पूजा पंडाल में क्या होगा – कौन तय करेगा? जाहिर है जो पूजा कर रहा है या सरकार तय कर सकती है। विश्व हिन्दू परिषद कौन है या क्यों है? किसे देखना है – स्थानीय थाने को, चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट को? यह खबर क्यों नहीं है?
संजय कुमार सिंह
आज अमर उजाला की सेकेंड लीड का शीर्षक है, शुद्धीकरण को जातिगत रंग देने में राहुल पर एससी-एसटी एक्ट में केस। इसके साथ इंट्रो है – उत्तराखंड में एससी युवक की तहरीर पर कार्रवाई बीएनएस की दो धाराएं भी। साथ की खबरों के शीर्षक हैं, राहुल ने खरगे के अपमान को दलित से जोड़ा। (मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह) धामी बोले, मामले में भाजपा शामिल नहीं। एक खबर शुद्धीकरण कार्यक्रम के मुख्य आयोजक के हवाले से भी है और अंत में एक शीर्षक है, मंथन के बाद ही रणनीति तय करेगी कांग्रेस। यह खबर किसी सूत्र या कांग्रेस नेता के हवाले से नहीं है। पार्टी नेतृत्व का संकेत है जो अखबार को कैसे, कहां से मिला खबर में नहीं बताया गया है।
द टेलीग्राफ में राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन नीट-पीजी परीक्षा से संबंधित एक खबर है जो आज कई अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। नीट-पीजी में बाधा की खबर देशबन्धु में लीड है। खबर जयपुर की है और बताया गया है कि बार-बार बिजली गुल होने से परीक्षा बाधित रही। प्रभावित 2445 छात्रों को 5 को दोबारा परीक्षा देनी होगी। पूरे देश में पुनर्परीक्षा की मांग भी की गई है। कॉक्रोच जनता पार्टी ने कहा कि सरकार के पास चुनौतियों से निपटने का कोई मॉडल नहीं है। व्यवस्था तो चौपट है ही। छात्रों ने कहा है कि उन्हें परीक्षा की गोपनीयता पर संदेह है।
दि एशियन एज में बंगाल की एक ऐसी खबर है जो दिल्ली के किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। होनी चाहिए थी। दि एशियन एज की खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल के पूजा पंडाल में नॉन वेज पर प्रतिबंध के विश्व हिन्दू परिषद के आदेश को लेकर विवाद। दिल्ली के पूजा पंडाल के मामले में ऐसे प्रतिबंध की सूचना नहीं है और पूजा पंडाल में मांसाहार मिलता भी नहीं है। बंगाल में ऐसा क्यों है समझना मुश्किल नहीं है लेकिन है तो है, नहीं मानने वालों को अखलाक होने से कौन बचाएगा राम जानें। हालांकि जो अपना चढ़ावा नहीं संभाल पाए उनसे भी क्या उम्मीद।
राहुल गांधी के खिलाफ अब एफआईआर से लग रहा है कि भाजपा अपनी राजनीति कर रही है। फंस गई है तो स्पष्टीकरण दे रही है कि भाजपा इसमें शामिल नहीं है। जैसा मैंने कल लिखा था, ऐसा ही है तो पुलिस एफआईआर क्यों नहीं कर रही है? अब मेरा सवाल है कि जो पुलिस राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे की मांग और जेपी नड्डा के आश्वासन पर कई दिनों से एफआईआर नहीं लिख रही है उसी पुलिस ने राहुल गांधी के ‘अपराध’ के अगले ही दिन एफआईआर कैसे लिख ली? वह भी उसी की जो कथित शुद्धीकरण में शामिल था। इस मामले को अपमान और जातिगत रंग देने का काम तो मल्लिकार्जुन खरगे ने भी किया है। कल अपने प्रदर्शन और मनुस्मृति की प्रतियां जलाने जैसी कार्रवाई के जरिए कांग्रेस के कई लोगों ने किया है। लेकिन एफआईआर सिर्फ राहुल गांधी के खिलाफ हुई है तो संभव है कि राजनीति चल रही हो।
राहुल गांधी राजनीति कर रहे हों तो भी उनकी मांग संविधान के अनुकूल है लेकिन खरगे के मामले में जो किया गया और उसे शुद्धीकरण कहा गया है तो अपराध हुआ लगता है और एफआईआर की मांग बहुत बड़ी या तकनीकी नहीं है। तथ्य तो जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे। लेकिन राहुल गांधी की (मांग पर भी) एफआईआर नहीं होना और राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर हो जाना बताता है कि मामला राजनीतिक है और पुलिस का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसीलिए कहा और प्रचारित किया जा रहा है कि भाजपा शामिल नहीं है जबकि उसके शामिल होने का संदेह (सबूत भी कह सकते हैं) यही है कि एफआईआर अभी तक नहीं हुई है और दूसरी हो गई।
