संजय कुमार सिंह
देशबन्धु में पहले पन्ने पर टॉप की खबर है, रक्षाबंधन पर दिल्ली-एनसीआर में सड़कें जाम रहीं। दिल्ली मेट्रो में भी भारी भीड़ देखने को मिली। टाइम्स ऑफ इंडिया में इस जगह पर जो खबर छपी है वह बताती है कि सोनिया गांधी के संस्मरण को लेकर विवाद गहराया। कांग्रेस ने प्रकाशक पर सरकारी दबाव का आरोप भी लगाया है। अखबार में इस खबर के उपरोक्त शीर्षक के साथ इंट्रो है, पेंगुइन ने फैक्ट चेक के विशेषाधिकार का बचाव किया। यह लाल स्याही से छपा है। दो बिल्कुल अलग तरह की इन खबरों को मिले या दिए गए महत्व को आप हिन्दी-अंग्रेजी का अंतर मान सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह सरकार के समर्थन और विरोध का मामला है। न भी हो तो सब चंगा सी कहने की कोशिश तो है ही।
कायदे से इसे विरोध कहना भी सही नहीं है। इस साल रक्षाबंधन पर जब भाई को राखी बांधने के लिए कैसे कपड़े पहनना चाहिए और कपड़े मौके के अनुसार होना चाहिए आदि जैसे विवाद चल रहे हैं तो राखी पर भाई-बहन का मिलना ही मुश्किल है। निश्चित रूप से यह खबर है और इससे जरूरी खबर क्या होगी। कहने की जरूरत नहीं है मामला सरकार के पक्ष में माहौल बनाने और संभालने का भी हो सकता है। इसमें खबरें छूट जा रही हैं। शायद इसीलिए आज दि एशियन एज में चार कॉलम में छपी एक खबर का शीर्षक है, (हम) सोनिया के संस्मरण प्रकाशित नहीं कर रहे हैं : पेंगुइन। वैसे तो यह एक सूचना या स्वीकारोक्ति भर लगता है। सामान्य स्थितियों में प्रकाशक का बड़बोलापन या डर माना जा सकता है।
इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, प्रकाशक मोदी की आलोचना को हटवाना चाहता था : कांग्रेस ने दबाव का दावा किया। इस संबंध में कल दि इंडियन एक्सप्रेस में जो मूल खबर छपी थी उसमें यही दावा किया गया था और बाद में पेंगुइन ने आधिकारिक बयान जारी करके कहा, पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया भारत में सोनिया गांधी की किताब ‘बिलांगिंग’ (‘बिलांगिंग: अ जर्नी ऑफ लव’) का प्रकाशक नहीं है। यह कहना कि पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने ‘बिलांगिंग’ को प्रकाशित नहीं करने का फैसला किया है क्योंकि लेखक ने संपादकीय बदलावों को मानने से इनकार कर दिया था, वास्तविक स्थितियों को सही ढंग से नहीं दिखाता है। एक प्रकाशक के रूप में तथ्यों की जांच करना और लेखकों को ऐसे सुझाव देना जो उनकी किताबों के लिए सबसे अच्छे हों, हमारा अधिकार और ज़िम्मेदारी दोनों है। यह प्रकाशन प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा है।
इस बारे में हुई पूरी बातचीत के दौरान पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया की स्थिति यही रही कि हम किताब को प्रकाशित करने के लिए तैयार और इच्छुक बने रहे। लेखक के साथ हुई गोपनीय चर्चा पर हम आगे कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। इसके बाद लेखक की ओर से भी कुछ आधिकारिक तौर पर नहीं कहा गया है। सूत्रों की खबरें जरूर हैं। प्रकाशक की इस टिप्पणी पर लोगों की अलग-अलग राय है। किसी ने इसे धूर्तता कहा है तो किसी ने लीपापोती। मैं इसे भारत में व्यवसाय करने के संकट के रूप में देखता हूं और पुराने मामलों से पता चलता है कि देश में किताबों पर सेंसर चल रहा है।
