सत्येंद्र पीएस-
आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने अपने इस्तीफे की सूचना फेसबुक पोस्ट पर दी है. आई आई टी, आई आई एम, आई ए एस… एक सामान्य इंसान का जो चरम सपना होता है, वह उन्होंने पूरा किया, दो जिलों में डीएम रही और अब इस्तीफा दे दिया.
अभी उन्होंने यह साफ नहीं किया है कि उन्होंने इस्तीफा क्यों दिया है, आगे कोई महत्त्वकांक्षा या नया सपना है या कोई और दिक्कत है.
मैंने तमाम आई ए एस की स्थिति देखी या सुनी है. इस समय नौकरी करना बहुत कठिन हो गया है. खासकर अगर कोई अधिकारी तिकड़मी नहीं है और ईमानदारी से काम करना चाहे तो उसके सामने बड़ी कठिन परिस्थिति है.
खैर… असल चीज है मन की शांति. अगर आप भीतर से शांत नहीं हैं और अंदर ही अंदर कुछ और ही लड़ाई चल रही है तो आप किसी भी पद पर हों या कितना भी बड़ा आपका कारोबारी साम्राज्य क्यों न हो, सब कुछ बेकार है. आप किसी भी बात और विचार से अशांत हो सकते हैं. व्याकुल हो सकते हैं.
आज स्थितियाँ थोड़ी कठिन हैं. देखता हूँ कि सोशल मीडिया पर तमाम लोग गाली गलौज करके ही अपना जीवन काट रहे हैं. सोचता हूँ कि लोगों के भीतर कितनी बेचैनी है अशांति है. यह अशांति उनकी निजी ज़िंदगी को कितना तबाह करती होगी, उनकी फेमिली, उनके माँ बाप को कितना तबाह करती होगी?
मन की आशांति बड़ी समस्या है. यह किसी फिजिकल प्रॉब्लम से कहीं ज्यादा खतरनाक है. यह तमाम बार जिंदगी को अवसाद की तरफ ले जाती है. तमाम लोग शराबी या एडिक्ट हो जाते हैं, आत्महत्या कर लेते हैं.
अशांति तभी आती है जब इंसान अनित्यता को महसूस नहीं कर पाता. जिंदगी में जैसे ही कोई प्रतिकूल बदलाव होता है तो शांति गायब होती है और यह तरह तरह की दिक्कतें लाती है.
कोशिश करें कि मन की शांति बनी रहे, चेतना जागृत रहे. तभी ज़िंदगी को बेहतर ढंग से जिया जा सकता है. समथा बहुत जरूरी है।
IAS दिव्या मित्तल ने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया। अभी तक वह राजस्व विभाग में विशेष सचिव थीं।
उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखा है, उसमें लिखा-
“मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आयी हूँ। सच यह है कि सबसे ज़्यादा मैंने ही पाया, और वो कर्ज़ और भी बढ़ता गया। लोग मेरी ख़ुशी में मुझसे ज़्यादा ख़ुश हुए। उन्होंने मुझे तब भी उसी विश्वास से देखा, जब मैं खुद ही थकी या टूटी थी। और इसी ने आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी। इतना प्यार, इतना सम्मान, इतना अपनापन मिला, कि मेरी झोली पूरी भर गयी। और इसमें उन साथियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का भी बहुत बड़ा श्रेय है जिन्होंने मेरे कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और साथ डटे रहे।
आज आभार से आँखें नम हैं। बस एक दृश्य इनमें बसा है। लहुरिया दह की पहाड़ी की वो वृद्ध माँ, जो अपने गाँव में पहली बार पानी पहुँचता देख कुछ नहीं बोली, बस काँपते हाथों से मेरा सिर छूकर आशीर्वाद दे गई। पद तो आज छूट गया, पर वह स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा। और वह सपना भी नहीं छूटेगा, जो देश की इस मिट्टी ने मुझे दिया है।”
-राजेश साहू, पत्रकार
आईएएस दिव्या मित्तल की एफबी पोस्ट-
आज मैंने 13 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए IAS से त्यागपत्र दे दिया है।
साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे, सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात एक कर IIT दिल्ली और IIM बैंगलोर से पढ़ने के बाद, लंदन में नौकरी लग गयी। पर ‘सब कुछ’ पा लेने पर भी कुछ अधूरा था। अपने देश में न होना खलता था। मेरी पढ़ाई, आत्मविश्वास, दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की ताक़त, सब इस मिट्टी का कर्ज़ था मुझ पर। वो कर्ज़ चुकाना था। चाहती थी जिस भारत का सपना देखा था, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों। सो लौट आई, और IAS अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला।
बहुत कुछ करने का मौका मिला और बहुत सीखा। देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। मीरजापुर ने सिखाया कि ‘असंभव’ कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है। और माँ विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे, अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था। इस जीवन का असली सुकून उन आँखों में दिखा, जिस परिवार को पहली बार ज़मीन का हक़ मिला, जिस दिव्यांग को सम्मान से जीने का अवसर मिला, और जिस किसान के खेत को पानी मिला। उनके संघर्षों में साथ चलते हुए मैंने सीखा कि हर सरकारी फ़ाइल के पीछे एक व्यक्ति है, और उसकी गरिमा बनाये रखना ही न्याय है।
मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आयी हूँ। सच यह है कि सबसे ज़्यादा मैंने ही पाया, और वो कर्ज़ और भी बढ़ता गया। लोग मेरी ख़ुशी में मुझसे ज़्यादा ख़ुश हुए। उन्होंने मुझे तब भी उसी विश्वास से देखा, जब मैं खुद ही थकी या टूटी थी। और इसी ने आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी। इतना प्यार, इतना सम्मान, इतना अपनापन मिला, कि मेरी झोली पूरी भर गयी। और इसमें उन साथियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का भी बहुत बड़ा श्रेय है जिन्होंने मेरे कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और साथ डटे रहे।
आज आभार से आँखें नम हैं। बस एक दृश्य इनमें बसा है। लहुरिया दह की पहाड़ी की वो वृद्ध माँ, जो अपने गाँव में पहली बार पानी पहुँचता देख कुछ नहीं बोली, बस काँपते हाथों से मेरा सिर छूकर आशीर्वाद दे गई। पद तो आज छूट गया, पर वह स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा। और वह सपना भी नहीं छूटेगा, जो देश की इस मिट्टी ने मुझे दिया है।
आपकी अपनी,
दिव्या मित्तल


