Connect with us

Hi, what are you looking for?

सियासत

मोदी सरकार के दौर में भारत आर्थिक और लोकतांत्रिक मोर्चों पर पिछड़ा : रिपोर्ट

Person wearing a Narendra Modi mask and pink shirt, making a peace sign with fingers; image accompanies a headline about poverty in India.

नई दिल्ली। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी 2014 का लोकसभा चुनाव नहीं जीतते तो भारत आज आर्थिक रूप से अधिक समृद्ध और लोकतांत्रिक रूप से अधिक मजबूत होता। यह दावा टेक्सास टेक यूनिवर्सिटी के दो शोधकर्ताओं की एक नई रिसर्च स्टडी में किया गया है।

शोधकर्ताओं केविन ग्रियर और रॉबिन ग्रियर की स्टडी का शीर्षक ‘Promises, Promises: Governance and Growth in India under Modi and the BJP’ है। रिपोर्ट में मोदी सरकार के करीब एक दशक के कार्यकाल की तुलना एक काल्पनिक या ‘सिंथेटिक इंडिया’ मॉडल से की गई है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि मोदी सरकार के दौर में भारत ने शासन और लोकतंत्र से जुड़े 10 महत्वपूर्ण संकेतकों के साथ-साथ प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में भी अपने संभावित प्रदर्शन से कमजोर प्रदर्शन किया।

रिपोर्ट में क्या है बड़ा दावा?

शोधकर्ताओं ने सवाल उठाया कि अगर 2014 में भारत में मोदी सरकार नहीं आती और देश पहले की तरह अपनी नीतियों के साथ आगे बढ़ता, तो आज उसकी स्थिति क्या होती?

स्टडी के अनुसार, वर्ष 2023 तक भारत की प्रति व्यक्ति आय वास्तविक स्थिति से करीब 1,000 डॉलर अधिक हो सकती थी। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार कम होता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समेत कई लोकतांत्रिक संकेतकों पर भारत की स्थिति बेहतर होती।

रिपोर्ट में जिन प्रमुख संकेतकों को शामिल किया गया, उनमें—

  • राजनीतिक भ्रष्टाचार
  • लोकतंत्र या पॉलीआर्की
  • उदार लोकतंत्र
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • धर्म की स्वतंत्रता
  • संगठन बनाने की स्वतंत्रता
  • कानून के समक्ष समानता
  • कानून के तहत समान सुरक्षा
  • कार्यपालिका पर न्यायिक नियंत्रण
  • कार्यपालिका पर विधायी नियंत्रण शामिल हैं।

रिपोर्ट का दावा है कि इन सभी 10 संकेतकों में भारत का प्रदर्शन उसके काल्पनिक या संभावित विकल्प की तुलना में खराब रहा। इनमें से आधे मामलों में गिरावट 45 फीसदी से भी अधिक बताई गई है।

भ्रष्टाचार पर भी सवाल

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014 के बाद से 2023 तक राजनीतिक भ्रष्टाचार में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। अध्ययन में इस्तेमाल किए गए भ्रष्टाचार सूचकांक में अधिक स्कोर का मतलब अधिक भ्रष्टाचार है।

शोधकर्ताओं ने इसे इसलिए महत्वपूर्ण बताया क्योंकि नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनाव अभियान में भ्रष्टाचार कम करने को प्रमुख मुद्दा बनाया था। रिपोर्ट के मुताबिक, स्टडी के निष्कर्ष इस मोर्चे पर सरकार के दावों के अनुरूप नहीं पाए गए।

क्या है ‘सिंथेटिक इंडिया’ मॉडल?

इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका काउंटरफैक्चुअल एनालिसिस है। यानी शोधकर्ता केवल यह नहीं देख रहे थे कि 2013 की तुलना में 2023 में भारत बेहतर हुआ या खराब, बल्कि यह जानने की कोशिश की गई कि अगर 2014 में मोदी सरकार नहीं आती तो भारत की स्थिति क्या हो सकती थी।

इसके लिए शोधकर्ताओं ने एक काल्पनिक ‘सिंथेटिक इंडिया’ तैयार किया। इसमें चीन, बांग्लादेश, इथियोपिया, पाकिस्तान, अर्जेंटीना, ब्राजील, वियतनाम और अन्य देशों के अलग-अलग प्रदर्शन संकेतकों को मिलाकर ऐसा मॉडल बनाया गया, जो 2014 से पहले के भारत से सबसे अधिक मिलता-जुलता हो।

इसके बाद 1984 से 2013 तक के दौर को प्री-ट्रीटमेंट पीरियड और 2014 से 2023 तक के दौर को मोदी सरकार के प्रभाव वाले काल के रूप में देखा गया।

