रांची। देवघर अदालत से जुड़े एक अवमानना मामले में रांची हाईकोर्ट के हालिया फैसले को दिवंगत पत्रकार रवि प्रकाश की मरणोपरांत बड़ी नैतिक और कानूनी जीत के रूप में देखा जा रहा है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए भी रवि प्रकाश अपनी पत्रकारिता की निष्पक्षता और साख को लेकर बेहद चिंतित थे। अब अदालत के फैसले ने उनके उस लंबे संघर्ष को एक नई पहचान दी है।
यह मामला उस दौर का है, जब रवि प्रकाश देवघर में प्रभात खबर के संपादक के रूप में कार्यरत थे। उनके निधन के बाद आया यह फैसला उनके सहयोगियों और मित्रों के लिए भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अंतिम दिनों में भी साख की चिंता
रवि प्रकाश के मित्र और वरिष्ठ पत्रकार संजय मिश्रा ने सोशल मीडिया पर उन्हें याद करते हुए इस संघर्ष से जुड़ी भावनात्मक बातें साझा की हैं। उनके अनुसार, जब रवि प्रकाश कैंसर से जिंदगी की अंतिम लड़ाई लड़ रहे थे और उन्हें अपनी गंभीर स्थिति का आभास था, तब भी उनके मन में सबसे बड़ी चिंता अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता पर लगे कथित दाग को मिटाने की थी।
संजय मिश्रा की पोस्ट से यह बात उभरकर सामने आती है कि रवि प्रकाश के लिए व्यक्तिगत राहत से अधिक महत्वपूर्ण अपनी पेशेवर साख थी। उनके मन में यह पीड़ा थी कि उनकी निष्पक्षता पर कोई कलंक न रहे।
निष्पक्ष पत्रकारिता के संघर्ष की मिसाल
रवि प्रकाश और उनके साथी संजीत मंडल को मिली कानूनी राहत को पत्रकारिता की निष्पक्ष आवाजों के संघर्ष से जोड़कर देखा जा रहा है। यह मामला इस बात की भी याद दिलाता है कि दबावों और कानूनी उलझनों के बीच काम करने वाले पत्रकारों के लिए उनकी विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी होती है।
आज के दौर में पत्रकारिता की निष्पक्षता और मीडिया संस्थानों की कार्यशैली को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे माहौल में रवि प्रकाश का संघर्ष इस बात की मिसाल है कि एक पत्रकार के लिए पद या प्रतिष्ठा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसकी कलम की विश्वसनीयता होती है।
“एक बार फिर जीत गए रवि…”
संजय मिश्रा ने अपनी पोस्ट में भावुक शब्दों में लिखा कि, “एक बार फिर जीत गए रवि… आपको बधाई देने का मन कर रहा है।”
ये शब्द केवल एक मित्र की भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उन पत्रकारों की भावना भी हैं जो तमाम दबावों और सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी पेशेवर निष्ठा से समझौता नहीं करना चाहते।
साख की लड़ाई में मिली जीत
रवि प्रकाश अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन रांची हाईकोर्ट का यह फैसला उनकी स्मृति से जुड़े एक महत्वपूर्ण संघर्ष को नई पहचान देता है। यह जीत बताती है कि किसी निष्पक्ष आवाज को मुकदमों और दबावों के जरिए कुछ समय के लिए परेशान किया जा सकता है, लेकिन उसकी सच्चाई और पेशेवर निष्ठा को हमेशा के लिए दबाना आसान नहीं होता।
दिवंगत पत्रकार रवि प्रकाश की यह मरणोपरांत जीत उनके लिए एक सच्ची श्रद्धांजलि की तरह है—एक ऐसी जीत, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण बात पद, प्रतिष्ठा या शक्ति नहीं, बल्कि पत्रकारिता की साख, निष्पक्षता और सच के प्रति प्रतिबद्धता है।

रवि, रवि प्रकाश को कैंसर ने छीन लिया था. वे अपने देह से मुक्त हो चुके थे लेकिन देवघर के एक न्यायालय ने उन्हें अवमानना के एक वाद में दोषी ठहराया था. उनके साथ साथी संजीत मंडल भी थे. आज उस मामले में रांची हाइकोर्ट का फैसला आया. यूं तो इस फैसले का रवि के नहीं रहने से उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखता है. लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए यह अतिमहत्वपूर्ण है. मृत्यु से 15 दिन पहले मोबाइल पर हुई बातचीत में रवि की यह इच्छा थी कि यह मामला समाप्त हो जाए. वे बोल रहे थे कि यह कलंक लग गया है, इसका मिटना आवश्यक है. सोचिए एक पत्रकार कैंसर से लड़ रहा था, उसे मालूम है कि किसी भी समय मृत्यु हो सकती है. फिर भी उसे चिंता किसी और बात की थी. रवि भाई आज वह कलंक मिट गया. यह मेरे लिए बड़ी बात है. मेरे जैसे बहुत सारे आपके पत्रकार मित्रों के लिए भी. एक बार फिर जीत गए रवि. आपको बधाई देने का मन कर रहा है. आपसे शाबासी लेने का दिल कर रहा है. बस..
-संजय मिश्रा


