सुरेश गांधी-
गाजीपुर । पुलिस की वर्दी सिर्फ अधिकार, अनुशासन और कानून की ताकत का प्रतीक नहीं है। उसके भीतर संवेदना, सम्मान और इंसानियत भी हो तो वही वर्दी जनता के दिल में भरोसा पैदा करती है। ग़ाज़ीपुर जिले के एसपी सिटी राकेश मिश्रा का सेना के दो जवानों के प्रति व्यवहार इसी मानवीय पुलिसिंग की एक ऐसी तस्वीर सामने लाता है, जिसकी चर्चा होना जरूरी है। सेना के दो जवान अपनी समस्या लेकर एसपी सिटी से मिलने पहुंचे। मुलाकात के दौरान जवानों ने उन्हें सैल्यूट किया। सैल्यूट ग्रहण करने के बाद एसपी सिटी तत्काल अपनी कुर्सी से खड़े हो गए। इसके बाद उन्होंने तब तक बैठना मुनासिब नहीं समझा, जब तक जवानों की समस्या का समाधान नहीं हो गया। यह छोटा-सा प्रसंग पुलिस और सेना के बीच सम्मान के उस रिश्ते को रेखांकित करता है, जिसमें पद से अधिक महत्व कर्तव्य और वर्दी का होता है।
सम्मान का जवाब सम्मान से
एक तरफ सेना के जवान देश की सीमाओं पर खड़े होकर राष्ट्र की सुरक्षा का दायित्व निभाते हैं, दूसरी तरफ पुलिस के जवान और अधिकारी कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालते हैं। दोनों वर्दियां अलग जरूर हैं, लेकिन दोनों के केंद्र में देश और समाज की सुरक्षा का संकल्प है। ऐसे में एक पुलिस अधिकारी का सैनिकों के सम्मान में खड़ा होना केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि कर्तव्य के प्रति कर्तव्यनिष्ठा का सम्मान भी है। आज जब पुलिसिंग को लेकर अक्सर कठोरता, दूरी और व्यवहार को लेकर सवाल उठते हैं, ऐसे उदाहरण उम्मीद जगाते हैं। कानून की सख्ती जरूरी है, लेकिन उसके साथ मानवीय चेहरा भी उतना ही जरूरी है। आखिर पुलिस के पास आने वाला हर व्यक्ति सिर्फ एक फरियादी नहीं होता, वह अपनी उम्मीद लेकर आता है।
कुर्सी बड़ी नहीं, सामने खड़ा सम्मान बड़ा
पुलिस अधिकारी की कुर्सी अधिकार का प्रतीक है, लेकिन उस कुर्सी की गरिमा तब और बढ़ जाती है जब अधिकारी जरूरत पड़ने पर उसके सामने खड़े व्यक्ति के सम्मान में खड़ा हो जाए। एसपी सिटी राकेश मिश्रा का यह व्यवहार इसी सोच को सामने रखता है। यह संदेश भी महत्वपूर्ण है कि अधिकारी का कद कुर्सी से नहीं, उसके व्यवहार से तय होता है। फरियादी की बात सुनना व्यवस्था का दायित्व है, लेकिन उसकी गरिमा का सम्मान करना उस व्यवस्था को मानवीय बनाता है।
ऐसे अफसरों का हौसला बढ़ना चाहिए
पुलिस व्यवस्था में अच्छे काम की चर्चा केवल इसलिए नहीं होनी चाहिए कि किसी अपराध का खुलासा हुआ या किसी आरोपी की गिरफ्तारी हुई। पुलिसिंग का एक दूसरा पक्ष भी है—व्यवहार, संवेदना और भरोसा। यही वे छोटे-छोटे क्षण हैं जो पुलिस और जनता के बीच बनी दूरी को कम करते हैं। राकेश मिश्रा का जवानों के प्रति यह व्यवहार इसलिए उल्लेखनीय है कि इसमें किसी दिखावे की जरूरत नहीं थी। एक सैल्यूट के जवाब में खड़े हो जाना और समस्या के समाधान तक खड़े रहना—यह संकेत भर है कि वर्दी के भीतर सम्मान की भावना जीवित है। पुलिस की सख्ती अपराधियों के लिए होनी चाहिए, लेकिन संवेदना आम आदमी के लिए। यही संतुलन अच्छी पुलिसिंग की पहचान बनता है। ऐसे अफसरों की पीठ थपथपाना इसलिए जरूरी है क्योंकि अच्छे उदाहरणों की सराहना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं होती, बल्कि पूरी पुलिस व्यवस्था को यह संदेश देती है कि कानून के साथ इंसानियत भी पुलिसिंग की ताकत है। और शायद इसी एक भावना में वह पुलिसिंग छिपी है, जिसकी जनता आज सबसे ज्यादा अपेक्षा करती है—वर्दी देखकर डर नहीं, भरोसा पैदा हो।



art n arttist
August 28, 2026 at 11:24 am
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