सभी संकेतकों में गिरावट का दावा

रिपोर्ट के अनुसार, तैयार किए गए ‘सिंथेटिक इंडिया’ मॉडल ने अध्ययन किए गए सभी प्रमुख शासन और लोकतांत्रिक संकेतकों पर वास्तविक भारत की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया।

शोधकर्ताओं का कहना है कि मोदी के कार्यकाल के बाद भारत इन संकेतकों पर अपने संभावित प्रदर्शन से काफी पीछे चला गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार एकमात्र ऐसा संकेतक था जिसमें बढ़ोतरी हुई।

हालांकि शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्षों की जांच के लिए अन्य देशों पर भी इसी तरह के परीक्षण किए। रिपोर्ट के मुताबिक, इन तथाकथित ‘प्लेसबो टेस्ट’ के नतीजों ने भारत के संबंध में शुरुआती निष्कर्षों को समर्थन दिया।

प्रति व्यक्ति जीडीपी पर क्या कहती है स्टडी?

रिपोर्ट का एक प्रमुख निष्कर्ष भारत की प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी को लेकर है। शोधकर्ताओं ने इसके लिए आधिकारिक रूप से स्वीकार किए गए जीडीपी आंकड़ों का इस्तेमाल किया है।

स्टडी में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी के लिए तैयार सिंथेटिक मॉडल में बांग्लादेश, चीन, इथियोपिया, पाकिस्तान और फिलीपींस को अलग-अलग अनुपात में शामिल किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, अगर भारत का प्रति व्यक्ति उत्पादन वास्तविक स्थिति से 1,000 डॉलर अधिक होता तो चार सदस्यों वाले एक परिवार की आय, समान वितरण की स्थिति में, लगभग 27,000 रुपये प्रति माह अधिक हो सकती थी।

पूरी अर्थव्यवस्था के स्तर पर यह अंतर सालाना करीब 1.4 ट्रिलियन डॉलर के अतिरिक्त आर्थिक उत्पादन के बराबर हो सकता था। हालांकि रिपोर्ट यह भी कहती है कि इस स्थिति में भी भारत विश्व बैंक की अपर-मिडिल इनकम श्रेणी की सीमा से नीचे ही रहता।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में 56.2 फीसदी का अंतर

रिपोर्ट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी प्रमुख संकेतक के रूप में शामिल किया गया है। शोधकर्ताओं ने केवल लोगों की अपनी बात कहने की क्षमता नहीं, बल्कि उस व्यापक माहौल का अध्ययन किया जिसमें लोग अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं।

स्टडी के अनुसार, अध्ययन अवधि के अंत तक भारत का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा स्कोर उसके ‘सिंथेटिक काउंटरफैक्चुअल’ से 56.2 फीसदी नीचे था।

रिपोर्ट में इन संकेतकों के लिए V-Dem के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। शोधकर्ताओं ने संभावित पक्षपात के सवाल पर भी चर्चा की और कहा कि 10 अलग-अलग संकेतकों पर एक जैसे रुझान मिलने के कारण केवल किसी एक सूचकांक के पक्षपात से नतीजों को खारिज करना आसान नहीं है।

धर्म की स्वतंत्रता में सबसे बड़ी गिरावट का दावा

स्टडी के मुताबिक, धर्म की स्वतंत्रता के मामले में भारत और उसका सिंथेटिक मॉडल 2014 से पहले काफी हद तक एक जैसे रुझान दिखाते थे। लेकिन मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद दोनों के बीच अंतर तेजी से बढ़ा।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2013 के स्तर की तुलना में धर्म की स्वतंत्रता के मामले में भारत और उसके सिंथेटिक मॉडल के बीच 168.7 फीसदी का अंतर पैदा हो गया।

V-Dem के पैमाने में यह देखा जाता है कि क्या सरकार और प्रशासन लोगों तथा समूहों को बिना सरकारी हस्तक्षेप के अपना धर्म चुनने, बदलने, उसका पालन करने और शांतिपूर्ण तरीके से उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देते हैं।

अगर प्रदर्शन कमजोर रहा तो बीजेपी चुनाव क्यों जीतती रही?

रिपोर्ट में यह सवाल भी उठाया गया है कि अगर मोदी सरकार का प्रदर्शन उसके चुनावी वादों के अनुरूप नहीं रहा, तो बीजेपी लगातार चुनावों में सफल क्यों रही?