यह अखबारों और संपादकों को समझना चाहिए, महसूस तो हो ही रहा होगा। मेरी समस्या यह है कि खबरों से इसका पता नहीं चलता है और इसका संकेत नहीं दिया गया है। प्रकाशक के रूप में पेंगुइन ने जो कहा है उससे असहमत होते हुए भी मेरा मानना है कि यह अधिकार लेखक ही पाठक को दे सकता है या नहीं देने का अधिकार रखता है। इस लिहाज से पेंगुइन के आधिकारिक बयान को और अच्छी तरह लिखा जा सकता था। लेकिन पूर्व प्रकाशित किताबों से संबंधित तथ्यों और खबरों से पता चलता है कि कैसे संपादकीय परिवर्तन चाहिए थे या किन तथ्यों के मामले में फैक्ट चेक की जरूरत रही होगी या रही ही नहीं। इसलिए जो आधिकारिक बयान बना है वह बिना कहे यही कह रहा है कि हम पर दबाव है। हम ऐसे तथ्य वाली किताबें प्रकाशित करने के इच्छुक नहीं हैं या नहीं कर सकते हैं। देश जानता है कि पूर्व प्रकाशित किताबों के बाद लेखकों, उनके नियोक्ताओं और प्रकाशकों के साथ क्या हुआ है। खबर उस पर भी होनी चाहिए जो नहीं के बराबर हुई है।
सोनिया गांधी की किताब का नाम, “बिलांगिंग : अ जर्नी ऑफ लव” प्रेम की यात्रा में उसी का हो जाना, प्यार में उसी का हो जाना या सोनिया गांधी का भारतीय हो जाना जैसा कुछ है। इस लिहाज से विषय बहुत व्यापक है। वैसे तो अनुमान सबको होगा लेकिन नाम से गलतफहमी हो सकती थी कि यह उनकी प्रेम कहानी है। अब यह साफ हो चला है कि ऐसा नहीं है। और जो हिस्से रोके गए उसपर हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि पुस्तक की रेंज बहुत व्यापक है। जहां तक फैक्ट चेक के लिए किताब नहीं छापने की बात है, फिक्शन या कहानी में कैसा फैक्ट चेक? पहले छप चुका है और इंडियन एक्सप्रेस की खबर में भी कल लिखा था कि पेंगुइन ने मुजफ्फरनगर दंगों पर किताब छापने से मना कर दिया था। खबरों के अनुसार, ‘दि वंस एंड फ्यूचर रॉयट’ पुस्तक प्रसिद्ध कॉमिक जर्नलिस्ट जो सैको द्वारा लिखी गई है।
अब सोनिया गांधी का लिखा प्रकाशित नहीं हो रहा है। यह एक गंभीर स्थिति है और सिर्फ प्रकाशन उद्योग के लिए नहीं है। मीडिया के बाद प्रकाशन उद्योग इस चपेट में आया है। भारत में अमनेस्टी इंटरनेशनल के प्रमुख रहे आकार पटेल की एक किताब है, प्राइस ऑफ द मोदी ईयर्स। इसके बाद आकार पटेल को तो परेशान किया ही गया भारत में अमनेस्टी ने घोषणा की थी कि उसके बैंक खातों को फ्रीज किए जाने के कारण उसे देश में अपना सारा परिचालन रोकना पड़ रहा है। यह मानवाधिकारों पर काम करने वाला एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है। सरकार का कहना रहा है कि यह संस्था विदेशी चंदे के नियमों (FCRA) और देश के कानूनों का उल्लंघन कर रही थी तथा घरेलू मामलों में हस्तक्षेप कर रही थी। फैसला पाठक करें।
अमर उजाला में दोनों खबरें नहीं हैं। सरकारी प्रचार है – लीक प्रूफ परीक्षा के लिए सुझाव मांगे। कहने की जरूरत नहीं है कि इस सरकार का प्रचार करते हुए कांग्रेस की सरकार को भ्रष्ट और अयोग्य तो कहा ही गया था यह भी बताया गया कि पार्टी के पास चुनाव जीतने के लिए चाणक्य हैं। और भी योग्यताएं थीं पर शिक्षा मंत्री बनाने के लिए जो मिले उनसे देश को हुए लाभ के बाद अब परीक्षा कराने के लिए सुझाव जनता से मांगा जा रहा है। और भी योजनाएं और खबरें हैं।
