रविंद्र सिंह श्योरन-
ये होती है भयंकर मजबूत सरकार… सुभाष चंद्रा के 22 हजार करोड़ के कर्ज पर बड़ा विवाद, महज 6.5 करोड़ में निपटा दिया। विजय माल्या ने कहा ये तो मैं भी कर देता।
ZEE के मालिक सुभाष चंद्रा से जुड़े करीब 22 हजार करोड़ रुपये के कर्ज को कथित तौर पर महज 6.5 करोड़ रुपये में निपटाए जाने के दावे ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। इस मामले में करीब 13 हजार करोड़ रुपये के LIC के एक्सपोजर/बकाये के डूबने की बात भी कही जा रही है। यदि ये दावे सही हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी रकम के मुकाबले इतनी कम राशि में मामला कैसे निपटा?
मामले को लेकर उद्योगपति विजय माल्या का नाम भी चर्चा में है। कथित तौर पर उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब उनका कुल कर्ज करीब 9 हजार करोड़ रुपये था, तो उन्हें भी ऐसी ही कोई योजना क्यों नहीं दी गई।
इस पूरे प्रकरण में NCLT की कार्यवाही और जज नीलेश शर्मा की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित आदेशों और दस्तावेजों के आधार पर जांच जरूरी है।
दूसरी तरफ, आम नागरिकों की शिकायत रहती है कि बैंक छोटे-छोटे कर्ज और बैंकिंग सेवाओं पर अलग-अलग शुल्क वसूलते हैं। ऐसे में हजारों करोड़ रुपये के कॉर्पोरेट कर्ज के इतने कम मूल्य पर निपटारे की खबर सामने आने पर लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा होते हैं।
NCLT और Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) को 2016 में लागू करने का उद्देश्य कंपनियों के दिवालियापन मामलों का समयबद्ध समाधान और बैंकों की फंसी रकम की वसूली सुनिश्चित करना था। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस व्यवस्था का लाभ आम कर्जदारों और बैंकों को समान रूप से मिल रहा है, या बड़े कॉर्पोरेट मामलों में अलग तरह के समाधान सामने आ रहे हैं?
LIC से जुड़ी कथित बड़ी रकम और इस पूरे ऋण निपटारे की प्रक्रिया ने भी पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े किए हैं। आखिर इतना बड़ा कर्ज किस आधार पर दिया गया, उसमें कितना पैसा वास्तव में बकाया था, और निपटारे के दौरान इतनी बड़ी कटौती का आधार क्या था?
अगर सामने आए दावे दस्तावेजों से सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ एक कारोबारी ऋण का मामला नहीं रहेगा, बल्कि बैंकिंग व्यवस्था, कॉर्पोरेट ऋण और दिवाला समाधान प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी गंभीर बहस खड़ी करेगा।
भगोड़ा माल्या भी दुखी है कि मेरा तो आज भी पीछा कर रहे हैं और सुभाष चंद्रा हजारों करोड़ दबाकर भी कर्जमुक्त हो गए.
-अजीत अंजुम
असरार खान-
Zee tv के मालिक सुभाष चंद्रा पर सरकार ने साढ़े 22 हजार करोड़ ₹ के कर्ज साढ़े 6 करोड़ में यूं ही नहीं निपटा दिया …ज्ञात रहे कि इस नेटवर्क के पास 14 तो समाचार चैनल हैं जो दिन रात प्रधानमंत्री मोदी का भोंपू बनकर तमाम निराधार खबरों को बेशर्मी से प्रसारित करते रहते हैं और मनोरंजन के चैनल दिन रात अंधविश्वास फैलाकर आप जनता को गुमराह करने में लगे हैं….

जिस तरह मोदी के भक्त सुभाष चंद्र का इतना बड़ा कर्ज 99% से ज्यादा माफ कर दिया गया है इससे उत्साहित होकर भगोड़े विजय माल्या ने सुभाष चंद्रा को मुबारकबाद देते हुए उसके ऊपर 6 हजार करोड़ का जो बेसिक कर्ज था और अब वह 12 हजार करोड़ तक पहुंच गया है उसे भी आशा है कि उसका कर्ज भी 2 चार करोड़ की रिकवरी में निपट जाएगा…
वर्तमान आत्ममुग्ध भ्र्ष्ट सरकार जिस तरह देश की संपत्ति और धन को जिस तरह लुटा रही है उससे भारत सरकार की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है और बदले में जनता को बुरी तरह से लूटा जा रहा है… सवाल पैदा होता है कि ऐसी गैरजिम्मेदार सरकार को जनता और कब तक बर्दास्त करेगी… एक नारा फिर से याद आ रहा है… अब तक जिसका खून न खौला – खून नहीं वह पानी है..!!
