10 साल ‘काम‘ करने की खुली छूट। ‘काम‘ करने के छह साल बाद ‘हटाया‘ और खबर पहले पन्ने पर चार कॉलम में क्योंकि बड़ी कार्रवाई है और गाज भी गिराई गई है जैसे भारत को सौंप दिया गया हो कि जो चाहो करो ….
संजय कुमार सिंह
आज दो खबरों की प्रस्तुति दिलचस्प है। पहली, देशबंधु की लीड – राहुल गांधी ने शुद्धिकरण पर भाजपा-आरएसएस को घेरा। (कहा) दोनों दलितों को आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहते हैं। दूसरी खबर न्यूयॉर्क के वन वर्ल्ड वन ह्यूमैनिटी कार्यक्रम में मोहन भागवत ने जो कहा। देशबन्धु का शीर्षक के अनुसार, अगर कोई सोचता है कि भारत में मुस्लिम नहीं होना चाहिए तो वह हिन्दू नहीं रहेगा। देशबन्धु की लीड एक ऐसी खबर है जो पुरानी है, पहले ही छपनी चाहिए थी, कार्रवाई हो जानी चाहिए थी पर अभी तक नहीं हुई है। कल प्रेस कांफ्रेंस के बावजूद आज अंग्रेजी अखबारों में कायदे की खबर सिर्फ द टेलीग्राफ में है।
पेश है, द टेलीग्राफ की खबर के शुरुआती हिस्से का हिन्दी अनुवाद। इससे आपको मामले की मौजूदा स्थिति समझने में सहूलियत होगी। नई दिल्ली डेटलाइन से फ़िरोज़ एल. विंसेंट की खबर इस प्रकार है – “राहुल गांधी ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मांग की कि एक एफआईआर दर्ज करने में दखल दें। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कथित जातिगत अपमान के तीन हफ़्ते बीत चुके हैं और पुलिस की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई है। (मामला उत्तराखंड का है और वहां भारतीय जनता पार्टी की डबल इंजन की सरकार है।)*
राज्यसभा में विपक्ष के नेता और दलित, खड़गे ने संसद में बताया था कि उत्तराखंड के हल्द्वानी में 8 अगस्त को एक रैली को संबोधित करने के बाद, “बीजेपी के सभी लोग एकजुट हुए और मंच की ‘शुद्धि’ के लिए हवन किया”। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पत्रकारों से कहा, “आप इसे शुद्धिकरण कह सकते हैं, लेकिन यह असल में छुआछूत का ही दूसरा नाम है… छुआछूत गैर-कानूनी है, फिर भी बीजेपी सदस्य खुलेआम छुआछूत फैला रहे हैं। जब वे यह शुद्धिकरण करते हैं, तो उनका मतलब होता है कि दलितों को छुआ अशुद्ध हो गया …. दलित अशुद्ध हैं। (भारत में)* यह एक अपराध है…”। उन्होंने आगे कहा, “यह हरकत एससी/एसटी एक्ट का उल्लंघन है… इसलिए, हमारी मांग है कि जिन लोगों ने शुद्धिकरण किया, उनके खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए।”
दूसरी खबर एक बयान, विचार या भाषण है जो अमेरिका में दिया गया है और सबको पता है कि व्यवहार में नहीं है या आरएसएस के सामान्य व्यवहार से अलग है। फिर भी इसे प्रचार दिया गया है और यकीन दिलाने के लिए 1996 का उदाहरण दिया गया है। नवोदय टाइम्स ने इसका शीर्षक भी दो कॉलम में लगाया है, गलत नैरेटिव के कारण आरएसएस को लेकर धारणाएं। देश में राजनीति के लिए सही या गलत नैरेटिव बनाने का काम कौन करता रहा है और कौन चूकता रहा है, कहने की जरूरत नहीं है। फिर भी अब संघ प्रमुख को यह सब बोलना और करना पड़ रहा है तो खबर वह भी है।
इसमें शुद्धिकरण और ऐसे मुद्दों पर घिर जाना शामिल है। नवोदय टाइम्स में राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस की खबर नहीं है तो दैनिक भास्कर में दोनों खबरें लगभग बराबर छपी हैं। अमर उजाला में पहले पन्ने पर भागवत हैं, शुद्धिकरण नहीं। देशबन्धु में भागवत पहले पन्ने पर नहीं हैं। यह तो हुई हिन्दी अखबारों की बात। अंग्रेजी अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया में मोहन भागवत तो पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में हैं लेकिन शुद्धिकरण की खबर हीं है। इंडियन एक्सप्रेस में शुद्धिकरण की खबर दो कॉलम में टॉप पर है लेकिन भागवत की खबर तीन कॉलम में नीचे की तरफ है। शीर्षक वही है जो नवोदय टाइम्स में है।
