सुधाकर सिंह
मुझे एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन की ओर से उनके अधिवक्ता के माध्यम से मानहानि का कानूनी नोटिस भेजा गया है। इस नोटिस में सार्वजनिक रूप से माफी मांगने, पाँच करोड़ रुपये के मानहानि वाद और आपराधिक कार्रवाई की धमकी दी गई है। ये धमकी इसलिए मिली है कि मैंने भोजपुर जिले के बिलौटी गाँव में भारत भूषण तिवारी की संदिग्ध मृत्यु और जमुई की घटना पर जनहित में सवाल उठाए।
मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि कानूनी नोटिस की धमकी देकर न तो मेरी आवाज़ दबाई जा सकती है और न ही जनता के सवालों से बचा जा सकता है। मैं किसी पद, वर्दी या सत्ता के दबाव में आने वाला नहीं हूँ। जनता ने मुझे संसद में इसलिए भेजा है कि मैं उसके अधिकारों, न्याय और संविधान की रक्षा के लिए आवाज़ उठाऊँ, न कि अन्याय पर चुप्पी साध लूँ।
भारत भूषण तिवारी की हत्या को महज ‘पुलिस ऑपरेशन’ बताकर मामले को सामान्य कार्रवाई के रूप में पेश करना अपने आप में शर्मनाक है। किसी व्यक्ति की जान चली जाए और उसके बाद घटना को एक सामान्य पुलिस ऑपरेशन बताकर जवाबदेही से बचने की कोशिश की जाए, यह किसी भी संवेदनशील लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकता। सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियाँ थीं, जिनमें भारत भूषण तिवारी की जान गई? किसके आदेश पर कार्रवाई हुई? निर्णय किस स्तर पर लिया गया और इस पूरे घटनाक्रम की वास्तविक जिम्मेदारी किसकी है?
मैं आज भी अपने सवालों पर कायम हूँ । मेरी स्पष्ट मांग है कि इस मामले की जवाबदेही केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मियों तक सीमित न रखी जाए, बल्कि उस समय निर्णय लेने और पूरी व्यवस्था का नेतृत्व करने वाले शीर्ष अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जाँच हो। बिना शीर्ष अधिकारी के आदेश का कोई पुलिस कांस्टेबल किसी का हत्या नहीं कर सकता हैं।
कोई भी निचले स्तर का पुलिस अधिकारी पुलिस मुख्यालय की जानकारी, निर्देशों और आदेशों से पूरी तरह अलग रहकर इस तरह की बड़ी कार्रवाई कैसे कर सकता है—यह गंभीर जाँच का विषय है । मैं यह सवाल इसलिए उठा रहा हूँ, क्योंकि पुलिस व्यवस्था में जब भी कोई गंभीर विवाद सामने आता है, तो अक्सर निचले स्तर के पुलिसकर्मियों को बलि का बकरा बना दिया जाता है, जबकि निर्णय लेने वाले शीर्ष अधिकारियों की भूमिका पर पर्याप्त सवाल नहीं उठते ।
भारत भूषण तिवारी प्रकरण में भी मैं यही सवाल उठा रहा हूँ कि निचले स्तर के पुलिसकर्मियों को जिम्मेदार ठहराकर असली जवाबदेही से बचने की कोशिश की जा रही है । इस मामले में किसी को भी केवल उसके पद या प्रतिष्ठा के आधार पर जाँच से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।
यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि जिस समय भारत भूषण तिवारी की हत्या हुई, उस समय कुंदन कृष्णन बिहार एसटीएफ के डीजी के पद पर कार्यरत थे । इसलिए उस समय की कमान, निर्णय प्रक्रिया, संबंधित अधिकारियों के बीच हुए संवाद और पुलिस मुख्यालय की भूमिका की निष्पक्ष जाँच आवश्यक है । मैं अपनी राजनीतिक और सार्वजनिक जवाबदेही के तहत यह सवाल उठाता रहूँगा कि इस पूरे घटनाक्रम में शीर्ष स्तर की जिम्मेदारी क्या थी । मेरी दृष्टि में कुंदन कृष्णन की भूमिका की भी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए । किसी भी अधिकारी को उसके पद के कारण जवाबदेही से छूट नहीं मिल सकती ।
मेरे द्वारा उठाए गए सवाल निराधार नहीं हैं । इस प्रकरण में संबंधित पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया, मृतक की माता की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज हुई और सरकार ने न्यायिक जाँच का आदेश दिया । ये घटनाक्रम स्वयं इस मामले की गंभीरता और निष्पक्ष जाँच की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं । जब सरकार ने स्वयं कार्रवाई की और न्यायिक जाँच आवश्यक समझी, तब इस प्रकरण पर सवाल उठाने वाले जनप्रतिनिधि को धमकी भरा नोटिस भेजना कई गंभीर सवाल खड़े करता है ।
जमुई की घटना पर भी मैंने जनहित में सवाल उठाए हैं । महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही तथा पीड़ितों को न्याय दिलाना किसी राजनीतिक दल का निजी एजेंडा नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन की बुनियादी जिम्मेदारी है । इन मुद्दों पर सवाल उठाना मेरा संवैधानिक और नैतिक दायित्व है ।
मैं कुंदन कृष्णन और उनके अधिवक्ता को स्पष्ट शब्दों में कहना चाहता हूँ कि मैं न तो माफी माँगूँगा और न ही पाँच करोड़ रुपये के मुकदमे की धमकी से पीछे हटूँगा । मेरे सवालों का जवाब कानूनी धमकी से नहीं, तथ्यों, पारदर्शिता और निष्पक्ष जाँच से दिया जाना चाहिए । जनहित के प्रश्नों को मानहानि की धमकी से दबाने का प्रयास लोकतांत्रिक संवाद के लिए उचित नहीं है।
मैंने अपने अधिवक्ताओं को इस कानूनी नोटिस का विधिसम्मत उत्तर देने का निर्देश दे दिया है । मैं अपने सभी वैधानिक अधिकार सुरक्षित रखता हूँ और इस मामले में कानून के दायरे में रहकर हर आवश्यक कदम उठाऊँगा ।
मेरी माँग आज भी स्पष्ट है—
- भारत भूषण तिवारी की मृत्यु की निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध जाँच हो ।
- तत्कालीन पुलिस कमान, पुलिस मुख्यालय और निर्णय लेने वाले शीर्ष अधिकारियों की भूमिका की भी जाँच हो ।
- जाँच को केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मियों तक सीमित रखकर किसी संभावित उच्चस्तरीय जिम्मेदारी की अनदेखी न की जाए ।
- भारत भूषण तिवारी के परिवार को न्याय मिले और जमुई की पीड़िता को भी न्याय सुनिश्चित किया जाए।
मैं दो टूक कहना चाहता हूँ—लोकतंत्र में वर्दी का सम्मान होना चाहिए, लेकिन वर्दी को जवाबदेही से ऊपर नहीं रखा जा सकता । पद बड़ा हो या छोटा, कानून सबके लिए बराबर है । जनता के सवालों का जवाब धमकी से नहीं, न्याय से देना होगा ।
सदन में भी जनता के सवाल उठाऊँगा और सड़क पर भी । किसी कानूनी नोटिस, आर्थिक दबाव या पद की धमकियों से मेरे जनहित के मुद्दे उठाने का संकल्प कमजोर नहीं होगा ।
न्याय की लड़ाई जारी रहेगी। जवाबदेही तय होकर रहेगी। जनता की आवाज़ दबेगी नहीं।
जय हिन्द! जय बिहार!
सुधाकर सिंह बिहार की बक्सर लोकसभा सीट से सांसद हैं।