जहां तक ‘मंच पर पीछे छोड़ी गई गंदगी’ साफ करने की बात है, इसे शुद्धीकरण नहीं कहा जाता है और ऐसी सफाई हमेशा से होती रही होगी। गंदगी नहीं की जाए तब भी किसी जगह और मंच की सफाई होती रहती है। शुद्धिकरण बिल्कुल अलग चीज है। किसी मनुष्य के उपयोग या स्पर्श के बाद एफआईआर की मांग इसी की जांच के लिए की जा रही है जो पुलिस को अभी तक कर देना चाहिए था। अगर उसे यकीन है कि मामला ऐसा नहीं है तो इतने दिनों में वह जांच करके अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक कर सकती थी। अगर ऐसा किया होता तो एफआईआर करने की मांग की जरूरत ही नहीं होती जैसे पेलेट गन चलाने के मामले में हुई और गृहमंत्री का बयान हो गया होता तो नहीं होती।
खबरों की प्रस्तुति और उसे महत्व दिए जाने तथा नहीं दिए जाने से अखबारों का पक्षपात भी जाहिर हो रहा है। दैनिक भास्कर में यह खबर चार कॉलम में है। शीर्षक है, “शुद्धिकरण विवाद : राहुल गांधी पर एससी-एसटी एक्ट में एफआईआर”। खबर के एक अंश का शीर्षक बोल्ड फौन्ट में है, इन धाराओं में हुआ केस। कहने की जरूरत नहीं है कि यह खबर है, पक्षपात नहीं। देशबन्धु और नवोदय टाइम्स में राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अंग्रेजी अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर है और अंदर पेज आठ पर विवरण होने की सूचना।
टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर राहुल गांधी की आधे कॉलम की फोटो के साथ सिंगल कॉलम की खबर है। चार लाइन का शीर्षक और 25 लाइन की खबर है। अंदर पेज 16 पर भी कुछ है जिसे मिसलीडिंग कहा गया है। यहां पता चला कि एफआईआर करवाने वाले ने राहुल गांधी की टिप्पणी को भ्रम फैलाने वाला कहा है। खबर का यह शेष एक मुख्य खबर के साथ है जिसका शीर्षक है, “प्रियंका ने प्रधानमंत्री से कहा – ‘शुद्धिकरण’ करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो”। खबर के अनुसार यह एक्स पर प्रियंका गाधी की पोस्ट है। द हिन्दू में पहले पन्ने पर विज्ञापन नहीं है लेकिन राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की खबर नहीं है।
दि इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर तीन कॉलम में है और विपक्ष के नेता के खिलाफ एक वाल्मीकि निवासी की शिकायत के आधार पर एफआईआर हुई है – फ्लैग शीर्षक है। मुख्य शीर्षक है – खरगे (से संबंधित) शुद्धीकरण विवाद एफआईआर की मांग के अगले ही दिन राहुल के खिलाफ हल्द्वानी में मामला दर्ज। अखबार ने राहुल गांधी की फोटो के नीचे शिकायत का अंश कैप्शन के रूप में बोल्ड अक्षरों में छापा है – राहुल गांधी ने इसे बगैर पुष्टि किए अस्पृश्यता की कार्रवाई कहा है। मुद्दा यह है कि वे और मल्लिकार्जुन खरगे तो ऐसा कई दिनों से कह रहे हैं। एफआईआर नहीं हुई है जबकि मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि इससे भाजपा का संबंध नहीं है। पुलिस ने ना एफआईआर की है और ना कोई अधिकृत जानकारी दी है। एफआईआर तो नहीं ही की है।
दूसरी ओर राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर हो गई है। जाहिर है, मामला भाजपा या सत्तारूढ़ पार्टी या उसके पितृ संगठन से जुड़ा लगता है। उसकी खबर कौन देगा या क्यों नहीं है? दि एशियन एज में राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की खबर तो पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन एक्स पर प्रियंका गांधी की पोस्ट वाली खबर अंदर होने की सूचना पहले पन्ने पर है। राष्ट्रीय खबरों के पन्ने पर छपी प्रियंका गांधी की पोस्ट वाली इस खबर के साथ राहुल गांधी के खिलाफ हलद्वानी में एफआईर की खबर लाल स्याही से छपी है। दो लाइन के इस शीर्षक की पहली लाइन काली स्याही में ही है और इसमें ‘जातिवादी रंग’ दिए जाने को सिंगल कोट में रखा गया है।
* अखबारों में दो तरह से लिखा है। यहां भी दोनों है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


