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आयोजन

एआई के दौर में ‘आज की खबर’ ने रिस्पॉन्सिबल जर्नलिज्म को लेकर न्यूज़ रूम में दी वेरिफिकेशन पर स्पेशल ट्रेनिंग!

Presenter standing beside a large screen that reads 'AI Provenance for Newsrooms' with Google and Data LEADS logos; audience watches in a studio control room.

AI ने कंटेंट इंडस्ट्री के काम करने का तरीका तेजी से बदल दिया है। एक तरफ AI को नौकरियों, डीपफेक, फेक कंटेंट और गलत सूचनाओं जैसी चुनौतियों से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जिस टेक्नोलॉजी की मदद से गलत या भ्रामक कंटेंट तैयार किया जा सकता है, उसी टेक्नोलॉजी की मदद से अब उसकी जांच भी पहले से बेहतर तरीके से की जा रही है। यानी AI सिर्फ कंटेंट बनाने का जरिया नहीं, बल्कि फेक न्यूज़ और डिजिटल अफवाहों पर लगाम लगाने में भी एक महत्वपूर्ण टूल बनता जा रहा है।

इसी बदलते मीडिया माहौल और रिस्पॉन्सिबल जर्नलिज्म की जरूरत को देखते हुए Aaj Ki Khabar के न्यूज़ रूम में Responsible AI, AI वेरिफिकेशन और Content Provenance को लेकर एक स्पेशल ट्रेनिंग सेशन आयोजित किया गया।

सेशन का संचालन डॉ. निमिष कपूर, शोधकर्ता, साइंस कम्युनिकेटर और वॉलंटियर AI ट्रेनर ने किया। करीब 45 से 60 मिनट तक चले इस इंटरैक्टिव सेशन में Aaj Ki Khabar की न्यूज़ रूम टीम, डिजिटल टीम, एडिटिंग टीम और अन्य कर्मचारियों ने हिस्सा लिया।

ट्रेनिंग की खास बात यह रही कि इसमें सिर्फ थ्योरी पर चर्चा नहीं हुई, बल्कि अलग-अलग AI वेरिफिकेशन टूल्स का लाइव टेस्ट और लाइव डेमो भी दिया गया।

डॉ. निमिष कपूर ने SynthID, Backstory, InVID और Deepware जैसे टूल्स के जरिए यह समझाया कि किसी संदिग्ध इमेज, वीडियो या ऑडियो की जांच किस तरह की जा सकती है और AI से तैयार या बदले गए कंटेंट को पहचानने के लिए किन संकेतों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

उन्होंने अलग-अलग उदाहरणों के जरिए दिखाया कि ये टूल्स असल में किस तरह काम करते हैं और न्यूज़ रूम के रोजमर्रा के काम में इनका इस्तेमाल कहां किया जा सकता है।

सेशन के दौरान SynthID को विस्तार से समझाया गया। टीम को बताया गया कि AI से तैयार या एडिट किए गए कंटेंट में मौजूद वॉटरमार्क और प्रोवेनेंस सिग्नल्स की मदद से किस तरह अतिरिक्त जानकारी हासिल की जा सकती है।

लाइव डेमो के जरिए यह भी बताया गया कि किसी इमेज या वीडियो को केवल देखकर असली या नकली मान लेने के बजाय टेक्निकल वेरिफिकेशन की मदद लेना क्यों जरूरी होता जा रहा है।

Backstory के जरिए किसी इमेज की पुरानी हिस्ट्री और उसके कॉन्टेक्स्ट को समझने के तरीकों पर चर्चा की गई। कई बार कोई तस्वीर अपने आप में फेक नहीं होती, लेकिन उसे किसी दूसरे समय, जगह या घटना से जोड़कर वायरल कर दिया जाता है। ऐसे मामलों में उस तस्वीर का पुराना ऑनलाइन रिकॉर्ड, उसका कॉन्टेक्स्ट और पहले वह कहां इस्तेमाल हुई थी, इसकी जांच पत्रकारों के लिए बेहद जरूरी हो जाती है।

सेशन में इस तरह के कॉन्टेक्स्ट मैनिपुलेशन को पहचानने के तरीकों पर भी बात हुई।

ट्रेनिंग के दौरान InVID और Deepware जैसे टूल्स का भी लाइव इस्तेमाल करके दिखाया गया। वीडियो के संदिग्ध फ्रेम्स, डीपफेक से जुड़े संकेत और एडिट या मैनिपुलेट किए गए कंटेंट की जांच में इन टूल्स का इस्तेमाल किस तरह किया जा सकता है, इसे प्रैक्टिकल उदाहरणों के साथ समझाया गया।

