपे नहीं. इस बीच मैंने राघवेंद्र को संकेत कर दिया कि ज्यादा से ज्यादा जानकारी ले लें. यह खबर प्रमुखता से छपनी है. यह खबर मुखपृष्ठ पर एंकर की जगह छपी.
अगले दिन राजेंद्र जी ने अपने कक्ष में तलब कर मुझसे कहा कि आपने सोम डिस्टीलरी वाली खबर छापकर अखबार का बड़ा नुकसान कर दिया है. यह खबर न छापने के एवज में 20-25 हजार रुपए (मौजूदा समय में डेढ़-दो लाख रुपए) के विज्ञापन मिल सकते थे. मैंने खबरें छापने या न छापने के एवज में विज्ञापन मिलने या न मिलने के किस्से तो बहुत सुन रखे थे, लेकिन यह पहला मौका था जब इस प्रवृत्ति का विद्रूप चेहरा इतने करीब से देखा. अखबार मालिक इस बाबत खुद बात कर रहे थे. मैंने उसी दिन शीघ्र से शीघ्र दैनिक नईदुनिया छो़ड़ने और विकल्प तलाशने का मन बना लिया. मैंने अपनी मन: स्थिति की जानकारी प्रभाष जी को देकर उनकी सलाह भी मांगी.
चौथा संसार में वापसी मेरी पहली प्राथमिकता थी. इसका कारण उसके प्रबंध संचालक सुरेंद्र संघवी के साथ काम करने का अच्छा अनुभव था. प्रभाकर माचवे के निधन के बाद वहां ख्यात लेखक श्रीनरेश मेहता संपादक बनाए गए थे. चौथा संसार में रहते हुए ही मेहता जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था. इस दौरान श्रवण गर्ग ने वहां कुछ दिन कार्यकारी संपादक की भूमिका निभाई, लेकिन औपचारिक रूप से अखबार का हिस्सा नहीं बने. अप्रैल 1994 में एक दिन प्रभाष जी के इंदौर प्रवास के दौरान मैं भी इंदौर गया. वहां संक्षिप्त मुलाकात के दौरान सुरेंद्र भाई ने चौथा संसार में मेरी वापसी के लिए न केवल हामी भर दी बल्कि यह भी कहा कि मेहता जी ज्यादा दिन रुकने के इच्छुक नहीं हैं, इसलिए जल्दी ही आपको संपादक की पूरी जिम्मेदारी संभालनी होगी. उन्होंने एक अतिरिक्त प्रलोभन यह भी दिया कि उनके एक बिल्डर मित्र के निर्माणाधीन आवासीय परिसर में वाजिब कीमत पर एक फ्लैट की भी व्यवस्था करा देंगे.
भोपाल लौटकर मैंने 1 मई को राजेंद्र तिवारी को अपना इस्तीफा सौंपा और 30 मई तक कार्यमुक्त करने का निवेदन किया. फिर 1 जून की दोपहर चौथा संसार में दूसरी पारी शुरू करने इंदौर पहुंच गया.
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मेरी पत्रकारिता यात्रा (10) : एक अजन्मे अखबार में संक्षिप्त पारी…



देव प्रिय अवस्थी के नाना
August 26, 2026 at 12:52 pm
बहुत की चालू किस्म के पत्रकार रहे अवस्थी जी आप.. महाधूर्त और मौका परस्त…जैसे ही नौकरी जाने की खबर लगती… मैं चुपके से निकल लेता.. और किसी बड़े पत्रकार से अपनी सिफारिश करवा लेता… मैं बड़े संपादकों के तलबे हमेशा चाटता रहता था। यह भी अपने लेखनी में शामिल कीजिए.. 4 से 5 स्मरण पढ़े आपके ..सभी में घोर चापलूसी… और मौका परस्ती नजर आई।