नितेश त्रिपाठी-
बिहार में शराबबंदी के बाद अब ड्रग्स का कारोबार तेजी से फैल रहा है। गांजा, हेरोइन और नशीली दवाओं के साथ ‘कोटा’ नाम का एक नया नशा भी पुलिस के लिए चिंता का विषय बन गया है। सस्ते नशे की पहुंच अब छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों तक बढ़ रही है। पुलिस को आशंका है कि इसकी चपेट में बड़ी संख्या में युवा और नाबालिग भी आ रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में ये जानकारी सामने आई है।
बिहार में 5 अप्रैल 2016 को पूरी तरह शराबबंदी लागू की गई थी। इसके बाद से राज्य में करीब 3.16 करोड़ लीटर शराब जब्त की गई और शराब से जुड़े मामलों में लगभग 7.15 लाख गिरफ्तारियां हुईं। औसतन हर दिन करीब 8,650 लीटर शराब जब्त की गई और 196 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
लेकिन शराब के अवैध कारोबार पर कार्रवाई के बीच नशे का एक दूसरा बाजार भी तेजी से बढ़ने लगा। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच के मुताबिक, राज्य में अब गांजा, हेरोइन, नशीली गोलियों, इंजेक्शन और कफ सिरप की तस्करी बढ़ रही है।
पांच महीने में 1,905 मामले दर्ज
बिहार पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2019 में NDPS एक्ट के तहत 697 मामले दर्ज हुए थे। 2022 में यह संख्या बढ़कर 1,822 हो गई। वहीं, जनवरी से मई 2026 के बीच ही 1,905 मामले दर्ज किए गए। यानी 2022 के पूरे साल के मुकाबले शुरुआती पांच महीनों में ही 83 अधिक मामले सामने आए।
गांजा जब्ती के आंकड़े भी नशे के बढ़ते कारोबार की ओर इशारा करते हैं। साल 2022 में करीब 16,692 किलो गांजा जब्त किया गया था, जबकि 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 31,915 किलो हो गया।
नशीली गोलियों की जब्ती में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। 2022 में करीब 29,762 गोलियां जब्त हुई थीं, जबकि जनवरी से मई 2026 के बीच यह संख्या बढ़कर 9.29 लाख हो गई। इसी तरह, 2022 में 3,677 नशीले इंजेक्शन जब्त किए गए थे, जबकि 2026 के शुरुआती पांच महीनों में 3.83 लाख से अधिक इंजेक्शन बरामद हुए।
बिहार पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की नारकोटिक्स सेल ने 10 अक्टूबर 2026 तक 52.32 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थ जब्त किए और 315 लोगों को गिरफ्तार किया। इसमें से 25.58 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थ इस साल जब्त किए गए।
शराब से सस्ता पड़ रहा है कुछ नशीले पदार्थों का इस्तेमाल
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, शराबबंदी के बाद नशे की मांग खत्म नहीं हुई। अवैध शराब महंगी होने के कारण कुछ लोगों ने दूसरे नशीले पदार्थों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक, बिहार में अवैध बाजार में व्हिस्की की 750 मिलीलीटर की बोतल करीब 1,500 रुपये में बिक सकती है। वहीं, मिलावटी ब्राउन शुगर की छोटी मात्रा 300 से 500 रुपये में मिल जाती है।
पुलिस और डॉक्टरों का मानना है कि कोरोना महामारी के दौरान दूसरे राज्यों से बिहार लौटे कुछ मजदूरों और कामगारों के जरिए भी नशे के नए प्रकार और उनके सप्लाई नेटवर्क राज्य में पहुंचे। इसके बाद ग्रामीण इलाकों में भी नशीले पदार्थों की उपलब्धता बढ़ने लगी।
‘कोटा’ नाम के नशे ने बढ़ाई चिंता
बिहार में ‘कोटा’ नाम का नशीला पदार्थ पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए नई चुनौती बनकर सामने आया है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, इसे कच्चे हेरोइन जैसे पदार्थ के रूप में पहचाना जा रहा है। इसका इस्तेमाल आमतौर पर सिगरेट के जरिए किया जाता है।
पुलिस का दावा है कि इसकी सप्लाई म्यांमार से पूर्वोत्तर भारत के रास्ते बिहार तक पहुंचती है। मिजोरम और मणिपुर की सीमाओं से होकर असम तक आने वाले रास्तों का इस्तेमाल तस्करी के लिए किया जाता है। इसके बाद कुछ खेप ट्रेन के जरिए बिहार पहुंचती हैं।