गुणानंद जखमोला-
सुभाष चंद्रा: छि, यह भी कोई जिंदगी है!
- कर्ज में जिंदगी शुरू की, कर्ज माफी से खत्म होगी जिंदगी
- अरबों कमाए, लेकिन हेयरकट तो कतई स्टेट्स सिंबल नहीं हो सकता
1998-99 की बात है। दिल्ली के लारेंस रोड पर जी मीडिया का केबल चैनल सिटी केबल चलता था। पत्रकारिता कोर्स करने के बाद इंटर्नशिप के लिए यहां गया (एस्सेल हाउस के एक हिस्से में जिसे हम मजाक में चावलों का गोदाम भी कहते थे) वहां ये चैनल चलता था। इसके हेड थे वरिष्ठ पत्रकार गिरिजेश विशिष्ठ। उनसे बहुत कुछ सीखा। वह दौर यू-मैटिक कैमरे का था। सिटी केबल में प्रोम्पटर की सुविधा नहीं थी। हम स्कैच पेन से हेडलाइंस और न्यूज लिखते और कैमरे के लैंस के ठीक ऊपर लगा देते। न्यूज रीडर उसी को पढ़ते। जी की यात्रा फिर साउथ एक्स से होते हुए नोएडा पहुंच गयी। यहां मुझे रिपोर्टिंग में अवसर नहीं मिला तो मैंने अमर उजाला ज्वाइन कर लिया।
खैर, अब ढाई दशक के बाद जब कल एनसीएलटी ने जी ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा के दिवालियापन के 22006 करोड़ के कर्ज को महज 6.5 करोड़ की रिपेमेंट योजना को मंजूरी दी तो यह हेयरकट अब कर्जदाताओं को ही भुगतना होगा। यानी सारा भार अप्रत्यक्ष तौर पर 70 रुपये किलो चीनी खरीदने के बाद घरेलू बजट में कटौती करने वाले दिहाड़ी मजदूर से लेकर मध्यम वर्ग को उठाना होगा।
जब मैं वहां इंटर्नशिप कर रहा था तो सुभाष चंद्रा की स्टोरी सुनकर उन पर गर्व होता। हरियाणा के बनिया परिवार का एक 17-18 साल का बच्चा अपने परिवार का कर्ज उतारने के लिए दिल्ली आया और सदर बाजार में चावलों की दलाली करने लगा। मेहनत की और एस्सेल ग्रुप और जी मीडिया जैसा सशक्त विकल्प देश के सामने रखा। मीडिया में शिखर पर पहुंचे। देश-दुनिया में नाम कमाया और अरबों-खरबों की दौलत जुटा ली।
अफसोस यह हे कि जो व्यक्ति मेरे लिए आदर्श दिखता था, गोदी मीडिया के दौर में आंखों में खटकने लगा। मुझे अब याद नहीं कि मैंने जी न्यूज कितने महीने से नहीं देखा। भले ही अनिल अंबानी, सुभाष चंद्रा जैसे अमीरों के लिए हेयरकट जिंदगी का सबसे बड़ा शार्टकट हो लेकिन इनको धिक्कारने का मन करता है कि एक मजदूर-किसान की खून पसीने की कमाई को हड़प ऐशो-आराम की जिंदगी जी और फिर खुद को दिवालिया घोषित करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
अच्छा आप लोग ही तय करो कि सुभाष चंद्रा ने परिवार का कर्ज उतारने के लिए जिंदगी शुरू की और कर्ज में डूबकर जीवन की सांध्यवेला बिता रहे हैं। भले ही यह उनकी नजर में चालाकी हो, बिजनेस का दांव हो, लेकिन उनकी जिंदगी का छीछालेदर हो ही गयी। छिः, ऐसी सफलता भी किस काम की, जो सुभाष चंद्रा ने हासिल की।
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