इंडियन एक्सप्रेस में शुद्धिकरण वाली खबर है तो टॉप पर लेकिन इसमें भाजपा का प्रचार ज्यादा है, मुद्दा कम। कहने की जरूरत नहीं है कि मुद्दा देशबन्धु की खबर है जो ऊपर बता चुका हूं। द टेलीग्राफ भी है। एक्सप्रेस में फ्लैग शीर्षक है, विपक्ष के नेता ने कहा – दलितों के खिलाफ भेदभाव होता है। मुख्य शीर्षक है, खरगे शुद्धिकरण विवाद राहुल ने एफआईआर की मांग की, धामी ने पलटवार किया, कहा भाजपा से कोई संबंध नहीं। उपशीर्षक वह है जो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है, कांग्रेस के पास मुद्दे नहीं हैं, उत्तराखंड में कोई भी खरगे जी की जाति नहीं जानता है; समूह गंदगी साफ कर रहा था।
एक पाठक के रूप में मैं यही जानता-पढ़ता रहा हूं कि मामला ‘शुद्धिकरण’ का ही, एफआईआर नहीं हुई है और अगर सफाई ही हो रही थी तो मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्य सभा में आरोप लगाया गया तब क्यों नहीं कहा गया। आरोप सही है तो अभी तक कार्रवाई शुरू हो जानी चाहिए थी पर ऐसी कोई खबर नहीं है। एआई, गूगल जेमिनाई और मेरी जानकारी के अनुसार क्रोनोलॉजी और विवरण कुछ इस प्रकार है : उत्तराखंड के हलद्वानी (रामलीला मैदान) में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद आयोजित किए गए “शुद्धिकरण यज्ञ/हवन” के बाद राजनीतिक विवाद शुरू हुआ।
रैली 8 अगस्त 2026 को हुई थी। 10 अगस्त 2026 को कथित शुद्धिकरण यज्ञ हुआ था। रैली के दो दिन बाद ‘श्री राम सेना’ नामक संगठन के कार्यकर्ताओं ने उसी रामलीला मैदान के मंच पर जाकर हवन और “शुद्धिकरण” किया। 11–12 अगस्त 2026 को मामला मीडिया में आने के बाद उत्तराखंड कांग्रेस ने इसे खरगे के दलित होने से जोड़ते हुए बीजेपी और उससे जुड़े संगठनों पर छुआछूत/जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया। 13 अगस्त 2026 को मामला संसद में उठाया गया। मल्लिकार्जुन खरगे ने खुद राज्यसभा में मुद्दा उठाया और कहा कि उन्हें अछूत होने का अहसास कराया गया है।
26-27 अगस्त 2026 को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने एक बयान में शुद्धिकरण का बचाव करते हुए कहा कि वहां आपत्तिजनक नारे लगे थे और धार्मिक मंच की पवित्रता के लिए ऐसा किया गया। इसका किसी व्यक्ति की जाति से लेना-देना नहीं है। 29 अगस्त 2026 को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि यह शुद्धिकरण “छुआछूत” का ही रूप है। उन्होंने इस मामले में एससी / एसटी अधिनियम के तहत एफआईआर एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
कहने की जरूरत नहीं है कि किसी को अपमानित करने के लिए उसकी जाति महत्वपूर्ण नहीं है। अपमान अलग मु्द्दा है और कार्रवाई उसमें भी होनी चाहिए। अपमानित की जाति मुद्दा हो या नहीं, अपमान की शिकायत करने पर कार्रवाई होती रही है। वीर सावकर के अपमान की शिकायत अभी भी दर्ज होती है तो कांग्रेस अध्यक्ष के अपमान की शिकायत क्यों नहीं दर्ज हुई। व्यवहार से अपमानित किया ही जा सकता है और शिकायत करने पर मामला बनता ही है। अपमान करने वालों का भाजपा या सत्तारूढ़ पार्टी से संबंध नहीं है तो सरकार (असल में पुलिस को) किसी आदेश का इंतजार किए बगैर कार्रवाई करनी चाहिए थी।
एफआईआर तो हो ही जानी चाहिए थी। कम से कम खरगे के राज्य सभा में आरोप लगाने के बाद। जपा नेता और राज्यसभा में सदन के नेता जेपी नड्डा ने इसे दुखद बताते हुए जांच कराने का आश्वासन दिया और कहा कि बीजेपी ऐसी सोच का समर्थन नहीं करती। अब सवाल यह नहीं है कि भाजपा से संबंध है कि नहीं है और है तो क्या होगा। सवाल यह है कि जांच हुई या नहीं? जांच हुई तो नतीजा क्या निकला और नहीं हुई तो क्यों? जांच कौन कर रहा है, एफआईआर हुई या नहीं, जांच अधिकारी की नियुक्ति कैसे हुई या क्यों नहीं हुई।
