संजय सिन्हा-
मतलब अब सच में संपादक नहीं बचे
ज़ी टीवी वाले सुभाष चंद्रा और मुकेश अंबानी की लड़ाई में मुझे एक चीज़ दिखाई दे रही है, जिस पर शायद आपका ध्यान नहीं गया।
मुझे न सुभाष चंद्रा का कर्ज दिखाई दे रहा है, न मुकेश अंबानी की ताकत। मुझे तो इस पूरी लड़ाई में भारतीय पत्रकारिता का एक ऐसा सच दिखाई दे रहा है, जिसे सुनकर किसी पत्रकार को शर्म आनी चाहिए।
आपका ध्यान इस बात पर गया कि सुभाष चंद्रा के हजारों करोड़ के लोन में से कुछ करोड़ देकर मामला निपट गया। आपका ध्यान इस बात पर भी गया कि जब इसे बैंकों में जमा जनता के पैसे की लूट कहा गया तो सुभाष चंद्रा सामने आए और उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब मुकेश अंबानी के इशारे पर उनके खिलाफ चलाया गया दुष्प्रचार है।
लेकिन मुझे एक दूसरी बात सुनाई दी। और वही बात मुझे परेशान कर रही है। सुभाष चंद्रा ने बताया कि जब उनके खिलाफ खबरें चलीं तो उन्होंने न्यूज18 के संपादक को फोन किया और पूछा कि भाई, अपने चैनल पर मेरे खिलाफ उल्टा-पुल्टा क्यों दिखा रहे हो?
सुभाष चंद्रा के अनुसार संपादक ने साफ कहा कि हुजूर, हम कुछ नहीं चला रहे हैं। जो चला रहे हैं, ऊपर के कहने पर चला रहे हैं।
अब जरा इस एक वाक्य को पकड़िए। “ऊपर के कहने पर।”
यानी संपादक खुद कह रहा है कि खबर संपादक की मर्जी से नहीं चल रही। ऊपर से कहा गया, इसलिए चल रही है। क्योंकि सुभाष चंद्रा ने स्पष्ट रूप से अपने वीडियो में ये कहा है तो कभी संपादक रहे संजय सिन्हा के लिए हजारों करोड़ के लोन माफ करा लेने की खबर से ज्यादा बड़ी खबर यही है।
लोन का हिसाब बैंक करेंगे। आरोपों का हिसाब अदालत करेगी। मुकेश अंबानी और सुभाष चंद्रा की लड़ाई में कौन सही है और कौन गलत, यह भी वक्त बताएगा। लेकिन पत्रकारिता का हिसाब कौन करेगा?
वह पत्रकारिता जिसमें संपादक के पास खबर रोकने या चलाने का अधिकार ही नहीं, सिर्फ ऊपर से आया आदेश पढ़ने की जिम्मेदारी है।
यही वो सूचना है, जो किसी संपादक के लिए कलंक है। जी हां, मैं पूरे होशो-हवास में कह रहा हूं, कलंक।
मैंने पत्रकारिता में 32 साल बिताए हैं। संपादक को मैंने कभी मालिक का कर्मचारी नहीं माना। संपादक वह आदमी होता था जो मालिक से भी कह सकता था कि यह खबर नहीं चलेगी। सरकार से भी कह सकता था कि यह खबर चलेगी। मंत्री से भी सवाल पूछ सकता था और अपने ही मालिक से भी।
आज अगर संपादक यह कहने लगे कि हम कुछ नहीं कर सकते, ऊपर से कहा गया है इसलिए खबर चल रही है, तो फिर संपादक बचा कहां?
फिर न्यूज़रूम में संपादक की कुर्सी क्यों है? एक कंप्यूटर रख दीजिए। ‘ऊपर’ से खबर आई, कंप्यूटर में डाल दीजिए। ‘ऊपर’ से हेडलाइन आई, वह भी डाल दीजिए।
‘ऊपर’ से कह दिया कि आज फलां आदमी देशद्रोही है, तो वह भी चला दीजिए। ऊपर से कह दिया कि फलां आदमी महान है, तो उसकी आरती भी चला दीजिए। फिर पत्रकारिता कहां बची?
मुझे फर्क इस बात से पड़ता है कि आज खबर कौन तय करता है? संपादक? पत्रकार? या मालिक? और अगर जवाब मालिक है तो फिर हम किस चीज़ को पत्रकारिता कह रहे हैं?
आपने कभी गौर किया है कि अब बहुत से लोग कहते हैं, “मैं फलां चैनल खबर देखने के लिए नहीं, रुबिका को देखने के लिए देखता हूं।” कोई कहता है, “मैं चित्रा को देखने के लिए देखता हूं।” कोई किसी और एंकर का नाम लेता है।
यानी हमें अब खबर में दिलचस्पी नहीं है। हमें एंकर में दिलचस्पी है। हमें खबर नहीं चाहिए, हमें अपना पसंदीदा चेहरा चाहिए। हमें तथ्य नहीं चाहिए, हमें अपनी पसंद का नैरेटिव चाहिए। और चैनल भी समझ चुका है कि अब दर्शक पत्रकारिता नहीं, चेहरा देखता है।
इसलिए शायद आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सुभाष चंद्रा और मुकेश अंबानी के बीच जंग में कौन जीतेगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकारिता कब हारेगी? और डर यही है कि कहीं वह हार तो नहीं चुकी?
हम टीवी खोलकर खबर देखते हैं और सोचते हैं कि हमें देश की सच्चाई दिखाई जा रही है। क्या पता, हमें सिर्फ वही दिखाया जा रहा हो, जिसे कोई ‘ऊपर’ से दिखाना चाहता है। और अगर ऐसा है तो फिर खबर देखने वाला दर्शक नहीं रहा। वह सिर्फ दर्शक बन गया है।
और पत्रकार..? वह सिर्फ स्क्रीन पर दिखाई देने वाला आदमी रह गया है।
नोट-
- सभी संपादकों को इस बयान को गंभीरता से लेना चाहिए कि खबरें ऊपर से तय होती हैं।
- डरा हुआ संपादक, संपादक नहीं होता। गुलाम होता है।
- जिस संपादक की कलम मालिक के डर से चलती हो, उसकी कुर्सी संपादक की हो सकती है, आत्मा नहीं।
- संपादक की पहचान उसकी कुर्सी से नहीं, इस बात से होती है कि वह किसके सामने झुकने से इनकार करता है।
- जिस दिन संपादक सच लिखने से डर जाए, उसी दिन पत्रकारिता की रीढ़ टूट जाती है।
- संपादक की असली ताकत उसकी कलम में नहीं, उसके फैसले में होती है।
- अच्छा संपादक अखबार या न्यूज चैनल नहीं चलाता, वह समय का दस्तावेज़ तैयार करता है।
एक्स्ट्रा- मुझे नहीं पता कि न्यूज 18 के संपादक कौन हैं। लेकिन उन्हें इस सच के साथ सामने आना चाहिए कि क्या उन्होंने सुभाष चंद्रा से कहा कि खबरें ऊपर से तय होती हैं? अगर हां, तो लानत है संपादक होने पर।


