अयोध्या में हनुमानगढ़ी के महंत राजू दास और कांग्रेस प्रवक्ता कुंवर सिंह निषाद के बीच सोमवार को एक चैनल के लाइव डिबेट में विवाद हो गया। राजू दास ने कांग्रेस प्रवक्ता को जमकर गालियां दीं। धमकाते हुए कहा- जूते से मारूंगा। यह सुनकर दोनों महिला एंकर भौचक रह गईं। कार्यक्रम को बीच में ही खत्म करना पड़ा।
डिबेट में मछली भोज पर बहस हो रही थी।
-राजेश साहू, पत्रकार
प्रभात डबराल-
“चुप हो जा चादरमोद… तेरी मां की…”
मैंने 2010 में टीवी/ पत्रकारिता छोड़ दी थी….2015 तक सूचना आयुक्त रहा।
फिर टीवी पत्रकारिता के नए युग का ताप नहीं झेल पाया इसलिए टीवी देखना ही छोड़ दिया
फिर भी….सोशल मीडिया पर क्लिप/रील के जरिए टीवी पत्रकारिता के दर्शन होते रहते हैं।
आज एक तथाकथित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल की एक क्लिप देखी जिसमें एंकर एक कन्या थी, एक राष्ट्रीय पार्टी की प्रवक्ता भी महिला थी और अन्य लोगों के अलावा एक गेरुआ वस्त्र धारी महात्मा भी थे जिनके गले में रुद्राक्ष की मोटी मोटी मालाएँ भगवा उत्तरीय के ऊपर लहरा रही थीं.
जिस समय मैंने ये क्लिप चलाई महात्मा जी की त्योरियाँ चढ़ी हुई थीं और वो किसी दूसरे व्यक्ति पर चिल्ला रहे थे: चुप कर चादरमोद..,तेरी मां की…,बाहर निकल माँ…दूँगा तेरी ….
मैं सोच रहा हूँ मैने असली गाली की जगह डॉट डॉट डॉट क्यों लिखा जब:
- चैनल को कोई प्रॉब्लम नहीं है
- सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ रहा
- मीडिया के संगठन कुछ नहीं कह रहे और तो और
- दर्शकों को भी कोई प्रॉब्लम नहीं हैं तो मैं क्यों संकोच करूँ.
अगर किसी को कोई दिक़्क़त होती तो बीजेपी का वो राष्ट्रीय प्रवक्ता जिसने विपक्षी पार्टी के प्रवक्ता को लाइव शो में कहा कि “तेरी मां रंडी है”, अभी भी प्रवक्ता बना रहता?(मैंने ये क्लिप देखी है), और वो प्रवक्ता, जो सिर्फ़ कुर्ता पहनकर चैनल में आ गया था. लाखों दर्शकों ने उसका तिकोना कच्छा लाइव टीवी में देखा. वो भाई आज भी प्रवक्ता है.
माना कि पार्टी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा. लेकिन चैनल. उसकी कोई ज़िम्मेदारी है कि नहीं.
आज एक “महात्मा” के मुखारविंद से “चादरमोद तेरी मां की ….” सुनने के बाद मुझे लगा कि चुप रहने से काम नहीं चलेगा. न हो तो ये सवाल तो पूछ ही लूँ कि चैनलों में भाषा का ये नया चलन कब से शुरू हुआ?
मैं 2010 तक तो टीवी पत्रकार था ही. कई चैनलों का प्रमुख रहा. अपने इष्ट सिद्धबली की क़सम खा कर कहता हूँ हमारे जमाने में ऐसी भाषा के लिए कोई जगह नहीं थी. ऐसी भाषा बोलने वाले दोबारा पर्दे पर नहीं आ सकते थे, किसी क़ीमत पर भी नहीं.
अब आप ही बताइए कि टीवी के प्रचलित शब्दकोश में “माँ बहन की भद्दी गालियों” का प्रवेश कब हुआ?(2010 तक का तो मुझे पता है, नहीं हुआ था)
क्यों हम इसे स्वीकार कर रहे हैं? ये भी बताइए कि इन गालियों के लिए किसको किसे माफ़ करना है?