पुलिस के मुताबिक, इस नेटवर्क में वैशाली, किशनगंज, पूर्वी चंपारण और भोजपुर जैसे जिलों के नाम सामने आए हैं। वैशाली के राघोपुर इलाके में भी नशे के कारोबार को लेकर चिंता जताई गई है।
शुरुआत में ‘कोटा’ के एक डिब्बे की कीमत करीब 25,000 से 30,000 रुपये बताई गई थी। अब इसकी कीमत बढ़कर लगभग 50,000 रुपये हो गई है। पुलिस के अनुसार, कम पूंजी लगाकर इस कारोबार में शामिल होने की संभावना भी इसे फैलाने वाला एक कारण है।
महिलाओं और युवाओं के इस्तेमाल की आशंका
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए अब अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। कुछ मामलों में महिलाओं के कपड़ों में छिपे विशेष हिस्सों का इस्तेमाल कर नशीले पदार्थ ले जाने की बात सामने आई है। छोटी मात्रा में पैकेट या गोलियां ले जाने के कारण इनकी पहचान करना भी मुश्किल हो सकता है।
पुलिस की चिंता सिर्फ तस्करी तक सीमित नहीं है। उसे डर है कि सस्ते नशीले पदार्थों की उपलब्धता से युवा और नाबालिग तेजी से इसकी गिरफ्त में आ सकते हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, 2016 से 2023 के सात सालों में NDPS एक्ट के तहत 11 नाबालिगों को हिरासत में लिया गया था। वहीं, 2024 में ही यह संख्या बढ़कर 50 हो गई।
संसद की सामाजिक न्याय और अधिकारिता संबंधी स्थायी समिति की 2023 की रिपोर्ट में उद्धृत एक राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार, बिहार में 10 से 17 साल की उम्र के करीब 99,000 गांजा इस्तेमाल करने वाले, 40,000 ओपिओइड का इस्तेमाल करने वाले और 29,000 इनहेलेंट का इस्तेमाल करने वाले बच्चे होने का अनुमान लगाया गया था। इसके अलावा करीब 8,000 बच्चों के सेडेटिव दवाओं के इस्तेमाल का अनुमान था।
नशामुक्ति केंद्रों में इलाज कराने वालों की संख्या बढ़ी
नशे की समस्या का असर इलाज केंद्रों के आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अनुसार, बिहार में उसके सहयोग से चलने वाले नशामुक्ति केंद्रों में इलाज या सहायता पाने वाले लोगों की संख्या 2022-23 में 1,487 थी। 2024-25 में यह बढ़कर 29,429 हो गई। यानी करीब 20 गुना की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
हालांकि, राज्य में इलाज की सुविधाएं अभी भी सीमित हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार के सहयोग से चलने वाली नशामुक्ति सुविधाएं बिहार के एक-तिहाई से भी कम जिलों में उपलब्ध हैं।
पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) के मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. राजेश कुमार ने कहा कि अब नशे के आदी लोगों में बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले गांजा जैसे पौधों से मिलने वाले नशीले पदार्थों का इस्तेमाल अधिक था, लेकिन अब अर्ध-सिंथेटिक और सिंथेटिक ड्रग्स के साथ हेरोइन की लत के मामले भी बढ़ रहे हैं।
सरकार ने बनाई नई शाखा
बिहार सरकार ने नशीले पदार्थों की तस्करी पर लगाम लगाने के लिए सितंबर 2025 में प्रोहिबिशन एंड स्टेट नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो बनाया था। इसमें 2022 में गठित एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स (ANTF) और पुलिस की मौजूदा मद्यनिषेध शाखा को शामिल किया गया। बिहार पुलिस की स्पेशल ब्रांच और ऑपरेशंस के महानिदेशक कुंदन कृष्णन ने कहा कि नशीले पदार्थों के खिलाफ सिर्फ पुलिस की कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसके लिए समाज की भागीदारी भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि समुदायों को नशे के खिलाफ जागरूक और एकजुट करना होगा। सरकार और समाज के संयुक्त प्रयास से ही इस बढ़ती समस्या पर काबू पाया जा सकता है।
बिहार में शराबबंदी के दस साल बाद सामने आ रहे ये आंकड़े बताते हैं कि नशे की समस्या अब केवल अवैध शराब तक सीमित नहीं है। बदलते नशीले पदार्थ, नए तस्करी नेटवर्क, युवाओं में बढ़ती आशंका और इलाज की सीमित सुविधाएं राज्य के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रही हैं।