शोधकर्ताओं ने इसके पीछे भारत की फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट चुनाव प्रणाली और विपक्षी दलों के बिखराव को एक बड़ा कारण बताया है।

रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी देश की सबसे बड़ी एकल पार्टी जरूर है, लेकिन उसके पास कुल मतदाताओं का पूर्ण बहुमत नहीं है। विपक्ष के बिखराव ने बीजेपी की चुनावी सफलता और सरकार चलाने की क्षमता को मदद पहुंचाई है।

शोधकर्ताओं ने एक दूसरा संभावित कारण भी बताया है। उनका कहना है कि संभव है मोदी समर्थक ‘गुड गवर्नेंस’ और ‘मैक्सिमम गवर्नेंस’ की परिभाषा को शोधकर्ताओं से अलग तरीके से देखते हों।

रिपोर्ट में उदाहरण देते हुए कहा गया है कि कुछ समर्थकों के लिए जिन बदलावों को शोधकर्ता लोकतांत्रिक गिरावट मान रहे हैं, उन्हें वे सकारात्मक विकास के रूप में देख सकते हैं।

मोदी सरकार के वादों पर उठाए सवाल

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ और ‘गुजरात मॉडल’ के आधार पर बेहतर प्रशासन और आर्थिक विकास का वादा किया था।

टेक्सास टेक यूनिवर्सिटी के दोनों शोधकर्ताओं की यह स्टडी इन दावों को आंकड़ों और एक वैकल्पिक मॉडल के जरिए परखने की कोशिश करती है।

रिपोर्ट का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि अगर 2014 के बाद भारत का राजनीतिक और नीतिगत रास्ता अलग होता तो देश लोकतंत्र, संस्थानों, शासन और प्रति व्यक्ति आय के मामले में वर्तमान स्थिति से बेहतर प्रदर्शन कर सकता था। हालांकि यह निष्कर्ष एक काउंटरफैक्चुअल या ‘सिंथेटिक कंट्रोल’ मॉडल पर आधारित है, यानी यह वास्तविक इतिहास की तुलना में एक सांख्यिकीय वैकल्पिक परिदृश्य का आकलन है।

रिपोर्ट ने मोदी सरकार के करीब एक दशक के शासन को लेकर आर्थिक विकास, लोकतंत्र, स्वतंत्रता और संस्थागत मजबूती के दावों पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है।


मुकेश गर्ग-

टेक्सास टेक यूनिवर्सिटी के एक शोध के अनुसार यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव हार गए होते और उनकी सरकार नहीं बनी होती, तो आज की तुलना में भारत कहीं अधिक समृद्ध और लोकतांत्रिक होता।

मोदी सरकार के एक दशक की तुलना 2014 से पहले के एक दशक के परिणामों से करते हुए टेक्सास टेक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता केविन ग्रियर और रॉबिन ग्रियर लिखते हैं – “मोदी का शासन, मूल रूप से, टूटे और झूठे वादो का काल है!”

केविन राजनीति विज्ञान विभाग में और रॉबिन विश्वविद्यालय के कृषि और अनुप्रयुक्त अर्थशास्त्र विभाग में कार्यरत हैं।

उनकी रिपोर्ट में आंकड़ों की तुलना में पाया गया है कि मोदी के नेतृत्व वाले एक दशक के दौरान, भारत का प्रदर्शन दस महत्वपूर्ण सूचकांकों पर गिरा है और प्रति व्यक्ति जीडीपी के संदर्भ में भी 2014 से पहले के दशक की तुलना में भारत का प्रदर्शन मोदी सरकार के दौरान गिरा है।

उनकी रिपोर्ट इस बात का विश्लेषण करती है कि अगर भारत में मोदी सरकार सत्ता में न होती तो क्या होता – और इसमें पाया गया है कि अगर भारत 2014 तक के अपने प्रदर्शन को जारी रखता तो भारत की प्रति व्यक्ति आय आज की तुलना में 1,000 डॉलर अधिक होती और भारत की जीडीपी आज की जीडीपी की तुलना में $1.4 ट्रिलियन अधिक होती।

शोध के निष्कर्षों के अनुसार भारत में राजनीतिक भ्रष्टाचार भी काफी कम होता, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता, संगठन की स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता, तथा कानून के तहत समान संरक्षण आदि महत्वपूर्ण संकेतकों की रैंकिंग में भी भारत का प्रदर्शन कहीं बेहतर होता।

रिपोर्ट में भारत द्वारा अपने जीडीपी को “व्यवस्थित रूप से गलत तरीके से मापने” के बारे में भी चिंताएं जताई गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार यदि आलोचकों के आंकड़ों का उपयोग किया जाता तो भारत का खराब प्रदर्शन और भी अधिक हो सकता था।

बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत के मेनस्ट्रीम मीडिया चैनल इस रिपोर्ट पर प्राइम टाइम डिबेट करेंगे?

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन