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सुख-दुख

बनारस में तब ‘आज’ अखबार और गोपेश पांडेय की तूती बोलती थी!

आलोक पराडकर-

स्मृति शेष / गोपेश पांडेय… शोला था जल-बुझा हूं..

कई वर्षों बाद गोपेश भैया लखनऊ में ‘जागरण’ चौराहे के पास चाय की दूकान पर मिले तो मैं उन्हें तुरंत पहचान नहीं पाया था। उन्होंने दाढ़ी रख ली थी। बातें शुरू हुईं तो थोड़ी ही देर में लगने लगा था कि बात का ओर-छोर बिगड़ जा रहा है। लंबी बातें उनकी आदत में शुमार थीं लेकिन यहां तो बात कहीं की कहीं चली जा रही थी। मुझे समझने में ज्यादा देर नहीं लगी कि वे बहक रहे हैं, मानसिक स्थिति के कारण शायद ऐसा हुआ हो। पहले जैसी ठसक भी नहीं दिखी।

मुझे पता था कि वे एक बड़ी दुर्घटना से किसी प्रकार जीवन बचाकर लौटे हैं। लेकिन उनसे मिलना एक उस पूरे दौर को याद करना था जिसमें कई वर्षों का मैं सहयात्री भी रहा, उनके सिटी रिपोर्टिंग टीम के सबसे कम उम्र सहयोगी के तौर पर।

वास्तव में गोपेश पांडेय उस बीते दौर का विश्वास दिलाते थे, जब पत्रकारिता आदर्श और मूल्यों की बात करती थी, सच्चाई और ईमानदारी जिसकी रीढ़ थी, जिसमें भाषा और वर्तनी का कठिन अनुशासन था। उन्हें देखकर, उनसे मिलकर, उनके साथ काम कर हम सब बीते दौर की कल्पना कर पाते थे जिसकी यात्रा पराड़कर जी से विद्याभास्कर जी तक आती थी। ‘आज’ में वह लंबे समय तक सिटी चीफ रहे, विनय सिंह, एलवीके दास, बद्री विशाल, रजनीश त्रिपाठी, विनोद पांडेय, राधेश्याम कमल सहित कई साथी उनकी टीम का हिस्सा थे।

गोपेश पांडेय जी

यह उस समय के दूसरे समाचार पत्रों की तुलना में अधिक समृद्ध टीम थी। तब ‘आज’ की तूती बोलती थी और गोपेश जी की भी। मैंने किसी से सुन रखा था कि बाहर से आने वाले अधिकारियों को उनके साथियों द्वारा यह सलाह दी जाती थी कि बनारस जाकर कालभैरव मंदिर में दर्शन करना और ‘आज’ अखबार में गोपेश पांडेय से भेंट जरूर करना।

लखनऊ आकर वे बातों में बहक भले जाते हों लेकिन अपने आदर्शों और मूल्यों से उन्हें कोई बहका नहीं सका। मुझे उन्होंने खुद बताया था कि लखनऊ आने पर जब कुछ लोगों ने उनके लिए सरकारी मकान के प्रयास किए तो तत्कालीन सिंचाई मंत्री ओमप्रकाश सिंह ने उन लोगों से कहा था कि पहले गोपेश जी से पूछ लीजिए कि क्या वह सरकारी मकान लेने पर सहमत हैं? ओमप्रकाश सिंह बनारस के होने के कारण गोपेश जी के स्वभाव से भली प्रकार परिचित थे।

‘आज’ में वेतन का जो ढांचा था, उसमें लोगों के कहने पर गोपेश जी ने सरकारी मकान ले लिया। लालबाग में वह शायद सातवीं-आठवीं मंजिल पर था और लिफ्ट खराब रहती थी। वे चाहते तो कोई दूसरा मकान बटलर पैलेस जैसी कालोनी में ले सकते थे लेकिन उन्होंने इसके लिए प्रयास नहीं किया। वास्तव में वह लखनऊ में अपना समय ही काट रहे थे। पत्रकारिता के मूल्यों के साथ ही बनारस भी उनकी धमनियों में बहता था। बनारस से दूर होकर वे कभी सहज नहीं हो पाए। लखनऊ आने के कई वर्षों तक वे बाल कटवाने के लिए बनारस जाने का इंतजार करते थे।

बनारस में ‘आज’ के सिटी प्रमुख पद से हटने, लखनऊ भेजे जाने को वे शायद कभी स्वीकार नहीं कर पाए। लखनऊ में वे अलग-थलग रहे। इन वर्षों में उनसे मिलते हुए यह विश्वास करना मुश्किल था कि क्या ये वही गोपेश पांडेय हैं! पत्रकारिता में आदर्श और मूल्य, सच्चाई और ईमानदारी, भाषा और वर्तनी की जो स्थिति है, गोपेश भैया जैसे लोग उसमें अनफिट ही हो चले हैं, विनम्र श्रद्धांजलि!

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