इसका खास फायदा न्यूज़ रूम की एडिटिंग और डिजिटल टीम को हो सकता है, जहां सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से आने वाले फोटो और वीडियो को पब्लिश करने से पहले उनकी जांच करना जरूरी होता है।

सेशन के दौरान सिर्फ इमेज तक चर्चा सीमित नहीं रही। ऑडियो, वीडियो, डीपफेक और डिजिटल मैनिपुलेशन को लेकर भी विस्तार से बात हुई।

टीम को बताया गया कि किसी वीडियो या ऑडियो में संभावित बदलाव के संकेत किस तरह देखे जा सकते हैं और संदिग्ध कंटेंट की जांच करते समय किन बातों पर ध्यान देना चाहिए।

डॉ. निमिष कपूर ने सिर्फ टूल्स की ताकत नहीं बताई, बल्कि उनकी लिमिटेशंस पर भी खुलकर बात की। उन्होंने समझाया कि किसी एक AI डिटेक्शन या वेरिफिकेशन टूल के नतीजे को हमेशा अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

टेक्नोलॉजी न्यूज़ रूम को महत्वपूर्ण संकेत दे सकती है, लेकिन अंतिम फैसला करने से पहले सोर्स चेक, कॉन्टेक्स्ट, क्रॉस-वेरिफिकेशन और एडिटोरियल जजमेंट भी उतने ही जरूरी हैं।

यानी AI टूल्स पत्रकार की जगह लेने के लिए नहीं, बल्कि पत्रकार की वेरिफिकेशन क्षमता को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल किए जाने चाहिए।

पूरा सेशन काफी इंटरैक्टिव रहा। Aaj Ki Khabar की टीम के सदस्यों ने AI, डीपफेक, फेक इमेज, वीडियो वेरिफिकेशन, ऑडियो मैनिपुलेशन और अलग-अलग टूल्स की लिमिटेशंस को लेकर कई सवाल पूछे।

रोजमर्रा के न्यूज़ रूम में आने वाले कंटेंट को लेकर भी चर्चा हुई कि किसी वायरल फोटो, वीडियो या ऑडियो को इस्तेमाल करने से पहले उसे किस तरह से चेक किया जाना चाहिए।

मीडिया इंडस्ट्री में AI को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि इससे नौकरियों और पुराने वर्कफ्लो पर क्या असर पड़ेगा। लेकिन AI का दूसरा पक्ष यह भी है कि यही टेक्नोलॉजी अब फेक न्यूज़, डीपफेक और मैनिपुलेटेड कंटेंट को पहचानने के लिए नए टूल्स दे रही है।

जिस तेजी से गलत सूचना इंटरनेट और सोशल मीडिया पर फैल सकती है, उसी तेजी से न्यूज़ रूम के लिए अपनी वेरिफिकेशन क्षमता को मजबूत करना भी जरूरी हो गया है।

अगर इन टूल्स का इस्तेमाल सही और जिम्मेदार तरीके से किया जाए, तो AI पत्रकारिता के सामने सिर्फ चुनौती नहीं, बल्कि साफ और वेरिफाइड जानकारी तक पहुंचने का एक मजबूत माध्यम भी बन सकता है।

Aaj Ki Khabar में आयोजित यह स्पेशल ट्रेनिंग सिर्फ नए टूल्स को जानने तक सीमित नहीं थी। इसका मकसद न्यूज़ रूम में ऐसी सोच को मजबूत करना भी था, जहां किसी खबर को सबसे पहले दिखाने के साथ-साथ उसे सही और वेरिफाइड रूप में दर्शकों तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी माना जाए।

आज जब कोई फेक इमेज, डीपफेक वीडियो या गलत ऑडियो कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है, तब पत्रकारिता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

Aaj Ki Khabar की यह पहल रिस्पॉन्सिबल जर्नलिज्म की दिशा में एक कदम है, जहां नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सिर्फ कंटेंट बनाने के लिए नहीं, बल्कि कंटेंट की सच्चाई जांचने और फर्जी सूचनाओं पर लगाम लगाने के लिए भी किया जा रहा है।

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