खबर यह सब होनी थी, होती रहनी चाहिए थी और हुई होती तो मुख्यमंत्री अब नहीं कहते कि भाजपा से संबंध नहीं है। जाहिर है, एक्सप्रेस निष्पक्ष पत्रकारिता और सबको समान महत्व देने के दिखावे के साथ धामी या भाजपा के पक्ष का प्रचार कर रहा है। मोहन भागवत का प्रचार भी है ही। हिन्दुस्तान टाइम्स में दोनों खबरें लगभग बराबर में सिंगल कॉलम में है। वैसे इसमें कोई दो राय नहीं है कि दोनों मामले किसी भी तरह से बराबर नहीं हैं।
द हिन्दू में शुद्धिकरण मामले की खबर कांग्रेस-भाजपा टकराव के रूप में है। यह अखबार का अपना अंदाज हो सकता है और इसी अंदाज में सज्जन कुमार को श्रद्धांजलि देने के लिए भाजपा के तीन सांसदों से नाखुशी जताने के मामले की रिपोर्ट है। खबर के अनुसार, भाजपा नेतृत्व ने दिल्ली के अपने तीन सांसदों द्वारा कांग्रेस के दिवंगत नेता सज्जन कुमार को श्रद्धांजलि देने पर नाराज़गी जताई है। सज्जन कुमार 1984 के सिख-विरोधी दंगों में शामिल होने के कारण जेल की सज़ा काट रहे थे। बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने शनिवार को कमलजीत सहरावत, रामवीर सिंह बिधूड़ी और योगेंद्र चंदोलिया को बुलाकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की।
पार्टी को अपने सांसदों का सज्जन कुमार के घर जाकर शोक व्यक्त करना मंज़ूर नहीं है। दंगा पीड़ितों के वकील एचएस फूलका द्वारा इस दौरे की खुलकर आलोचना किए जाने के बाद यह मामला विवादों में आ गया। फूलका ने कहा कि ये सांसद तब कुमार के घर गए, जब बीजेपी ने हमेशा पीड़ितों को न्याय दिलाने की कोशिशों का समर्थन किया है। आप जानते हैं कि अल्पसंख्यकों के प्रति कांग्रेस और भाजपा का रुख क्या रहा है। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता को कांग्रेस के हिन्दू विरोध के रूप में पेश किया जाता है। इस लिहाज से 1984 में सिखों के खिलाफ हिंसा को कांग्रेस की हिंसा कहा जाता रहा है। कोई भी जानता है कि वह सिर्फ कांग्रेसियों का कारनामा तो नहीं ही था, हिन्दू भी शामिल रहे ही होंगे।
जो भी हो, संघ प्रमुख ने जैसा कहा है, गलत नैरेटिव हो सकता है और उस हिंसा को कांग्रेसियों की हिंसा करना शत प्रतिशत सही भी नहीं हो सकता है। परेशानी इसी कारण है और खबर यही है कि फूलका की आलोचना के बाद राजनीति गर्माई है। कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं का बचाव भाजपा की तरह तो नहीं ही करती है और यह खरगे के अपमान के मामले में भी दिख रहा है। सज्जन कुमार को सजा हुई ही थी जबकि दल बदलने से कई लोग कई मामलों में सजा से बचे हुए हैं और भाजपा को वाशिंग मशीन पार्टी कहा जाता है।
देश में दंगे हिन्दू मुसलमान के होते हैं तो उसमें भाजपा और संघ का नाम आता है। समझौता एक्सप्रेस विस्फोट और मालेगांव विस्फोट के अभियुक्त कौन थे सबको पता है। भले अपराध साबित नहीं हुआ इसका मतलब यह नहीं है कि अपराध हुआ नहीं ना असली अभियुक्ति मिले। इसलिए साबित क्यों नहीं हुआ, समझना मुश्किल नहीं है। समझौता एक्सप्रेस मामले में तो फैसले में भी लिखा है लेकिन ऊपर की अदालत में सरकार ने अपील ही नहीं की। तरुण तेजपाल और अरविन्द केजरीवाल के मामले में अपील की तेजी का रिकार्ड है। ऐसे में 1984 की सिख विरोधी हिंसा को भाजपा हमला प्रचारित करती रही है। कांग्रेस नेता को सजा भी हुई इससे दोनों पार्टियों के अंतर को भी समझा जा सकता है। लेकिन वह अलग मुद्दा है।
* खबर में कोष्ठक वाले अंश मेरे हैं।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