दैनिक भास्कर में भी दोनों खबरें नहीं हैं पर एक विशेष खबर है, भारत को दुनिया की सबसे घातक जैवलिन मिसाइल देगा अमेरिका। अगर आपको याद हो, 2019 का चुनाव घर में घुस कर मारने के नारे से जीता गया था। तब इतने मजबूत थे तो अब यह मिसाइल किस लिए? पर खबर को खबर है। नवोदय टाइम्स में भी दोनों खबरें नहीं हैं। भांति-भांति की जो खबरें हैं उनमें सबसे दिलचस्प और मौजूं खबर का शीर्षक है, पाकिस्तान में 200 साल पुराना गुरुद्वारा गिराया, बनाया जा रहा है शॉपिंग मॉल। पाकिस्तान की ऐसी खबर दिल्ली में पहले पन्ने पर रखने का कोई कारण मुझे नहीं समझ में आता है। खासकर तब जब दिल्ली के काम और मतलब की खबर नहीं है। पाकिस्तान में जो हो रहा है वह वहां की जरूरत और राजनीति होगी और पाकिस्तान (बलूचिस्तान) ऐसी जगह जगह नहीं है जिससे दिल्ली के पाठकों का संदर्भ हो।
खबर जरूर है और दिल्ली में दिल्ली की खबर को प्रमुखता मिलनी चाहिए। विदेशी खबरों में नेपाल की है ही और भी कई खबरें हैं। कलकत्ता के द टेलीग्राफ में दिल्ली की ये दोनों खबरें नहीं हैं लेकिन भारत अमेरिका से मिसाइल खरीदेगा यह खबर पहले पन्ने पर आठ कॉलम का एंकर है। दिलचस्प है कि यह खबर अमेरिकी राजदूत के हवाले से है। खबर में लिखा है कि देर शाम तक भारत सरकार ने इस करार पर कोई टिप्पणी नहीं की है। प्रचारकों की हमारी सरकार तमाम प्रचार के बीच इस खबर का प्रचार नहीं कर रही है और अमेरिकी राजदूत कर रहे हैं तथा अखबारों में छप भी रहा है तो आपको इस ऑटोमेटिक सिस्टम को समझना चाहिए। हालांकि इससे कुछ होना-जाना नहीं है। मामला दिलचस्पी का है।
अंग्रेजी अखबारों में द हिन्दू में सोनिया गांधी की किताब और पेंगुइन की खबर टॉप पर दो कॉलम में सेकेंड लीड है। एक और खबर है जो दूसरे अखबारों में भी पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी। इसका शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, औद्योगिक विकास जुलाई में जून के 8.8 प्रतिशत से कम होकर 6.7 प्रतिशत रह गया। द हिन्दू में चार कॉलम में छपी खबर एक और खबर से पता चलता है कि आईआईटी दिल्ली में छात्रों का आंदोलन चल रहा है और खबर है कि डायरेक्टर ने प्रदर्शनकारियों को आनुशासनिक कार्रवाई की धमकी दी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में सोनिया गांधी की किताब और पेंगुइन की खबर तीन कॉलम में है।
इंडियन एक्सप्रेस में सोनिया गांधी की किताब की खबर के बाद आज फॉलोअप भी है। आज की खबर के अनुसार कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि प्रकाशक चाहता था कि मोदी, आरएसएस, चीन की घुसपैठ वाले हिस्से हटा दिए जाएं। कल मैंने नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने की खबर, मॉडल मुस्कान की ‘ना’ से गुस्साए इमरान ने की हत्या। आज यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है। इस लिहाज से खबर पुरानी हुई और खबर में लिखा भी है कि वारदात गुरुवार की रात हुई थी जिसमें मुस्कान शर्मा की हत्या अकीब उरफ इमरान ने की थी। आज की खबर है, तिलक नगर हत्या के आरोपी को शहर में हुए मुठभेड़ में दोनों पैरों में गोली मारी गई।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


